रोज की तरह वह ट्रेन के दूसरे दर्जे में खिड़की के पास वाली सीट पर बैठी थी।
लेकिन उसके चेहरे पर वो खुशी नहीं दिख रही थी जो पिछले दो सालों से तकरीबन हर
दूसरे-तीसरे दिन मैं ट्रेन में चढ़ते ही देखती थी। चेहरे पर उदासी की चादर लपेटे
वो खिड़की से बाहर देख रही थी। आमतौर पर वो कानों में इयरफोन लगाये गाने सुनती और
नजरें इधर-उधर दौड़ाती रहती। मुझसे नजर मिलते ही हल्की सी स्माइल देकर मुझे अपने
पास बुलाती और अपना सीट ऑफर करती। मेरे मना करने पर खुद उठकर मेरे पास चली आती और
कान को इयरफोन से आजाद करते हुये चहकती- आप मिल जाती हो तो रास्ता आराम से कटता है
नहीं तो मैं बोर होती रहती हूँ। कभी-कभी मैं कहती- तुम झूठ भी कितनी आसानी से बोल
लेती हो, आराम से गाने सुनकर इन्जॉय कर रही थी और कहती हो बोर हो रही थी। फिर वो
कहती- धत तेरे की, गाने सुनना तो मजबूरी है, अकेले क्या करूँ, सच कहती हूँ मुझे
बातें करना बहुत अच्छा लगता है। मैं पूछती- और क्या-क्या अच्छा लगता है, तो कुछ
जवाब देने के बदले वो मुस्कुरा देती, जैसे उसकी मुस्कुराहट से ही मैं सब कुछ जान
जाऊँगी। अब तो मेरी नजरें भी ट्रेन में चढ़ते ही उसे ढ़ूँढ़ती, जिस दिन वो दिखाई
नहीं देती आफिस तक पहुँचने का सफर ज्यादा लम्बा महसूस होता। अभी कुछ दिनों पहले की
बात है- शनिवार के दिन ट्रेन में भीड़ कम होती है। मुझे लगा था कि आज आराम से
बैठकर मैं उससे गप्पे मारूँगी पर हाय री किस्मत, सारी ट्रेनें ठसाठस भरी दिख रही
थी। दो-तीन ट्रेन छोड़ने के बाद मैंने हिम्मत करके एक ट्रेन में अपने लिये जगह
बनाई। लेडीज डब्बे की उस धींगा-मुश्ती में जान पे बन आई थी, फिर उससे बातें करने,
उसे नजरों के मार्फत ढ़ूँढ़ने का ख्याल तो दूर-दूर तक नहीं रहा। लेकिन ट्रेन से
उतरते ही किसी ने पीठ पर हल्के से हाथ मारा। पलट कर देखा तो वही थी, मुस्कुराते
हुये कहने लगी- आज तो आप ट्रेन में दिखी ही नहीं, उतरते समय अचानक से आप पर नजर
पड़ गई तो मैंने सोचा दो-चार बातें कर लूँ... मैंने कहा- लेकिन मैं तो जल्दी में
हूँ फिर कभी बात करेंगे। उसने पूरे अधिकार से कहा- बिल्कुल नहीं, मैं आपके लिये उतरी
हूँ इस ट्रेन से नहीं तो दो स्टेशन आगे जाना था और आपको जल्दी है, मेरा भी ऑफिस है
मुझे भी देर हो रही है, एक दिन देर से जायेंगे तो क्या हो जायेगा। मुझे लगा उसकी
बात मान लेने में कोई हर्ज नहीं है। हम दोनों स्टेशन से बाहर निकल कर एक छोटे से
रेस्टोरेंट में घुस गये। उसने बात शुरू की- पता है यहाँ भजिया पाव बहुत अच्छा
मिलता है, वही खायें क्या। मैंने हाँ में सिर हिला दिया। आप बहुत कम बोलती हैं,
आपको पता है, कम बोलने वाले लोगों का हक मारा जाता है- वह माहौल को अपने अनुकूल
बनाने में जुटी थी। मैंने कहा- हाँ मुझे पता है लेकिन तुम बहुत बोलती हो, अब ये
बताओ कि क्या हो रहा है जिन्दगी में। वह शरमाते हुये बोली- कुछ खास नहीं। तीन
महीने बाद शादी है मेरी, आप आओगी न, नहीं आपसे पूछना क्या, आपको आना ही पड़ेगा। यहीं
मुम्बई में है, इसलिये आपका बहाना मैं नहीं सुनूँगी। मैंने खुश होते हुये उससे
पूछा- लव मैरिज है तुम्हारी ? वो बोली- हाँ, मैं और विक्रम एक दूसरे को बचपन से जानते
हैं...। आपको मिलवाऊँगी उससे, देखना वो आपको बहुत पसंद आयेगा। उसका भरोसा देखकर ही
मैं समझ गई कि विक्रम उसे बहुत पसंद है। उस मुलाकात में बाकी की सारी बातें वो
विक्रम के बारे में ही करती रही। विक्रम उसका बहुत ख्याल रखता है... विक्रम दुनिया
का सबसे अच्छा लड़का है... आदि.. आदि । कुछ देर बैठकर हम दोनों अपने-अपने आफिस की
तरफ निकल गये। उस दिन बहुत सारी बातें जान गई थीं मैं उसके बारे में। उसके बाद वो
जब भी मिलती, खुश दिखायी पड़ती। इधर कई दिनों तक वो ट्रेन में दिखाई नहीं पड़ रही
थी। अब उसकी शादी को सिर्फ एक महीना बचा था। मैंने सोचा शादी की तैयारियों में
व्यस्त होगी। कई बार सोचा कि फोन करके पुछूँ कि शादी से पहले इतनी लम्बी छुट्टी
लेगी तो बाद में छुट्टियाँ नहीं मिलेंगी, लेकिन अपनी व्यस्तताओं के चलते फोन नहीं
कर पाई। पर आज जब उसे ट्रेन में देखा तो वो पहले से बिल्कुल अलग थी। हर वक्त
दोड़ने वाली उसकी नजर कहीं शून्य में स्थिर थीं, वो खिड़की की तरफ चेहरा घुमाये
शायद कुछ सोच रही थी। आज मैंने खुद उसके पास जाकर हैलो किया, तो उसने एक फीकी
मुस्कान दे दी। मैंने चुहलबाजी करने की कोशिश की- शादी एक महीने बाद है, अभी से
दोस्तों को भूलने की आदत डाल रही हो...। अचानक उसके गालों पर पानी की बूँदें उतर
आईं। मुझे कुछ समझ नहीं आया कि उसे क्या हो गया। मैंने उसका हाथ पकड़ कर आदेश
दिया- चलो, अगले स्टेशन पर उतरकर बात करते हैं। वह बिना कुछ बोले मेरे साथ ट्रेन
से उतर पड़ी। प्लेटफार्म पर ही एक बेंच पर हम दोनों बैठ गये। क्या हुआ.. बताओ
मुझे, एक महीने बाद तुम्हारी शादी है और तुम रोना-धोना कर रही हो, क्यों ?.... उसने बहुत उदास आवाज में कहा- विक्रम चला गया मुझे
छोड़कर..। चला गया... कहाँ, किसलिये... मैं भी चौंक सी गई। उसने रोते हुये कहा-
हमारी हल्की सी नोंक-झोंक हुई थी किसी बात को लेकर और मैंने गुस्से में आकर कह
दिया था कि चले जाओ यहाँ से... पता नहीं मेरी बातों से अपसेट होकर या कैसे जाते
समय ही उसकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया और वो....। बाकी की बातें उसकी हिचकियों
में खो गई। मैंने दो घंटे तक उसे चुप कराया। कुछ सहज होकर हम दोनों उठे अपने ऑफिस
की तरफ चलने के लिये। जाते समय उसने सिर्फ इतना कहा- मैंने तो उसे गुस्से में वहाँ
से जाने को कहा था, वो तो दुनिया से चला गया... क्या किसी का जाना इतना तकलीफ देता
है....?