Tuesday, 28 January 2014

अंतराल



सोनी किशोर सिंह


आज वर्षों बाद हवाओं में संगीत सा घुल गया था। हमेशा चारदीवारी में घुटकर साँस लेनेवाला मेरा मन कुलांचे भर रहा था। सोये हुये अरमानों को पंख लग गये थे, ऐसे जैसे कोई पंछी पिंजरे से बाहर निकलकर देश-परदेश की सीमाओं की चिंता छोड़कर उड़ा जा रहा हो। मेरी क्षीण होती जीजिविषा को तुम्हारे आने की आस ने प्राण वायु से भर दिया था। मुझे लग रहा था कि ग्यारह वर्षों का ये अंतराल क्षणभर में अदृश्य हो गया। मैं तो समझता था कि ये अंतराल मेरे जीवन के अंत तक यूँ हीं बना रहेगा परंतु आज पता चला कि ईश्वर ने मुझे तुम्हारे प्रेम की संजीवनी पाने के लिये अबतक बचाये रखा था। मैं कितना भाग्यशाली हूँ अरू कि जिस मरीचिका को पाने के लिये मैं दिन-रात प्रार्थना करता था वो स्वयंमेव मुझ तक आ रही है। मैं यह भी जानता हूँ कि जैसे ही तुम मेरी ये बातें सुनोगी तो मुस्कुराकर कहोगी कि मुझे न भाग्य में विश्वास है न प्रेम में, लेकिन मैं जानता हूँ कि मेरे प्रेम की शक्ति और ईश्वर का आशीर्वाद ही है जो तुम्हे मेरे पास ला रहा है।
इन ख्यालों के धुँध से बाहर निकलना नहीं चाहता हूँ लेकिन जिसके ख्यालों में हूँ उसे ही तो लेने आया हूँ, सोचकर ही मै हँस पड़ा था और इसके साथ झटक दिया था ग्यारह वर्षों से अपने और अरूणिमा के बीच जमा हो चुके गर्दो-गुबार को भी। अरू की फ्लाइट कब की आ चुकी थी, वो कहीं खड़ी होकर मेरा इंतजार कर रही होगी, सोचकर ही मुझे गुदगुदी होने लगी थी। मैं तुम्हे देखने के लिये इतना व्याकुल हो रहा था कि सही से चल भी नहीं पा रहा था। भावातिरेक में हाथ-पैरों में कंपन सी होने लगी थी.. अपनी नजरों के विस्तार को अनंत कर तुम्हे जल्दी से देखने की हड़बड़ी में दो-तीन लोगों से टकरा गया था, एक बार तो गिरते-गिरते बचा लेकिन उस वक्त मुझमें इतनी सभ्यता भी नहीं बची थी कि किसी को सॉरी बोलूँ। ऐसी स्थिति में तुम मेरे साथ होती तो जरूर कहती कि गंवार कहीं के, सॉरी बोलना कब सीखोगे ? लेकिन अभी तुम नहीं थी और तुम तक पहुँचने की इस कोशिश में ही सारी गलतियाँ हो रही थीं। मैं इधर उधर भाग रहा था तभी तुमने पीछे से आवाज दी- इतनी जल्दी क्या है, तुम्ही से मिलने आई हूँ... मैंने पलटकर पीछे देखा था, तुम खड़ी थी। मैं कुछ क्षण तक तुम्हें निहारता रहा था। बहुत बदल गई थी तुम। झूठ नहीं बोलूँगा, सेकेंड के शायद हजारवें हिस्से में ये विचार कौंधा था कि तुम पहले जैसी खूबसूरत नहीं रही लेकिन इस लंबे अंतराल ने तुम्हे मेरे लिये दुनिया की सबसे बेशकीमती चीज बना दी थी। तुम्हारे जाने के बाद मैंने तुम्हारा महत्व समझा था। तुम जब मेरे साथ थी तो मैं तुम्हारे साथ साहचर्य कर रहा था और जब तुम मुझसे दूर थी तो मैंने तुमसे प्रेम करना सीखा, खुद को तुम बनकर जीना सीखा। मेरा दिल चाह रहा था कि तुम्हे अपने अंक में लेकर खूब ठहाके लगाऊँ, ठीक वैसे हीं जैसे तुम हँसा करती थी लेकिन मुझे याद आया कि तुम तो चुपचाप खड़ी हो। मैंने खुद को संयत रखने की कोशिश करते हुये कहा था, इतने दिनों बाद मिल रही हो, एक मुस्कुराहट तो जरूरी है... और तुमने कहा- अब मैं तुम्हारी तरह हो गई हूँ सुजीत.. तुम्हे मेरी हँसी अच्छी नहीं लगती थी तो मैंने हँसना छोड़ दिया.. मेरी उम्मीदों के हजारों दीये एक साथ बुझ गये थे और मैं गहन अंधकार में डुबता जा रहा था। तुमने मेरी स्थिति समझ ली थी और बात संभालने की कोशिश में कहा था- जब भी मुस्कुराने की कोशिश करती हूँ होंठ सिल से जाते हैं, मैं क्या करूँ, सुजीत।   
मैंने हाथ बढ़ाकर तुम्हारा सूटकेस लेना चाहा तो तुमने चुपचाप दे दिया, अगर तुम पहले वाली अरू होती तो कहती कि हाथ क्यों कांप रहे हैं तुम्हारे, पहले अपनी भावनाओं पर काबू करो तब मेरे सूटकेस को हाथ लगाओ। तुम रास्ते भर चुपचाप बैठी रही, हिम्मत करके मैंने ही कहा था कि हम अपने घर जा रहे हैं, सोचा था तुम कहोगी कि कौन सा घर, मेरा कोई घर नहीं, मैं किसी होटल में ठहर जाऊँगी, लेकिन तुमने कुछ नहीं कहा था। अपनी मौन सहमति दे दी थी। घर आकर भी तुम बुझी-बुझी ही थी। मैं चाहता था कि हम वहाँ से शुरूआत करें जहाँ से तुम सब कुछ खत्म करके गई थी। लेकिन तुम क्या चाहती हो ये न उस वक्त पता था न आज। इस लम्बे अंतराल में मैंने तुम्हारी हर पसंद-नापसंद को अपना कर तुम्हारी तरह बन गया था अरू, लेकिन तुमने भी मेरी आदतों को अपना कर उस अंतराल को यथावत बना दिया।

Tuesday, 21 January 2014

सुनंदा की मौत के मायने



सोनी किशोर सिंह
सुनंदा पुष्कर

जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता।
एक ख़ुशमिजाज सी दिखने वाली अरबपति औरत के दिल में इतना दर्द होगा ये किसी ने सोचा न था। वो जब भी सार्वजनिक जीवन में दिखतीं तो चेहरे पर एक नूरानी हँसी खिली रहती, जिसे देखकर ये भ्रम होता कि शायद खुशी ने यहाँ अपनी स्थायी जगह बना ली है। और दुनिया को वो खुश दिखे भी क्यों नहीं, बेशुमार दौलत, हुस्न का सैलाब, सफल बिजनेसवुमेन, वाकपटुता के साथ उन्हें राजनीति में सफल एक प्रेमीनुमा पति भी मिला था, जिससे शादी करने से पहले ही वो विवादों में घिर गई थीं। पर इन तमाम सफलताओं के पीछे एक असफलता छुपी थी जिसने सुनंदा पुष्कर को इतना कमजोर कर दिया कि जिन्दगी से वो बेजार हो उठी और मौत की आगोश में सिमट गई।
सुनंदा पुष्कर सबसे पहले तब चर्चा में आयी थीं जब 2010 में इंडियन प्रीमियर लीग की कोच्चि टीम की ख़रीद से जुड़े एक विवाद में उनका नाम आया था। बाद में जब शशि थरूर से उनके रिश्ते मीडिया की सुर्खियाँ बने तो वो विरोधी राजनेताओं की आलोचनाओं की शिकार होने लगी। लेकिन तमाम आरोपों को झेलते हुये सुनंदा ने शशि थरूर के साथ अपने रिश्ते को शादी तक पहुँचाया और इस शादी को सफल बनाने के लिये पुरजोर प्रयास भी किया। लेकिन उनका प्रयास शशि थरूर की फितरत नहीं बदल सका और वो धीरे-धीरे परेशान रहने लगी। जब पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार और शशि थरूर के बारे में सुनंदा ने सवाल करने शुरू किये तो उन्हें शायद कोई संतोषजनक जवाब भी नहीं मिला। अपने पारिवारिक जीवन में हो रहे इतने उथल-पुथल के बावजूद सुनंदा ने हार नहीं मानी और लोगों के सामने अपनी मुस्कुराहट ही बिखेरती रहीं। वो अपने रिश्ते को लेकर इतनी संजीदा थी कि कुछ दिन पहले ही शशि थरूर और सुनंदा दोनों ने मिलकर बयान जारी किया था कि हमारा वैवाहिक जीवन सुखी है और हम चाहते हैं कि यह ऐसा ही चलता रहे। यह एक ऐसा झूठ था जिसके बारे में दोनों को पता था लेकिन सार्वजनिक जीवन में छिछालेदार से बचने के लिये दोनों ने आराम से झूठ बोला। सुनंदा जानती थी कि कहीं न कहीं उनकी अहमियत कम हो रही है लेकिन सच बोलने और सच मानने का हौसला उनमें नहीं था।
सब कुछ खाक हुआ है लेकिन चेहरा क्या नूरानी है,
पत्थर नीचे बैठ गया है, ऊपर बहता पानी है
सुनंदा पुष्कर कश्मीर के सोपोर की रहनेवाली थीं। उन्हें ईश्वर ने कुदरती खूबसूरती और अक्लमंदी बख्शी थी, लेकिन तमाम झंझावातों को झेलने वाली सुनंदा अंदर ही अंदर खोखली हो रही थी। अगस्त 2010 में शशि थरूर के साथ शादी के वक्त उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि मात्र तीन-साढ़े तीन साल की शादीशुदा जिन्दगी उन्हें मौत के सफर तक ले जायेगी। सुनंदा की मौत के बाद जिस तरह से अफवाहें फैली और कई बातें सामने आईं उसमें दो बातें गौर करने लायक थी एक तो वो अपना वसीयत करवाना चाहती थीं और दूसरा वो तलाक के बारे में भी सोच रही थीं। ये दोनों ही बाते उनकी मौत को आत्महत्या के घेरे से बाहर करती हैं।
बड़े शौक़ से मेरा घर जला कोई आँच न तुझपे आयेगी,
ये ज़ुबाँ किसी ने ख़रीद ली ये क़लम किसी का ग़ुलाम है
अक्सर ऐसी मौत की फाइलें आत्महत्या का नाम पाकर अपनी मन्जिल पा लेती हैं। लेकिन हाई प्रोफाइल सुनंदा पुष्कर की मौत भी संदेह के घेरे में है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ड्रग का ओवरडोज बताया जा रहा है लेकिन यह सोचने वाली बात है कि आईपीएल विवाद को हँसते-हँसते झेलने वाली संघर्षशील सुनंदा अपनी मौत से पहले थरूर और मेहर के रिश्ते पर खुलकर बोली थीं। उन्होंने ऐसे कोई संकेत नहीं दिये थे जिससे ये लगे कि वो हार चुकी हैं। फिर अचानक से ड्रग का ओवरडोज संदेह पैदा करता है। मौत चाहे प्राकृतिक हो या अप्राकृतिक, आत्महत्या हो या हत्या उसमें एक सत्य यह है कि सिर्फ सुबूत बोलते हैं मृतक नहीं और सुबूत इकट्ठा करने वाली व्यवस्थायें कहीं किसी के प्रभाव में हो तो न्याय खामोश हो जाता है।