सुप्रीम
कोर्ट ने दो दशक पहले हर राज्य सरकार को ये हिदायत दी थी कि वे बलात्कार पीड़ित
महिलाओं के लिए हर्जाने की योजना बनाएं। इस उद्देश्य के लिए केन्द्र ने करोड़ों
रूपये आवंटित भी किए लेकिन पीड़िताएं अभी भी आर्थिक सहायता के लिए संघर्ष करती
दिखाई देती हैं। दो दशकों बाद कई राज्य सरकारों ने इस योजना को अमली जामा पहनाया
है। फिलहाल कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 357ए के तहत हर राज्य सरकार के लिए
यह अनिर्वाय है कि वह केन्द्र सरकार के साथ मिलकर पीड़ितों के हर्जाने की योजना
बनाएं, जिसके तहत उन्हें मुआवजा दिया जा सके। हालांकि यौन हमलों और एसिड अटैक को
लेकर देश के सभी राज्यों ने सर्वाइवर कंपन्सेशन स्कीम (पीड़ित मुआवजा योजना) बनाई तो है लेकिन चीजें बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रही हैं।
दिल्ली
अगर
बात करें राजधानी दिल्ली की तो डेल्ही विक्टिम कंपन्सेशन स्कीम, 2011 के तहत
बलात्कार पीड़िताओं को 3 लाख तक का मुआवजा दिए जाने का प्रावधान है। लेकिन सच्चाई
ये है कि एक तो पीड़िता को यह मालूम ही नहीं होता कि उनके लिए किसी मुआवजे का
प्रावधान भी है तो दूसरी तरफ अगर उन्हें पता भी हो तो उन्हें मुआवजे के लिए कठिन
प्रक्रिया से गुजरना होता है। पिछले तीन वर्षों में सरकार के 15 करोड़ के
निर्धारित फंड में से सिर्फ 2 करोड़ रूपये का ही भुगतान किया गया है। दिलचस्प ये
है कि सिर्फ 361 प्रकरणों में मुआवजे के आदेश दिए गये और मात्र 91 प्रकरणों में
मुआवजा दिया जा सका। क्या और किन कारणों से मुआवजा पीड़िताओं तक नहीं पहुँचा यह
प्रशासनिक पेचिदगियों में उलझ सकता है लेकिन रेप सिटी दिल्ली को अगर मानवीय पहलू
के आधार पर देखा जाए तो यह संवेदनहीनता की हद है...।
महाराष्ट्र
अगस्त
2013 में मुंबई में हुए शक्ति मिल सामूहिक बलात्कार कांड के बाद महाराष्ट्र राज्य
मंत्रिमंडल ने मनोधैर्य योजना को मंजूरी दी थी, जिसके अन्तर्गत बलात्कार की शिकार
महिलाओं व सेक्सुअल दुर्व्यवहार से पीड़ित बच्चों को चिकित्सकीय, कानूनी व आर्थिक
मदद के साथ उनके पुनर्वास और काउंसलिंग की व्यवस्था का प्रावधान किया गया था। योजना
के तहत पीड़िता को 2-3 लाख के बीच का मुआवजा देना भी तय हुआ। महाराष्ट्र की मनोधैर्य
योजना देश में इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि किस तरह बलात्कार पीड़ितों के
हर्जाने के मुद्दे से प्रभावकारी ढ़ंग से निपटा जा सकता है। इस योजना के तहत अभीतक
लगभग 600 पीड़ितों को मुआवजा मिल चुका है। मुआवजे की पूरी प्रक्रिया स्वचलित है।
एफआईआर दर्ज कराने के साथ ही पूरा सिस्टम सक्रिय हो जाता है और पीड़िता को मुआवजे
की राशि का 50 फीसदी हिस्सा मिल सकता है और बची हुई राशि चार्जशीट दाखिल होने के
बाद मिलती है।
कर्नाटक
कर्नाटक
ने केन्द्र सरकार के साथ मिलकर वर्ष 2011 में विक्टिम कंपन्सेशन स्कीम बनाई थी।
वर्ष 2012 में उसमें कुछ संशोधन भी किया लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि वर्ष 2012-13
के लिए सरकार द्वारा आवंटित 1 करोड़ की राशि में से मात्र 25 लाख को मुआवजे के तौर
पर बाँटा गया और बची हुई राशि को रद्द कर दिया गया।
पश्चिम
बंगाल
राज्य
में विक्टिम कंपन्सेशन स्कीम के तहत किसी को कोई मुआवजा नहीं दिया गया क्योंकि
इसके लिए राशि ही आवंटित नहीं की गई है। प्रशासन का कहना है कि मुआवजे के लिए
विस्तृत दिशा निर्देश अबतक नहीं बनाए गए हैं इसलिए अबतक इस योजना के तहत किसी की
मदद नहीं की गई है।
साभार फेमिना पत्रिका
साभार फेमिना पत्रिका