सोनी
किशोर सिंह
हिन्दी साहित्य में सूर्यबाला जी का नाम सूर्य के समान
दैदीप्यमान है। अपनी कहानियों, उपन्यास और व्यंग्य के माध्यम से उन्होंने समाज की
कुरीतियों, अंधविश्वासों, परंपराओं पर जमकर लिखा है और साहित्य को समाज से जोड़ने
में महनीय भूमिका निभाई है। उनकी लेखनी की विविधता इन्द्रधनुष की भांति है जिसमें
सभी रंग दिखाई पड़ते हैं। एक तरफ वो संबंधों की नाजुक डोर को संवेदनशील तरीके से
शब्दों में बांधती हैं तो दूसरी तरफ हास्य व्यंग्य की धार से लोगों को गुदगुदाती
भी हैं। सुविख्यात कथाकार सूर्यबाला जी से उनके लेखन, जीवन, साहित्य समेत अनेक
मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई, प्रस्तुत है उनसे हुई भेंटवार्ता का संपादित अंशः
| सूर्यबाला |
अपने बचपन के बारे में बताइए?
अपने बचपन पर मुझे बेहद गर्व है। इस बचपन में मुझे जो लाड़-दुलार,
शिष्टाचार,
अनुशासन और साहित्य, संगीत
से जुड़े सुरुचिपूर्ण संस्कार मिले हैं, उन्होंने मुझे अपना जीवन
सही तरीके से जीने का एक सलीका दिया है। मेरा बचपन मुझे आज तक रास्ता दिखाता आया है।
मेरे पिता शिक्षा-अधिकारी थे। घर में चारों तरफ पाठ्यक्रमों
के लिये स्वीकृत होने आई पुस्तकें ही पुस्तकें। माता-पिता विद्वान नहीं थे लेकिन सुरुचि
संपन्न थे। सामान्य मध्यवर्गीय परिवार होते हुए भी मेरे घर की बनावट (स्थापत्य) से
लेकर अंदर की साज-सज्जा तक, मुझे अभी तक याद है।... हरे-भरे पौधे, फौव्वारे, मछलियां, हारमोनियम, ग्रामोफोन, बांसुरी...
हिंदी,
अंग्रेजी, संस्कृत की पुस्तकें, पत्रिकाएं...संस्कृत
ग्रंथों की टीकाएं, रामायण और सुदामा चरित
भी। दीवारों पर सस्ते कैलेंडरों की जगह राजा रवि वर्मा के चित्र... आदि। अपने माता-पिता
की सौन्दर्य-भावना और जिंदादिली दोनों की मैं कायल हूं।
आज से साठ-पैंसठ वर्ष पूर्व हम चारों बहनों को हमारे मध्यवित्तीय
माता-पिता ने शहजादियों की तरह पाला-पोसा। यह समृद्धि पैसों की नहीं, स्नेह
ममता और सुरुचि संपन्नता की थी। अपनेपन और साफगोई की थी। हम कैसा बोलें, कैसा
पहनें और क्या सोचें, हमारे विचारों की दिशा क्या हो, यह सब
अलग से समझाया,
बताया नहीं गया, लेकिन शायद माँ-बाबूजी
के आचरणों की वजह से हममें आता चला गया।
आधी सदी पहले भी, हम बहनों में कभी ‘चार
लड़कियां‘
(बेटियां) होने की कुंठा नहीं पैदा हुई। विवाह, दहेज
आदि का हौव्वा भी नहीं... जबकि आर्थिक दृष्टि से हम अत्यंत सामान्य स्तर के थे।
बचपन में ही, अचानक पिता की मृत्यु हो जाने के बाद भी मां
ने अत्यंत अभाव और असहाय स्थितियों में भी हम चारों बहनों और छोटे भाई को उसी संकल्प
और विश्वास के बल पर बड़ा किया। उच्च शिक्षा दी। यह मां के त्याग और तपस्या का ही प्रतिफल
था कि शहर में उनकी चारों बेटियों के विवाह, बिना
दहेज संपन्न हुए।
शायद इसलिए, आज भी मैं माता-पिता, परिवार
तथा वातावरण द्वारा ‘बच्चे‘ को मिलने
वाली शिक्षा और संस्कारों को बहुत महत्व देती हूं। बच्चों से ज्यादा उनके युवा माता-पिता
को प्रशिक्षित करने वाली कार्यशालाओं की आवश्यकता महसूस करती हूं जिससे वे अपने बच्चों
को वह दृष्टि,
समझ और संस्कार दे सकें जो उन्हें एक सही मनुष्य बनने की दिशा
में प्रेरित कर सके।
लेखन
की शुरुआत कैसे हुई। क्या लेखिका ही बनना चाहा था या संयोगवश लेखन के क्षेत्र में आना
हुआ ?
चूंकि मेरे लिखने की शुरुआत काफी छुटपन में और खेल खेल में, अनायास
हुई थी,
इसलिए लेखिका बनने जैसी किसी महत्वाकांक्षा का दूर-दूर तक कोई
प्रश्न ही नहीं था। सात-आठ वर्ष की आयु में एक शाम अकेली होने पर यूं ही एक कविता सी
रचती चली गई जब बड़ी बहनों को बताया, तो उन्होंने खुश होकर प्रयाग से प्रकाशित होने
वाली पत्रिका ‘संगम‘ के ‘बाबा
जी की क्यारी‘
स्तंभ में भेज दी। संयोग देखिए कि उसके युवा उपसंपादक डॉ. धर्मवीर
भारती थे जो बाद में ‘धर्मयुग‘ जैसी
प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादक हुए और वयस्क होने पर जहां मेरी पहली कहानी ‘जीजी‘ (1972 अक्टूबर), कमलेश्वर
जी ने ‘सारिका‘ में
छापी वहीं पहली व्यंग्य रचना और दूसरी कहानी ‘अविभाज्य‘ भारती
जी ने धर्मयुग में प्रकाशित की।
आपके
लेखन की शुरुआत से अब तक बहुत बदलाव आये... ये बदलाव नकारात्मक थे या सकारात्मक ?
ऐसा नहीं था कि उन दिनों समाज, जीवन
या लेखन में नकारात्मक तत्व नहीं थे। मुझे याद है सड़क छाप छिछली पुस्तकें पढ़ने की हमारे
घरों में सख्त मनाही थी। उसका अर्थ अब समझ में आता है। क्योंकि उससे मन और विचार दूषित
होते हैं जबकि साहित्य का लक्ष्य सारे नकारात्मकता के बीच से भी जीवन को, मनुष्य
को,
समृद्ध करना होता है।
यह एक मानी हुई बात है कि आज सारी भौतिक उपलब्धियों और सुविधाओं
की भरमार के बावजूद सूचनातंत्रों ने मानवीय संवेदना के स्रोतों को लगभग सोख लिया है।
यंत्रयुग की ‘रैट-रेस‘ कह लीजिए
या ग्लैमर की चकाचौंध ने मनुष्य का मनुष्य के प्रति विश्वास खत्म किया है। परिवार टूटन
और विखंडन की कगार पर हैं। जबकि मैं जीवन में मोहबंधों और जुड़ावों को बहुत महत्व देती
हूं। मेरा विश्वास है कि सारे अपसांस्कृतिक तत्वों और विरूपताओं के बीच से साहित्य
ही मनुष्य को जीने का सलीका सिखा सकता है। उसे जीवन मूल्यों से समृद्ध कर सकता है।
याद करती हूं तो लगता
है कि आज मैं जो कुछ हूं उसका बहुत सारा श्रेय प्रेमचंद, प्रसाद, शरतचंद्र, रवीन्द्रनाथ
ठाकुर तथा हिंदी की उन तमाम कालजयी कहानियों को जाता है जो हमें अंदर तक छू जाती थीं, समाप्त
करने के बाद भी भुलाये नहीं भूलती थीं और हमारे अंदर ‘ईदगाह‘ के हामिद, बूढ़ी
काकी,
होरी, धनिया (प्रेमचंद) आकाशदीप की चंपा, ममता
(प्रसाद),
रामू की बहू (भगवतीचरण वर्मा) और सूबेदारनी तथा लहना सिंह (उसने
कहा था) जैसे चरित्रों का एक संसार बसता जाता था। हम उनकी करूणा से द्रवित, अन्याय
से आक्रोशित
और उनके पछतावों से भींग-भींग जाया करते थे। तो वे कहानियां
हमें संवारती,
संस्कारित करती थीं।
आजकल
स्त्री-विमर्श के नाम पर अश्लील साहित्य रचे जा रहे हैं ?
यह आज के लेखक का एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष है कि विश्व में
आये ‘बाजारवाद‘ पर लानतें
भेजने वाला साहित्य भी आज एक बड़े बाजार में तब्दील हो चुका है। यहां वही बिकता है जिसकी
डिमांड होती है। और इन दिनों जो लाउड, घटिया तथा पाठकों की
रुचि को प्रदूषित करने वाले लेखन की डिमांड बढ़ी उसके पीछे व्यावसायिक शक्तियों की साजिश
है। स्त्री-विमर्श भी कुछ तथाकथित संपादकों और प्रकाशकों की घटिया साजिशों का शिकार
हुआ है। सस्ती पब्लिसिटी और सतही चर्चाओं के लोभ में स्त्री-आत्मकथाओं और अन्य विधाओं
के माध्यम से स्त्री-गरिमा को खंडित करने वाले अशोभन लेखन से बाजार पट गया है। स्त्री
को उकसाने वाली शक्तियां आज प्रबल हैं। मुझे दुःख इस बात का है कि स्वयं को चैतन्य
मानने वाली स्त्री, आज सस्ती लोकप्रियता की लालच में बाजार की गुलामी
करने के लिये सहर्ष प्रस्तुत है। अर्थात आज की मुक्त जागरूक, चैतन्य
स्त्री,
स्वयं अपने शोषण, अपने को असम्मानित करने
वाली शक्तियों में स्वयं शामिल है।
एक स्त्री को कैसे परिभाषित करेंगी
एक संपूर्ण स्त्री, एक संपूर्ण
मनुष्य से अलग नहीं होती। एक चैतन्य और संपूर्ण स्त्री वह है जो सिर्फ बाह्य उपलब्धियों
और अपने प्रति ही नहीं अपने परिवार और विश्व-समाज तक के प्रति अपने दायित्यों से अवगत
हो। जो गलत,
सतही और उसे असम्मानित करने वाली शक्तियों के प्रतिरोध के लिये
सदैव प्रस्तुत हो और उसके प्रतिरोध का तरीका कैसा हो, क्या
हो,
इसका विवेक भी उसके पास हो। जो सिर्फ लेने में नहीं, ‘देने‘ में
भी विश्वास करती हो।
साहित्य में खेमेबंदी हो रही है, इससे नुकसान पाठकों का हो रहा
है या लेखकों का, या दोनों का ?
नुकसान दोनों का हो रहा है। खेमेबंदी रचनाकार और रचना को भी
चौहद्दियों में सीमित कर देती है लेकिन ज्यादा बड़ा नुकसान तो पाठक का ही है। क्योंकि
लेखक को हुआ नुकसान तो सिर्फ लेखक तक सीमित रहता है, लेकिन
साहित्य से प्रेरणा और जीने के रास्ते तलाशने वाले अधिसंख्य पाठकों को गुमराह और ‘कनफ्यूज‘ करने
का दोष कहीं ज्यादा गंभीर है।
कभी इलाहाबाद साहित्य का गढ़ हुआ करता था। आज उस स्थिति को दिल्ली
ने हथिया लिया है। बाकी जगहों पर रहने वाले साहित्यकार उपेक्षित हैं?
निश्चित रूप से दिल्ली में रहने वाले लेखक के लिये उसकी पहचान
और प्रशस्ति के रास्ते कहीं ज्यादा सुगम हैं लेकिन मेरी समझ से लेखक दिल्ली का हो या
किसी और शहर का,
आज एक आत्मसम्मानी रचनाकार के लिये साहित्य-जगत में ‘सरवाइव‘ कर पाना
लगभग असंभव है। अपने लेखन में बहुत बड़ी उच्च कोटि की बातें करने वाले लेखक को प्रायः
जीवन में ख्याति, यश, प्रशस्ति
और प्रसिद्धि और सबसे बढ़ कर पुरस्कारों, सम्मानों की खातिर अपनी
खुद्दारी और स्वाभिमान से समझौता करना पड़ता है। और धीरे-धीरे लेखक इसका अभ्यस्त भी
हो जाता है। उसकी अंतर्रात्मा गलत सही की टोका-टोकी बंद कर देती है।
साहित्य-क्षेत्र में दिये जाने वाले पुरस्कार अक्सर विवादों
में आ जाते हैं?
क्योंकि बहुत थोड़े से पुरस्कार ही अपनी पारदर्शिता और साख बचा
कर रख पाये हैं। शेष सारे पुरस्कारों के साथ अंधे की रेवड़ी वाली कहावत चरितार्थ होती
है। सब एक-दूसरे को उपकृत कर रहे होते हैं। पद, प्रतिष्ठा, पुरस्कारों, अनुदानों
और विदेश यात्राओं के बीच बड़े दिलचस्प आदान-प्रदान होते रहते हैं। वैसे होता तो यह
हर क्षेत्र में है लेकिन साहित्य, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में ऐसी क्षुद्रताओं
का जुड़ना कहीं ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण लगता है।
युवा वर्ग हिंदी साहित्य से दूर हो रहा है। क्या साहित्य क्लिष्ट
है कहीं यह वजह तो नहीं
?
बहुत से कारणों में एक कारण ‘क्लिष्टता‘ हो सकती
है लेकिन मेरी समझ से प्रमुख कारण शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी का हो जाना है। प्रतिदिन
के व्यवहार में प्रयुक्त होने वाले हमारे हिंदी के अधिकांश शब्द तेजी से गायब होते
जा रहे हैं। जब अपनी भाषा ही अबूझ होती जा रही है, तो साहित्य
से जुड़ने का प्रश्न कैसे उठ सकता है
अक्सर युवाओं बच्चों को पशु, पक्षियों, फूल-पत्तों
तक के अंग्रेजी नाम ही याद रहते हैं। उनके लिये मोर अब पी-कॉक हो गया है। अंग्रेजी
मातृभाषा का स्थान ले चुकी है। सबसे बढ़ कर, युवा
वर्ग को अब संवेदना नहीं सनसनी चाहिये जो दिन-रात इलेक्ट्रॉनिक माध्यम उसे परोस रहे
हैं। वे जिस तरह पैसा, पद और कैरियर के पीछे भाग रहे हैं, उसके
साहित्य और कलाओं की गुंजाइश बहुत थोड़ी ही बनती है।
अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी कि हिंदी पेटी में कभी बंगाली, मराठी, असमिया
और दक्षिणी भाषाओं की तरह साहित्य के प्रति सम्मान और समझ रही भी नहीं। साहित्य साधारण
जनों से ज्यादा विशिष्ट और मर्मज्ञ पाठकों की रुचि के ही केन्द्र में रहा। बेशक, यदि
हम दृश्य माध्यमों का सही उपयोग कर पाये होते तो अपने उत्कृष्ट साहित्य से दर्शकों
को काफी कुछ परिचित करा सकते थे।
आपकी स्वरचित कौन सी रचना आपके दिल के काफी करीब है !
रचनाएं अपने बच्चों की तरह होती हैं - हमारा ही अंश... फिर भी
उनमें से कुछ ज्यादा करीब महसूस होती हैं और उन्हें बाद में पढ़ने पर एक अनूठे किस्म
की खुशी मिलती है ऐसी कहानियों में, ‘बाऊजी और बंदर‘, ‘दादी
और रिमोट‘,
‘रेस‘, ‘न किन्नी न‘, ‘गौरा
गुनवंती‘,
‘वेणु का नया घर‘ आदि हैं उपन्यासों में
‘यामिनी-कथा‘, ‘अग्निपंखी‘ तथा
मेरा पहला उपन्यास ‘मेरे संधिपत्र‘ भी।
आजकल क्या लिख रही हैं ?
प्रवासी भारतीय युवकों को लेकर एक उपन्यास ‘वेणु
की डायरी‘
लगभग समाप्ति पर है। इसके अतिरिक्त अपने जीवन से जुड़े संस्मरणों
को लिपिबद्ध करने के लिये मेरे पाठक लगातार प्रेरित करते रहे हैं। अपनी चार बहनों को
लेकर एक लंबी कहानी पर भी काम कर रही हूं।
समकालीन साहित्यकारों के रचनाकर्म पर कुछ कहना चाहेंगी?
उसके लिये ज्यादा समय और स्थान चाहिये। यही कहूंगी कि हिंदी
में बहुत अच्छा,
विश्वस्तरीय लिखा जा रहा है लेकिन दुर्भाग्य है कि अच्छी चीजें
लोगों तक पहुंच नहीं पा रही। जिनके लिये लिखा जा रहा है वे पढ़ नहीं पा रहे।
साहित्य के क्षेत्र में कई नाम तेजी से उभरे हैं, आपको किसी
में संभावना दिख रही है?
युवापीढ़ी सर्वथा नयी- सेन्सिटिविटी और विषय वैविध्य के साथ लिख
रही है। भाषा शिल्प की उनकी ताजगी और कथ्य के मार्मिक स्थलों की पकड़ बहुत आश्वस्त करती
है लेकिन ऐसे आश्वस्तिकार नामों की सूची भी काफी लंबी है... ऐसे में कुछ सही नाम छूटते
हैं तो दुःख होता है। एक बात अवश्य कहूंगी, कहीं-कहीं
उनका अति आत्मविश्वास और विवरणों की भरमार खटकती भी है।
अपनी समकालीन लेखिकाओं में एक अकेली आप ही ‘व्यंग्य-लेखन‘ भी करती
रही हैं !
मेरा व्यंग्य-लेखन भी प्रारंभ से कथा-लेखन के साथ साथ चला है।
मैं लेखन में स्ट्रेटेजी या योजना बिलकुल नहीं बनाती। बहुत मुक्त रखती हूं स्वयं को।
मेरे लिये ‘विधा‘ नहीं, रचना
महत्वपूर्ण है। कौन सा विचार या कौंध कहानी बनेगी और कौन सा व्यंग्य, यह भी
मेरी कलम ही स्वयं तय कर लेती है।
साहित्यकार सूर्यबाला को, स्वयं
को कुछ पंक्तियों में अभिव्यक्त करने को कहा जाये तो वे क्या कहेंगी?
वर्षों पहले जब जहाजी पति के साथ समन्दर की यात्रा पर थी, एक सेलर
ने मेरा हाथ देख कर कहा था - अ वेरी कंप्लेक्स हैंड... अब सोचती हूं ज्यादा
गलत नहीं कहा था। शायद मैं जो दिखती हूं, वो हूं नहीं।
हमेशा से दो भिन्न धरातलों पर जीती आई हूं। ऊपर से जितनी हंसने-हंसाने
वाली,
अंदर से उतनी ही चुप, भीड़
में भी अकेला महसूस करने वाली, बल्कि ज्यादा ही। एक तरफ मोहबंधों में जकड़ी, महामोही...
दूसरी तरफ विचित्र किस्म की मूडी और विरक्त... ‘कहे‘ से ज्यादा
‘अनकहे‘ में
विश्वास करने वाली और स्नेह, ममता तक के प्रदर्शन, डिमांस्ट्रेशन
से बेहतर चिढ़ने वाली।
सबसे बढ़कर, मन से रचनाकार और कर्म से एक पूर्ण कालिक गृहणी
का धर्म निभाने वाली। जीवन में सबके हिसाब से, लेकिन
‘लिखने‘ में
सिर्फ अपने मन का लिखते हुए प्रारंभ से ही सम्मानों, पुरस्कारों, से जुड़ी
सारी प्रतिस्पद्धाओं से दूर अपनी शर्तों पर जीने वाली।