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| सुधा अरोड़ा |
सोनी किशोर सिंह
‘एक स्त्री जब एक स्त्री भर नहीं रह जाती
एक जलता हुआ सवाल बन जाती
है
ऐसे सवाल को कौन गले लगाना चाहता है।’
- यह
सवाल है कवयित्री और कथाकार सुधा अरोड़ा का और इसका जवाब भी वो खुद देती हैं अपने
लेखन के जरिये, अपनी
सामाजिक प्रतिबद्धता के जरिये। कहानी, उपन्यास और आलेखों के माध्यम से स्त्री-विमर्श के विभिन्न
पहलुओं पर कलम चलाने वाली सुधा अरोड़ा बीते पांच दशक से हिंदी साहित्य को समृद्ध
बनाने में जुटी हुई हैं। साहित्य की करीब सभी विधाओं में उन्होंने अपनी उपस्थिति
से पाठकों का एक बड़ा वर्ग तैयार किया है। साफगोई उनके लेखन में ही नहीं, निजी
जिंदगी में भी परिलक्षित होती है। अपनी कहानियों में बौद्धिक छल अथवा लोलुपता की
बजाए सुधा अरोड़ा ने स्त्री-विमर्श के बहाने उसका समाजशास्त्रीय विश्लेषण कर
साहित्य में नई जमीन तैयार की है। उम्र के ऐसे पड़ाव पर जब लेखक अपने पूर्व लेखन
पर आत्ममुग्ध होकर महज चिंतन को औजार बनाने से आगे नहीं बढ़ पाते, सुधा
अरोड़ा न केवल अपनी सोच को नई धार दे रही हैं बल्कि साहित्य और समाज के विभिन्न
मंचों पर स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में सक्रिय हस्तक्षेप भी कर रही हैं।
प्रस्तुत है
अपने लेखन में नारी संवेदनाओं, संघर्ष, पीड़ा और विद्रोह के यथार्थ को अपने साहित्य में नया स्वर
देने वाली, स्त्री
सशक्तिकरण की अगुआ लेखिका सुधा अरोड़ा से उनके लेखकीय सरोकार समेत कई मुद्दों पर सोनी किशोर सिंह की बातचीत
के प्रमुख अंश -
आपके लेखन की शुरूआत कैसे हुई ?
माता-पिता के साहित्यिक रूझान से लेखन के बीज
मेरे भीतर अंकुरित हुए। मेरी माँ अपने परिवार की पहली प्रभाकर (स्नातक) कन्या थीं, साहित्य रत्न में दाखिला ले चुकी थीं जो एम.ए. के बराबर था। पिता अपने परिवार के पहले बी. कॉम पास थे। घर में साहित्यिक वातावरण था। विप्लव, विशाल भारत, हंस आदि तमाम हिंदी
पत्रिकाएं आती थीं, जिन्हें जिल्द बंधवा कर पिता ने संजो रखा था।
दूसरी वजह मेरी बीमारी थी। बचपन में बीमारी के
दौरान हमेशा बिस्तर पर पड़े रहना मेरी दिनचर्या हो गई थी। मां की दी हुई डायरी
में मैंने लिखना शुरू किया। पहली कहानी लिखी 'एक सेंटीमेंटल डायरी की मौत।' यह कहानी सारिका में मार्च, 1966 में छपी थी। हालांकि इस
कहानी के स्वीकृत होने और छपने में एक साल का अंतर रहा और इस बीच मेरी और कहानियां
छप गई थीं। इस लिहाज से मेरी पहली छपी हुई कहानी 'मरी हुई चीज' थी जो 1965 में ज्ञानोदय में छपी। तब मैं अठारह साल की थी।
यानी अगले साल आपको लिखते हुए पूरे पचास साल
हो जायेंगे ?
हां, पांच दशक। विश्वास नहीं होता कि इतना
समय बीत गया। कहानी विधा में ही कितनी किस्में देखीं। कितनी तोड़-फोड़ देखी। आज
अपनी ही पुरानी कहानियां अपनी पहचान में नहीं आतीं कि हम ऐसा भी लिखा करते थे।
समय के साथ-साथ हम अपने आप को बदलते चलते हैं। जैसे पहरावा, जीवन शैली, सोच बदलती
है वैसे ही लेखन के कथ्य, विषय और भाषा में भी बदलाव आता है। पर अन्तत: बचता
वही है जो सामाजिक सरोकार रखता है और अपने समय से जुड़ा रहता है। देश और समाज से
कटा हुआ एकांगी या सनसनीखेज लेखन प्रोमोशन के जरिये सिर्फ तात्कालिक प्रसिद्धि पा
सकता है, कालजयी नहीं हो सकता।
'एक
सेंटीमेंटल डायरी की मौत'
के बाद भी आपने मौत को लेकर कई कहानियां लिखीं। आप मृत्यु को किस तरह से देखती
हैं ?
अजीब बात है कि 1965
के बाद भी मैंने कई कहानियां मौत पर लिखीं। अभी हाल ही में साहित्य अमृत के
फरवरी अंक में छपी मेरी कहानी ‘’खिडकी’’ का विषय भी मौत ही है। मृत्यु एक ऐसी
स्थिति है जो आपको अपने अंदर खंगालने के लिये विवश करती है, आपकी सोच को विस्तार
देती है, आपको अच्छा इंसान बनाती है। प्रख्यात स्वीडिश निर्देशक इंगमार बर्गमैन
की एक फिल्म थी ‘द सेवेंथ सील’। मौत के इर्द गिर्द घूमती और जिंदगी को कस कर
थामे हुए। जब आप यह सोचते हैं कि मृत्यु ही एक चरम सत्य है और हमें आखिर सब कुछ
छोड़ कर चले ही जाना है तो आप दार्शनिक होकर छोटे-छोटे राग द्वेष से उपर उठ जाते हैं। मौत दहशत नहीं देती, आपको अच्छा बनने की प्रेरणा देती है। मृत्यु का भय आपको
आध्यात्मिक भी बनाता है। भौतिक सुख सुविधाओं से मन हट जाता है। मौत से हाथ मिला
लेना आपको जिन्दगी जीने के गुर सिखा देता है।
लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है कि लोग मृत्यु के
भय से अकर्मण्य हो जायें और सुख-सुविधाओं में लिप्त रहें ?
नहीं, ऐसा नहीं है। ऐसा
लगता है कि आजकल के युवाओं के अपेक्षाकृत बडे तबके पर बाजारवाद और मॉल कल्चर हावी
है, लेकिन प्रखर जागरूक युवाओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो ‘खाओ-पीयो, मौज करो’ और संचय
की प्रवृति से काफी दूर है। वे जानते समझते हैं कि उन्हें क्या करना है। भौतिकवादी
चीजों के संग्रह के लिये वे प्रयास नहीं करते। ऐसे युवा सामाजिक कार्यकर्ता बहुत हैं जो विदेश से
तालीम हासिल करने के बाद भी अपने देश की तरक्की के लिये जी–जान से जुटे हैं। आय.आय.टी.
के कितने ही छात्रों को जानती हूं जो अपने सुनहरे कैरियर को तिलांजलि देकर गांव-देहात
की बेहतरी के लिये काम कर रहे हैं। देश के लिये कुछ कर गुजरने का जज्बा इन
युवाओं में है। जाहिर है, उन्हें ऐसे संस्कार अपने परिवारों से मिले हैं। यह
सच है कि इतनी ज्यादा आबादी वाले देश की बेहतरी के लिये ऐसी एक बड़ी जमात की जरूरत
है।
आपके
लेखन और जीवन पर लौटे। आपके जीवन का शुरूआती हिस्सा कोलकाता में बीता, मुंबई आने
के बाद कोलकाता की याद तो आती होगी ?
कलकत्ता में मैंने
25-26 साल गुजारे। शादी के बाद मुंबई आने के बाद लगभग दस साल तक तो मैं कलकत्ता
के प्रभामंडल से बाहर ही नहीं आ पाई। कलकत्ता के वाशिंदे इतने आत्मीय है जैसे आपको
दुनिया के किसी शहर में नहीं मिलेंगे। ऐसे ही नहीं विदेशी पत्रकारों और यायावरों
ने – सिटी ऑफ जॉय - कलकत्ता की शान में कशीदे पढे हैं। कहने को कलकत्ता महानगर है
लेकिन उसमें एक गाँव की सारी खूबियां मौजूद है। कलकत्ता के लोग बड़े मिलनसार और
आतिथ्यभाव से भरपूर हैं। बंबई आर्थिक राजधानी है और सही मायनों में एक महानगर है जहां
पडोसी अपने बगल के पडोसी को नहीं जानता, जहां एक के पास दूसरे के लिये कतई समय
नहीं। लेकिन कलकत्ता एक महानगर होते हुए भी एक जागरूक विरासत लिए सांस्कृतिक रूप
से समृद्ध और सुरूचिसंपन्न शहर है।
सुधा अरोड़ा को बनाने में कोलकाता का कितना
योगदान है ?
मैं जो हूँ अपने
माता-पिता के दिये संस्कारों की वजह से। हां , शहर का भी कुछ असर तो पडता ही है। दिल्ली में होती तो शायद कुछ और होती। कोलकाता की वजह से ही मेरे लेखन में सामाजिकता,
सरोकार और प्रतिबद्धता आई। कोलकाता शहर हमेशा से मेरी दुखती रग रहा है। अब पिछले
चालीस सालों से मुंबई में रहते- रहते इसकी आदत हो चली है।
आपकी कहानियों में महिलाओं की पीड़ा, मनोदशा
आदि को बहुत प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया गया है, अगर ये कहा जाये कि आपने
स्त्री विमर्श को नया आयाम दिया तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
मैंने सायास कभी स्त्री
विमर्श नहीं किया। वर्ष 1980-81 तक मैंने जो लिखा उस समय तक मुझे स्त्री विमर्श
का क-ख-ग भी मालूम नहीं था। बस मैं अपने अनुभव, आस-पास की समस्याओं पर लिख रही थी।
1993 के बाद जब मैंने पुनः लिखना शुरू किया तो 12-13 वर्षों के जो अनुभव भीतर कैद थे
वो खुलकर बाहर आने लगे। तब तक मैं घरेलू गृहिणी के रूप में सीजन्ड हो चुकी थी।
परिवार की जिम्मेदारियों से अपने लिये कुछ घंटे चुरा लेना भी गलत लगता था।
उन दिनों मैंने कई
छोटी छोटी कहानियां लिखीं। मेरी दस बारह ऐसी कहानियां हैं जिसमें विस्तार की पूरी
गुंजाईश थी लेकिन मैंने उसे कस कर छोटी कहानी के फॉर्मेट में लिखा और वह पूरी तरह
कारगर सिद्ध हुआ। किसी भी कहानी को फैलाकर लिखना आसान है पर ऐसे लिखना कि उसमें
एक पंक्ति काटी न जा सके ज्यादा मुश्किल है और इसलिये असरकारक भी है।
क्या पहले के मुकाबले स्त्रियों की स्थिति
में बदलाव नहीं आया है ?
कुछ
मुट्रठी भर महिलाओं को समाज में अपना एक प्रतिष्ठित मुकाम हासिल करते हुए हम देखते
हैं और यह धारणा बना लेते हैं कि महिलाएं अब दोयम दर्जे से बाहर निकल आई हैं और हर
जगह अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं| सच
तो यह है कि यह मुकाम एक या दो प्रतिशत महिलाओं ने ही हासिल किया है।
समाज में महिलाओं का एक बड़ा तबका आज भी समस्याओं से जूझ
रहा है। जो महिलाएं बदलाव लाना चाहती हैं, वे राजनीति में हों, न्यायालय में या पुलिस में, उनकी राह में भी लगातार बाधाएं खड़ी कर दी जाती हैं। उन्हें आज
भी प्रभुताशाली वर्ग गंभीरता से नहीं लेता और भरसक नजरअंदाज करने या उनका नोटिस न
लेने की कोशिश करता है। निर्भया
कांड के बाद स्थितियों में कुछ तब्दीली तो आई है। कानून कड़े हुए हैं। यौन हिंसा
की शिकार लडकियों की शिकायतें पुलिस स्टेशनों पर दर्ज की जा रही हैं। लंबा समय
इससे जूझते हुए गुजरा है आखिर।
स्त्री
विमर्श भी कई खानों में विभाजित हो गया है, दलित और आदिवासी महिलाओं के नाम पर अलग
से विमर्श चलाने की कोशिश की जा रही है । ऐसे में इन विभाजनों के रहते सशक्तिकरण
कैसे संभव होगा ?
गुटबाजी तो हर जगह
है लेकिन ऐसा नहीं है कि दलित, सवर्ण, आदिवासी महिलाओं का कोई आपसी विरोध हो। बुनियादी
तौर पर स्त्री पुरूषसत्तात्मक समाज द्वारा शोषित और सताई हुई है। इसके पीछे का
कारण उसका आर्थिक रूप से अधिकार विहीन होना है। हालांकि गांव में अब भी स्त्री
उत्पीडन के पीछे जाति एक घटक है लेकिन इसकी बुनियाद में भी महिलाओं का आर्थिक रूप
से कमजोर होना ही है। इस बात को अलग विशेषता बनाने से स्त्री मुक्ति का बुनियादी
संघर्ष कमजोर पड़ेगा और स्त्रियां जाति के खाने में विभाजित होती जाएंगी। यह घातक
प्रवत्ति हो सकती है। इसलिये संपूर्ण रूप से महिलाओं की एकता जरूरी है ताकि वे
लैंगिक भेदभाव और गुलामी से मुक्त हो सकें। सवर्ण लेखन हो या दलित लेखन,
महिलायें जहां भी लिखेंगी वो अपनी पीड़ाओं के बारे में ही लिखेंगी। आपस में कोई
रस्साकशी नहीं होनी चाहिए।
क्या नारीवाद का अर्थ ही पुरूष के खिलाफ होना
है ?
ऐसा समझा जाता है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था और शोषण
के विविध रूपों का धारक पुरूष है और इसलिये हिंसा तथा प्रताडना का जिम्मेदार भी वही
है। हकीकत यह है कि अगर हम कारणों की तह तक जायें तो सारा असामंजस्य और असंतुलन हमारी सामाजिक व्यवस्था
का है जिसके तहत पुरूष स्वयं भी उस सामाजिक व्यवस्था , परंपरागत सोच और रूढिग्रस्त संस्कारों का शिकार - विक्टिम ) है जो बचपन से उसकी शारीरिक संरचना में, उसके सिस्टम में इस कदर पैठ गया है कि वह चाहकर भी इससे छुटकारा नहीं पा सकता।
सिमोन की विख्यात पंक्ति है - ‘One is not born a
woman, but becomes one.’ जिस
तरह लड़की पैदा नहीं होती, उसे
बनाया जाता है, वैसे
ही लड़का भी पैदा नहीं होता, उसे
बचपन से ही ठोक पीट कर लड़का बनाया जाता है। वह
रोये तो उसके आंसू छीन लिये जाते हैं - क्या
लड़कियों की तरह रोता है ! (यानी
रोना गले तक आये तो भी आंसू मत बहा , क्योंकि
आंसुओं पर लड़कियों की बपौती है ) उससे
कोमल, नरम, भीगे रंग छीन लिये जाते हैं - तू
क्या लड़की है जो पीला गुलाबी रंग पहनेगा? उसके
लिये गाढ़े रंग हैं - काला, भूरा, गहरा
नीला रंग ही उस पर फबेगा, आसमानी
या गुलाबी में तो वह लड़की दिखेगा ! उसे
सॉफ्रट टॉयज़ नहीं दिये जाते - तू
क्या लड़की है, जो
गुडि़या से खेलेगा ! उसके
हाथ में पज़ल्स, ब्लॉक्स, बंदूक और मशीनी औजार थमा दिये जाते हैं। यानी एक
बच्चे को शुरू से ही कठोर, वर्चस्ववादी,
हिंसक होने का रोल थमा दिया जाता है। माना कि प्रकृति ने स्त्री और पुरुष की जैविक संरचना में आधारभूत अंतर रखा है पर प्रकृति ने जिस अंतर को एक दूसरे के पूरक के रूप में गढ़ा है, हम
उसे ठोक-पीट कर दो परस्पर प्रतिद्वंद्वी या विपरीत खेमे में बदल देते हैं। दोनों
युद्घरत पक्ष ताउम्र सींग लड़ाते आपस में लहूलुहान होते रहते हैं या एक फुंफकारता है और दूसरा अपने बचाव में आड़ लेता उम्र गुज़ार देता है। दरअसल पुरुष स्वयं भी उसी सामाजिक व्यवस्था, परंपरागत
सोच और रूढिग्रस्त संस्कारों का शिकार ( विक्टिम ) है !
आपको नहीं लगता कि आर्थिक आधार पर मजबूत होकर
ही स्त्री सशक्त हो सकती है ?
सशक्तिकरण का इस तरह
सरलीकरण नहीं किया जा सकता। एक लंबे समय से हम देख रहे हैं कि कारोबार और
नौकरियों में भारी संख्या में आने के बावजूद स्त्रियां अब भी पुरूषों के नियंत्रण
से अपने को मुक्त नहीं कर पाई हैं क्यों कि घर के भीतर परिवार और बाहर समाज अपने
हिसाब से गढता और चलाता है। आर्थिक सशक्तिकरण भी स्त्री को परिवार या समाज से
विद्रोह करने की स्थिति में नहीं ले जाता इसलिये बुनियादी चीज यह है कि पुरूषों की मानसिकता में
बदलाव आये । महिलाओं के प्रति समाज की जो सोच है उसमें बदलाव आना चाहिए। इसके लिये
साहित्य, दृश्य मीडिया, फिल्में, कानून-तमाम क्षेत्रों में बड़े स्तर पर कोशिश
की जा रही है।
स्त्री विमर्श से जुड़ा ज्यादातर लेखन
लाइब्रेरी या बुक स्टॉल की शोभा बढ़ाते हैं, जिन स्त्रियों के लिये किताबें लिखी
जाती हैं, क्या उनतक पहुंच पाती हैं ?
जी हां, प्रताड़ित
महिलाओं की संख्या करोड़ों में है और किताबों की बिक्री हजारों में होती है।
हालांकि कुछ चीजें कार्यकर्ताओं के माध्यम से गाँव की महिलाओं तक पहुंचती हैं
लेकिन वंचित, उत्पीड़ित महिलाओं तक किताबें नहीं पहुंच पाती ।
मैंने एक कहानी लिखी
थी 'अन्नपूर्णा मंडल की
आखिरी चिट्ठी', जो एक गरीब परिवार से आई और एक सम्पन्न घर में ब्याह दी गई सुन्दर कन्या
की प्रताड़ना की कहानी है। उस लड़की को ससुराल वाले यातना देते हैं और आत्महत्या
से पहले वो आखिरी चिट्टी लिखती है। पूरी कहानी केंचुए के प्रतीक के रूप में मैंने
लिखी थी। मैंने यह कहानी मुंबई में अनपढ़ महिलाओं के बीच में सुनाई और इन प्रतीकों
को समझने में उन महिलाओं को जरा भी दिक्कत नहीं आई । जरूरी है कि कथाकार खुद
कार्यकर्ता भी बने और लोगों तक अपनी बात पहुँचाये।
इस दिशा में एक छोटा
सा प्रयास मेरी संपादित किताब औरत की कहानी में है जहां हमने अशिक्षित और
अर्द्धशिक्षित महिलाओं को आसान भाषा में लिखी हुईं और सकारात्मक संदेश देने वाली कई
कहानियां सुनाईं । इसमें महाश्वेता देवी (बांग्ला) और मन्नू भंडारी से लेकर
उर्मिला पवार (मराठी) तक की सोलह महिला रचनाकारों की कहानियां हैं। इन पर उन
महिलाओं के बीच बेहतरीन चर्चा हुई। यह किताब ज्ञानपीठ से प्रकाशित है।
क्या लेखकों का दायित्व नहीं बनता कि वो अपना
लिखा उन पाठकों तक पहुंचाये जिनपर कथावस्तु आधारित है ?
हां, बिल्कुल बनती
है। कुछ जगहों पर कहानी पाठ, कविता पाठ के माध्यम से लोगों तक लेखक अपनी पहुंच
बनाते हैं। हमारे यहां दिक्कत यह है कि जो लोग लिखते हैं वो सामाजिक कार्यकर्ता
नहीं होते, सिर्फ साहित्यकार होते हैं। बंद कमरों में बैठकर लिखते हैं और खुद को
जस्टीफाई करते रहते हैं। जबतक वो जमीन से नहीं जुड़ेंगे तबतक स्थिति खराब ही रहेगी। एक रचनाकार का सामाजिक कार्यकर्ता होना बेहद जरूरी है - सिर्फ शोध करने के लिये
और लेखन के लिये कच्चा माल जुगाड करने के लिये नहीं, बल्कि उनके अपने अंदर का
कोई तंतु उस हाशिये की तकलीफ से जुडा हो तभी लेखन धारदार होगा और किसी बदलाव को ला
पाने में समर्थ होगा।
क्या साहित्य से समाज के बदलने की गुंजाइश
बनती है ?
इस
बात पर यकीन करने का कोई कारण नहीं है कि साहित्य कारगर औजार
नहीं रह गया है और
इससे समाज नहीं बदलता। समाज में
धंस कर बैठी हुई ग़लत रूढि़यों और परम्पराओं पर साहित्य का कोई असर नहीं होता। साहित्य सिर्फ
पढ़े-लिखों का फि़तूर और कवायद बनकर रह गया है। मेरे निजी अनुभव बताते हैं कि आप समझ में आने वाली भाषा में
ऐसे मुद्दों पर बात करें जो आज के समय में स्त्री और पुरुष के गले की फांस बन
गये हैं तो कौन से दंपति ऐसे होंगे जो अपनी जि़न्दगी को बेहतर बनाने के लिये
स्थितियों को समझना और अपने को बदलना नहीं चाहेंगे। ऐसे अनगिनत
उदाहरण हैं मेरे पास।
मेरा
एक आलेख
-'जिसके निशान नहीं दिखते' प्रमुख अखबार 'द हिंदू' के
मैंगज़ीन में 30 मार्च 2008 को अंग्रेज़ी में ( द वायलेंस ऑफ सायलेंस ) प्रकाशित हुआ था
और उसमें मेरा मेल आई डी दिये जाने के कारण दो दिन में पूरे भारत से सौ से ऊपर
संदेश आये थे।
कुछ भुक्तभोगी महिलाओं के, कुछ उनके भाइयों और बेटों की ओर से। तभी मैंने
इसे पहचाना कि हमारे समाज में मानसिक प्रताड़ना और चुप्पी की हिंसा की समस्या
कितनी अनचीन्ही रह गई है। आज भी इसे पढ़ने के बाद महिलायें अपनी त्रासदी को शेअर करने
के लिये अपनी बरसों की चुप्पी को तोड़ती हैं। लेकिन जिस
बात ने मुझे सचमुच सार्थकता का अहसास करवाया, वह था इस आलेख पर पुरुषों की बेहद सार्थक प्रतिकि्रया। जिन्हें अपना नाम दिये जाने से परहेज़ नहीं, मैं उनकी प्रतिकि्रया की बात करना चाहूंगी।
एक
वरिष्ठ रचनाकार श्री सिद्घेश्वर प्रसाद सिंह बोले - आपके लेख का एक पैराग्राफ मुझे भीतर तक छू गया। मैं अब वह नहीं रह गया जो कल तक था। सचमुच जब
मैं लिख रहा होता था और कमरे में मेरी पत्नी चाय का कप उठाने या बच्चा गेंद खेलते
खलते आ जाता था तो मैं इतनी जोर से चिल्लाता था जैसे घर सिर्फ मेरा है, उनका नहीं। अब मैं आपकी
बात याद रखूंगा।
एक युवा लेखक ने कहा - दीदी , मैं
सच कहता हूं, आज के बाद से मैं कभी
अपनी पत्नी के पकाए खाने में बेवजह नुक्स नहीं निकालूंगा।
मुंबई
की एक लघु पत्रिका 'सृजन संवाद' में मेरी डायरी के कुछ अंश छपे थे| एक दिन उसके संपादक प्रो. संजीव दूबे ने फोन पर बताया -'' मेरी पत्नी डॉक्टर के पास जा रही थी। मैंने उसे रोककर कहा - मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं। मुझे आपकी
लिखी बात याद आ गई कि ये पति नहीं जानते कि उनकी पत्नियों की आधी बीमारी तो उनके
पतियों के साथ चलने भर से ठीक हो जाती। ''
मराठी
में मेरे आलेखों के संग्रह ''उंबरठ्रयाच्या
अल्याड पल्याड'' में यह आलेख है| एक दिन लातूर से प्रोफेसर राजा होलकुंडे का फोन आया| उन्होंने कहा- मैं आपसे अपना एक अनुभव बांटना चाहता हूं। मैंने आपका
आलेख बहुत ध्यान से पढ़ा और मुझे लगा, मैं भी तो यही कर रहा हूं। घर लौटते ही
इतना चिल्लाने लगता हूं कि परिवार के सब सदस्य दहशत में आ जाते हैं।
मेरी पत्नी भी मेरे सामने बिल्कुल आवाज़ नहीं निकालती। मेरे मन में
आया कि मुझे अपने को बदलने की कोशिश करनी चाहिये। कुछ दिन
मैंने अपने को बदलने के फैसले पर अमल किया। चौथे दिन
मेरी पत्नी बहुत हैरान-परेशान दिखी और मेरे पास आकर चिंतातुर होकर बोली कि सब ठीक
तो है? आप इतने चुप क्यों हैं? आपकी तबीयत तो ठीक है? मैंने तब उसे भी आपका लेख पढ़वाया। अब हमारी जि़ंदगी पहले से बहुत स्मूद चल रही है।
फिर भी इससे इनकार नहीं किया
जा सकता कि बदलाव उन्हीं में आएगा जो अपने को बदलना चाहते हैं यह एक तल्ख
सच्चाई है। जो अपने
पौरुषीय अहंकार और शॉविनिज़्म को 'फेदर
इन द कैप'
की तरह सजाकर बैठे हैं, वे ताउम्र इसी के साथ जि़ंदगी बसर करेंगे। जो अपने को
बदलना चाहते ही नहीं, उन्हें कोई
क्या खाकर बदलेगा !
