Wednesday, 25 December 2013

अनोखा तंत्र



यह कैसा अनोखा तंत्र है प्रजा का,
यहाँ नहीं होती सहभागिता किसी की ।।
सिसकियाँ सुनकर नहीं भीगती आँखें,
पसीजता नहीं दिल अब आदमज़ात का ।।
यहाँ अकेली रोती हैं आँखें ग़रीब की,
नहीं बहती है साथ कोई जमुना धारा ।।

Friday, 20 December 2013

रेत के ज़ख्म

यहाँ नज़रें मिलाकर कोई नहीं पूछता सलामती अपनी,
यहाँ सिर्फ नज़र दिखाकर हैसियत का व्यापार होता है।।
इस अजनबी शहर में खाली नहीं कोई किसी के लिये,
यहाँ रेत के जख्मों पर भी समन्दर का वार होता है।।

Thursday, 12 December 2013

कहानी- एक रात का सफ़र




बस ने हॉर्न दी और सभी यात्री जल्दी-जल्दी बैठने लगे। अक्षरा ने खिड़की से बाहर हाथ निकालकर चाचा-चाची को बाय किया, प्रत्युत्तर में चाचा ने भी हाथ उठाकर जोर से कहा, पहुंचते ही फोन कर देना और हां मैंने कंडक्टर को बोल दिया है, बगल वाली सीट पर कोई महिला ही बैठेगी। गाड़ी खुली और अंधेरे को चीरते हुए आगे बढ़ने लगी। अक्षरा खिड़की के शीशे को सरकाने लगी ताकि ठंढी हवा का झोंका उसे उल्टी करने का अहसास न दिलाये। मगर शीशा टस से मस होने का नाम नहीं ले रहा था। उसने कंडक्टर से कहा तो उसने पूरा शीशा सरका दिया। अक्षरा की बगल वाली सीट अभी भी खाली थी। उधर कंडक्टर एक दंपती से चिरौरी कर रहा था, भाई साहब, जरा आप आगे वाली सीट पर बैठ जायेंगे! आपकी मैडम के साथ एक लड़की को बैठा देता, देखिए न रात भर का सफर है, कैसे बेचारी जेंट्स के साथ बैठेगी? अक्षरा ने मुड़कर देखा, अब पीछे वाली सीट पर बैठे युवा जोड़े से कंडक्टर बात कर रहा था। आदमी आगे आने के लिए मान गया पर औरत खीझ उठी, जिसे अक्षरा ने भांप लिया। कंडक्टर ने कहा, चलिए पीछे जाकर मैडम की बगल वाली सीट पर बैठ जाइए। अक्षरा ने कहा, मुझे उल्टी होती है, उनसे कहिए न मुझे खिड़की की तरफ वाली सीट दें? वह सब आप खुद एडजस्ट कीजिए। कंडक्टर सपाट लहजे में बोला। तो फिर मुझे नहीं जाना, मैं अपनी सीट पर ठीक हूं। अक्षरा झल्ला उठी। कंडक्टर भी अव्वल दर्जे का जिद्दी। वहीं जोर-जोर से शुरू हो गया, अब आपकी बगल में कोई जेंट्स बैठेगा तो मुझे कुछ मत बोलियेगा, भलाई का जमाना ही नहीं है। गार्जियन कुछ कहते हैं, बच्चे कुछ करते हैं। तभी झटके से बस रुकी  और एक दादानुमा लड़का चढ़ा। उसने लपककर ड्राइवर का कॉलर पकड़ा, क्यों बे मुझे छोड़कर भागा जा रहा था, मेरे पहुंचे बिना बस कैसे खोल दी? ड्राइवर डर गया। मौके को देखकर कंडक्टर ने हाथ जोड़ते हुए बात खत्म करना चाहा,  आइए बैठिए,  देखिए न बारिश का मौसम है इसीलिए, नहीं तो आपके बगैर...। उसने लड़के को अक्षरा की बगल में बैठा दिया। अक्षरा समझ गयी कि कंडक्टर बात न मानने का बदला ले रहा है। वह खिड़की की तरफ मुंह करके देखने लगी।बारिश शुरू हो चुकी थी और बस अपनी रफ्तार पकड़ने लगी थी। बारिश का पानी रिस-रिस कर अंदर आने लगा। सभी अपनी-अपनी खिड़कियां बंद किये हुए थे। अक्षरा ने भी अपनी खिड़की बंद करनी चाही लेकिन शीशा फिर अपनी जगह से हिला भी नहीं। उसने इधर-उधर देखा, कंडक्टर कहीं नजर नहीं आ रहा था। पानी रिसते हुए अक्षरा को भीगा रहा था। बगल वाले लड़के ने पूछा, खिड़की बंद करनी है तो मैं कर देता हूं। अक्षरा ने प्रत्युत्तर नहीं दिया। फिर भी उसने उठकर पूरी ताकत लगाकर खिड़की बंद कर दी। पानी का रिसना बंद हो गया, बाहर बारिश भी तेज हो गयी थी।अक्षरा खिड़की बंद होते ही अकुलाने लगी। उमस और बस के धुएं की अजीब सी गंध से उसका जी मिचलाने लगा। बाहर बारिश काफी तेज थी लेकिन उसकी परवाह न करते हुए उसने शीशे को सरकाना चाहा। लड़के ने उठकर फुर्ती से खिड़की खोल दी, अक्षरा उल्टी करने लगी। थोड़ी देर तक उल्टी करने के बाद वह शांत हुई, लेकिन तब तक काफी हद तक उसके बाल और कपड़े भींग चुके थे।लड़के ने आत्मीयता से पूछा, आपकी तबीयत तो ठीक है, मैं पानी दूं, कुल्ला कर लीजिए। अक्षरा अनमने भाव से बोली, मेरे पास पानी है। वह फिर बोला, आप अकेले ही जा रही हैं, आपके साथ और कोई नहीं है? अक्षरा इस सवाल से असहज हो उठी, क्यों मेरे अकेले जाने से आपको हर्ज है? जी नहीं, मैं तो यूं ही पूछ रहा था। लड़का भी शायद समझ गया कि वह गलत सवाल पूछ बैठा है, लिहाजा वह दूसरी तरफ देखने लगा।रात काफी बीत चुकी थी, बारिश कभी कम तो कभी तेज हो रही थी। बस पहाड़ी रास्ते की सर्पीली ढ़लान पर आगे बढ़ रही थी। सड़क के दोनों तरफ जंगली झाड़-झंकार अंधेरे में तरह-तरह की आकृतियों का आभास करवा रहे थे। बारिश फिर तेज हो उठी। अक्षरा ने बगल वाले लड़के को देखा, वह शायद सो चुका था। वह चुपचाप बैठी रही। पानी का तेज झोंका जब अक्षरा को भिंगोते हुए आगे बढ़कर लड़के को भी गिरफ्त में लेने लगा तो वह जाग गया, अरे इतनी तेज बारिश है आपने उठाया भी नहीं। उसने खिड़की बंद कर दी। थोड़ी देर बाद बारिश थमी तो खुद ही उठकर खिड़की खोल भी दी। फिर बंद करनी हो तो बोलिएगा, कहते हुए उसने आंखें बंद कर ली।अक्षरा ने घड़ी पर नजर डाली, सुबह के तीन बज रहे थे, नींद से उसकी आंखें बोझिल हो रही थीं। उसने खिड़की पर सिर टेक कर सोना चाहा, तभी उसे लगा कि लड़के का पैर उसके सामने की जगह पर फैला हुआ है, उसने डांटने के लिए जैसे ही लड़के की तरफ सिर घुमाया तो देखा कि उसने अपना सिर दूसरी तरफ झुका रखा था और नींद की वजह से तिरछा हो गया था जिससे उसका पैर अपनी सीट के सामने रहने के बजाये अक्षरा की सीट के सामने फैल गया था। अक्षरा उसकी शराफत पर पहली बार मुस्कुरायी।सुबह के छह बजे बस गंतव्य पर पहुंची। वह लड़का उठा और धड़धड़ाते हुए कंडक्टर के पास पहुंचा, उस लड़की का सामान उतार दे और जिधर जाना हो उधर के ऑटो पर बैठा देना। एक बात और सुन ले। जानबूझकर तूने मुझे वहां बैठाया था, आगे से किसी भी लड़की के साथ मेरे जैसों को बैठाया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। फिर वह उतर कर तेज कदमों से चला गया।
                              सोनी किशोर सिंह 

Friday, 6 December 2013

उसका जाना


रोज की तरह वह ट्रेन के दूसरे दर्जे में खिड़की के पास वाली सीट पर बैठी थी। लेकिन उसके चेहरे पर वो खुशी नहीं दिख रही थी जो पिछले दो सालों से तकरीबन हर दूसरे-तीसरे दिन मैं ट्रेन में चढ़ते ही देखती थी। चेहरे पर उदासी की चादर लपेटे वो खिड़की से बाहर देख रही थी। आमतौर पर वो कानों में इयरफोन लगाये गाने सुनती और नजरें इधर-उधर दौड़ाती रहती। मुझसे नजर मिलते ही हल्की सी स्माइल देकर मुझे अपने पास बुलाती और अपना सीट ऑफर करती। मेरे मना करने पर खुद उठकर मेरे पास चली आती और कान को इयरफोन से आजाद करते हुये चहकती- आप मिल जाती हो तो रास्ता आराम से कटता है नहीं तो मैं बोर होती रहती हूँ। कभी-कभी मैं कहती- तुम झूठ भी कितनी आसानी से बोल लेती हो, आराम से गाने सुनकर इन्जॉय कर रही थी और कहती हो बोर हो रही थी। फिर वो कहती- धत तेरे की, गाने सुनना तो मजबूरी है, अकेले क्या करूँ, सच कहती हूँ मुझे बातें करना बहुत अच्छा लगता है। मैं पूछती- और क्या-क्या अच्छा लगता है, तो कुछ जवाब देने के बदले वो मुस्कुरा देती, जैसे उसकी मुस्कुराहट से ही मैं सब कुछ जान जाऊँगी। अब तो मेरी नजरें भी ट्रेन में चढ़ते ही उसे ढ़ूँढ़ती, जिस दिन वो दिखाई नहीं देती आफिस तक पहुँचने का सफर ज्यादा लम्बा महसूस होता। अभी कुछ दिनों पहले की बात है- शनिवार के दिन ट्रेन में भीड़ कम होती है। मुझे लगा था कि आज आराम से बैठकर मैं उससे गप्पे मारूँगी पर हाय री किस्मत, सारी ट्रेनें ठसाठस भरी दिख रही थी। दो-तीन ट्रेन छोड़ने के बाद मैंने हिम्मत करके एक ट्रेन में अपने लिये जगह बनाई। लेडीज डब्बे की उस धींगा-मुश्ती में जान पे बन आई थी, फिर उससे बातें करने, उसे नजरों के मार्फत ढ़ूँढ़ने का ख्याल तो दूर-दूर तक नहीं रहा। लेकिन ट्रेन से उतरते ही किसी ने पीठ पर हल्के से हाथ मारा। पलट कर देखा तो वही थी, मुस्कुराते हुये कहने लगी- आज तो आप ट्रेन में दिखी ही नहीं, उतरते समय अचानक से आप पर नजर पड़ गई तो मैंने सोचा दो-चार बातें कर लूँ... मैंने कहा- लेकिन मैं तो जल्दी में हूँ फिर कभी बात करेंगे। उसने पूरे अधिकार से कहा- बिल्कुल नहीं, मैं आपके लिये उतरी हूँ इस ट्रेन से नहीं तो दो स्टेशन आगे जाना था और आपको जल्दी है, मेरा भी ऑफिस है मुझे भी देर हो रही है, एक दिन देर से जायेंगे तो क्या हो जायेगा। मुझे लगा उसकी बात मान लेने में कोई हर्ज नहीं है। हम दोनों स्टेशन से बाहर निकल कर एक छोटे से रेस्टोरेंट में घुस गये। उसने बात शुरू की- पता है यहाँ भजिया पाव बहुत अच्छा मिलता है, वही खायें क्या। मैंने हाँ में सिर हिला दिया। आप बहुत कम बोलती हैं, आपको पता है, कम बोलने वाले लोगों का हक मारा जाता है- वह माहौल को अपने अनुकूल बनाने में जुटी थी। मैंने कहा- हाँ मुझे पता है लेकिन तुम बहुत बोलती हो, अब ये बताओ कि क्या हो रहा है जिन्दगी में। वह शरमाते हुये बोली- कुछ खास नहीं। तीन महीने बाद शादी है मेरी, आप आओगी न, नहीं आपसे पूछना क्या, आपको आना ही पड़ेगा। यहीं मुम्बई में है, इसलिये आपका बहाना मैं नहीं सुनूँगी। मैंने खुश होते हुये उससे पूछा- लव मैरिज है तुम्हारी ? वो बोली- हाँ, मैं और विक्रम एक दूसरे को बचपन से जानते हैं...। आपको मिलवाऊँगी उससे, देखना वो आपको बहुत पसंद आयेगा। उसका भरोसा देखकर ही मैं समझ गई कि विक्रम उसे बहुत पसंद है। उस मुलाकात में बाकी की सारी बातें वो विक्रम के बारे में ही करती रही। विक्रम उसका बहुत ख्याल रखता है... विक्रम दुनिया का सबसे अच्छा लड़का है... आदि.. आदि । कुछ देर बैठकर हम दोनों अपने-अपने आफिस की तरफ निकल गये। उस दिन बहुत सारी बातें जान गई थीं मैं उसके बारे में। उसके बाद वो जब भी मिलती, खुश दिखायी पड़ती। इधर कई दिनों तक वो ट्रेन में दिखाई नहीं पड़ रही थी। अब उसकी शादी को सिर्फ एक महीना बचा था। मैंने सोचा शादी की तैयारियों में व्यस्त होगी। कई बार सोचा कि फोन करके पुछूँ कि शादी से पहले इतनी लम्बी छुट्टी लेगी तो बाद में छुट्टियाँ नहीं मिलेंगी, लेकिन अपनी व्यस्तताओं के चलते फोन नहीं कर पाई। पर आज जब उसे ट्रेन में देखा तो वो पहले से बिल्कुल अलग थी। हर वक्त दोड़ने वाली उसकी नजर कहीं शून्य में स्थिर थीं, वो खिड़की की तरफ चेहरा घुमाये शायद कुछ सोच रही थी। आज मैंने खुद उसके पास जाकर हैलो किया, तो उसने एक फीकी मुस्कान दे दी। मैंने चुहलबाजी करने की कोशिश की- शादी एक महीने बाद है, अभी से दोस्तों को भूलने की आदत डाल रही हो...। अचानक उसके गालों पर पानी की बूँदें उतर आईं। मुझे कुछ समझ नहीं आया कि उसे क्या हो गया। मैंने उसका हाथ पकड़ कर आदेश दिया- चलो, अगले स्टेशन पर उतरकर बात करते हैं। वह बिना कुछ बोले मेरे साथ ट्रेन से उतर पड़ी। प्लेटफार्म पर ही एक बेंच पर हम दोनों बैठ गये। क्या हुआ.. बताओ मुझे, एक महीने बाद तुम्हारी शादी है और तुम रोना-धोना कर रही हो, क्यों ?.... उसने बहुत उदास आवाज में कहा- विक्रम चला गया मुझे छोड़कर..। चला गया... कहाँ, किसलिये... मैं भी चौंक सी गई। उसने रोते हुये कहा- हमारी हल्की सी नोंक-झोंक हुई थी किसी बात को लेकर और मैंने गुस्से में आकर कह दिया था कि चले जाओ यहाँ से... पता नहीं मेरी बातों से अपसेट होकर या कैसे जाते समय ही उसकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया और वो....। बाकी की बातें उसकी हिचकियों में खो गई। मैंने दो घंटे तक उसे चुप कराया। कुछ सहज होकर हम दोनों उठे अपने ऑफिस की तरफ चलने के लिये। जाते समय उसने सिर्फ इतना कहा- मैंने तो उसे गुस्से में वहाँ से जाने को कहा था, वो तो दुनिया से चला गया... क्या किसी का जाना इतना तकलीफ देता है....?