Thursday, 10 July 2014

अपनी शर्तों पर जीनेवाली कथाकारः सूर्यबाला



 सोनी किशोर सिंह

हिन्दी साहित्य में सूर्यबाला जी का नाम सूर्य के समान दैदीप्यमान है। अपनी कहानियों, उपन्यास और व्यंग्य के माध्यम से उन्होंने समाज की कुरीतियों, अंधविश्वासों, परंपराओं पर जमकर लिखा है और साहित्य को समाज से जोड़ने में महनीय भूमिका निभाई है। उनकी लेखनी की विविधता इन्द्रधनुष की भांति है जिसमें सभी रंग दिखाई पड़ते हैं। एक तरफ वो संबंधों की नाजुक डोर को संवेदनशील तरीके से शब्दों में बांधती हैं तो दूसरी तरफ हास्य व्यंग्य की धार से लोगों को गुदगुदाती भी हैं। सुविख्यात कथाकार सूर्यबाला जी से उनके लेखन, जीवन, साहित्य समेत अनेक मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई, प्रस्तुत है उनसे हुई भेंटवार्ता का संपादित अंशः
सूर्यबाला
अपने बचपन के बारे में बताइए?
अपने बचपन पर मुझे बेहद गर्व है। इस बचपन में मुझे जो लाड़-दुलार, शिष्टाचार, अनुशासन और साहित्य, संगीत से जुड़े सुरुचिपूर्ण संस्कार मिले हैं, उन्होंने मुझे अपना जीवन सही तरीके से जीने का एक सलीका दिया है। मेरा बचपन मुझे आज तक रास्ता दिखाता आया है।
मेरे पिता शिक्षा-अधिकारी थे। घर में चारों तरफ पाठ्यक्रमों के लिये स्वीकृत होने आई पुस्तकें ही पुस्तकें। माता-पिता विद्वान नहीं थे लेकिन सुरुचि संपन्न थे। सामान्य मध्यवर्गीय परिवार होते हुए भी मेरे घर की बनावट (स्थापत्य) से लेकर अंदर की साज-सज्जा तक, मुझे अभी तक याद है।... हरे-भरे पौधे, फौव्वारे, मछलियां, हारमोनियम, ग्रामोफोन, बांसुरी... हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत की पुस्तकें, पत्रिकाएं...संस्कृत ग्रंथों की टीकाएं, रामायण और सुदामा चरित भी। दीवारों पर सस्ते कैलेंडरों की जगह राजा रवि वर्मा के चित्र... आदि। अपने माता-पिता की सौन्दर्य-भावना और जिंदादिली दोनों की मैं कायल हूं।
आज से साठ-पैंसठ वर्ष पूर्व हम चारों बहनों को हमारे मध्यवित्तीय माता-पिता ने शहजादियों की तरह पाला-पोसा। यह समृद्धि पैसों की नहीं, स्नेह ममता और सुरुचि संपन्नता की थी। अपनेपन और साफगोई की थी। हम कैसा बोलें, कैसा पहनें और क्या सोचें, हमारे विचारों की दिशा क्या हो, यह सब अलग से समझाया, बताया नहीं गया, लेकिन शायद माँ-बाबूजी के आचरणों की वजह से हममें आता चला गया।
आधी सदी पहले भी, हम बहनों में कभी चार लड़कियां‘ (बेटियां) होने की कुंठा नहीं पैदा हुई। विवाह, दहेज आदि का हौव्वा भी नहीं... जबकि आर्थिक दृष्टि से हम अत्यंत सामान्य स्तर के थे।
बचपन में ही, अचानक पिता की मृत्यु हो जाने के बाद भी मां ने अत्यंत अभाव और असहाय स्थितियों में भी हम चारों बहनों और छोटे भाई को उसी संकल्प और विश्वास के बल पर बड़ा किया। उच्च शिक्षा दी। यह मां के त्याग और तपस्या का ही प्रतिफल था कि शहर में उनकी चारों बेटियों के विवाह, बिना दहेज संपन्न हुए।
शायद इसलिए, आज भी  मैं माता-पिता, परिवार तथा वातावरण द्वारा बच्चेको मिलने वाली शिक्षा और संस्कारों को बहुत महत्व देती हूं। बच्चों से ज्यादा उनके युवा माता-पिता को प्रशिक्षित करने वाली कार्यशालाओं की आवश्यकता महसूस करती हूं जिससे वे अपने बच्चों को वह दृष्टि, समझ और संस्कार दे सकें जो उन्हें एक सही मनुष्य बनने की दिशा में प्रेरित कर सके।
लेखन की शुरुआत कैसे हुई। क्या लेखिका ही बनना चाहा था या संयोगवश लेखन के क्षेत्र में आना हुआ ?
चूंकि मेरे लिखने की शुरुआत काफी छुटपन में और खेल खेल में, अनायास हुई थी, इसलिए लेखिका बनने जैसी किसी महत्वाकांक्षा का दूर-दूर तक कोई प्रश्न ही नहीं था। सात-आठ वर्ष की आयु में एक शाम अकेली होने पर यूं ही एक कविता सी रचती चली गई जब बड़ी बहनों को बताया, तो उन्होंने खुश होकर प्रयाग से प्रकाशित होने वाली पत्रिका संगमके बाबा जी की क्यारीस्तंभ में भेज दी। संयोग देखिए कि उसके युवा उपसंपादक डॉ. धर्मवीर भारती थे जो बाद में धर्मयुगजैसी प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादक हुए और वयस्क होने पर जहां मेरी पहली कहानी जीजी‘ (1972 अक्टूबर), कमलेश्वर जी ने सारिकामें छापी वहीं पहली व्यंग्य रचना और दूसरी कहानी अविभाज्यभारती जी ने धर्मयुग में प्रकाशित की।
आपके लेखन की शुरुआत से अब तक बहुत बदलाव आये... ये बदलाव नकारात्मक थे या सकारात्मक ?
ऐसा नहीं था कि उन दिनों समाज, जीवन या लेखन में नकारात्मक तत्व नहीं थे। मुझे याद है सड़क छाप छिछली पुस्तकें पढ़ने की हमारे घरों में सख्त मनाही थी। उसका अर्थ अब समझ में आता है। क्योंकि उससे मन और विचार दूषित होते हैं जबकि साहित्य का लक्ष्य सारे नकारात्मकता के बीच से भी जीवन को, मनुष्य को, समृद्ध करना होता है।
यह एक मानी हुई बात है कि आज सारी भौतिक उपलब्धियों और सुविधाओं की भरमार के बावजूद सूचनातंत्रों ने मानवीय संवेदना के स्रोतों को लगभग सोख लिया है। यंत्रयुग की रैट-रेसकह लीजिए या ग्लैमर की चकाचौंध ने मनुष्य का मनुष्य के प्रति विश्वास खत्म किया है। परिवार टूटन और विखंडन की कगार पर हैं। जबकि मैं जीवन में मोहबंधों और जुड़ावों को बहुत महत्व देती हूं। मेरा विश्वास है कि सारे अपसांस्कृतिक तत्वों और विरूपताओं के बीच से साहित्य ही मनुष्य को जीने का सलीका सिखा सकता है। उसे जीवन मूल्यों से समृद्ध कर सकता है।
याद करती हूं तो लगता है कि आज मैं जो कुछ हूं उसका बहुत सारा श्रेय प्रेमचंद, प्रसाद, शरतचंद्र, रवीन्द्रनाथ ठाकुर तथा हिंदी की उन तमाम कालजयी कहानियों को जाता है जो हमें अंदर तक छू जाती थीं, समाप्त करने के बाद भी भुलाये नहीं भूलती थीं और हमारे अंदर ईदगाहके हामिद, बूढ़ी काकी, होरी, धनिया (प्रेमचंद) आकाशदीप की चंपा, ममता (प्रसाद), रामू की बहू (भगवतीचरण वर्मा) और सूबेदारनी तथा लहना सिंह (उसने कहा था) जैसे चरित्रों का एक संसार बसता जाता था। हम उनकी करूणा से द्रवित, अन्याय से आक्रोशित और उनके पछतावों से भींग-भींग जाया करते थे। तो वे कहानियां हमें संवारती, संस्कारित करती थीं।
आजकल स्त्री-विमर्श के नाम पर अश्लील साहित्य रचे जा रहे हैं ?
यह आज के लेखक का एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष है कि विश्व में आये बाजारवादपर लानतें भेजने वाला साहित्य भी आज एक बड़े बाजार में तब्दील हो चुका है। यहां वही बिकता है जिसकी डिमांड होती है। और इन दिनों जो लाउड, घटिया तथा पाठकों की रुचि को प्रदूषित करने वाले लेखन की डिमांड बढ़ी उसके पीछे व्यावसायिक शक्तियों की साजिश है। स्त्री-विमर्श भी कुछ तथाकथित संपादकों और प्रकाशकों की घटिया साजिशों का शिकार हुआ है। सस्ती पब्लिसिटी और सतही चर्चाओं के लोभ में स्त्री-आत्मकथाओं और अन्य विधाओं के माध्यम से स्त्री-गरिमा को खंडित करने वाले अशोभन लेखन से बाजार पट गया है। स्त्री को उकसाने वाली शक्तियां आज प्रबल हैं। मुझे दुःख इस बात का है कि स्वयं को चैतन्य मानने वाली स्त्री, आज सस्ती लोकप्रियता की लालच में बाजार की गुलामी करने के लिये सहर्ष प्रस्तुत है। अर्थात आज की मुक्त जागरूक, चैतन्य स्त्री, स्वयं अपने शोषण, अपने को असम्मानित करने वाली शक्तियों में स्वयं शामिल है।
एक स्त्री को कैसे परिभाषित करेंगी
एक संपूर्ण स्त्री, एक संपूर्ण मनुष्य से अलग नहीं होती। एक चैतन्य और संपूर्ण स्त्री वह है जो सिर्फ बाह्य उपलब्धियों और अपने प्रति ही नहीं अपने परिवार और विश्व-समाज तक के प्रति अपने दायित्यों से अवगत हो। जो गलत, सतही और उसे असम्मानित करने वाली शक्तियों के प्रतिरोध के लिये सदैव प्रस्तुत हो और उसके प्रतिरोध का तरीका कैसा हो, क्या हो, इसका विवेक भी उसके पास हो। जो सिर्फ लेने में नहीं, ‘देनेमें भी विश्वास करती हो।
साहित्य में खेमेबंदी हो रही है, इससे नुकसान पाठकों का हो रहा है या लेखकों का, या दोनों का ?
नुकसान दोनों का हो रहा है। खेमेबंदी रचनाकार और रचना को भी चौहद्दियों में सीमित कर देती है लेकिन ज्यादा बड़ा नुकसान तो पाठक का ही है। क्योंकि लेखक को हुआ नुकसान तो सिर्फ लेखक तक सीमित रहता है, लेकिन साहित्य से प्रेरणा और जीने के रास्ते तलाशने वाले अधिसंख्य पाठकों को गुमराह और कनफ्यूजकरने का दोष कहीं ज्यादा गंभीर है।
कभी इलाहाबाद साहित्य का गढ़ हुआ करता था। आज उस स्थिति को दिल्ली ने हथिया लिया है। बाकी जगहों पर रहने वाले साहित्यकार उपेक्षित हैं?
निश्चित रूप से दिल्ली में रहने वाले लेखक के लिये उसकी पहचान और प्रशस्ति के रास्ते कहीं ज्यादा सुगम हैं लेकिन मेरी समझ से लेखक दिल्ली का हो या किसी और शहर का, आज एक आत्मसम्मानी रचनाकार के लिये साहित्य-जगत में सरवाइवकर पाना लगभग असंभव है। अपने लेखन में बहुत बड़ी उच्च कोटि की बातें करने वाले लेखक को प्रायः जीवन में ख्याति, यश, प्रशस्ति और प्रसिद्धि और सबसे बढ़ कर पुरस्कारों, सम्मानों की खातिर अपनी खुद्दारी और स्वाभिमान से समझौता करना पड़ता है। और धीरे-धीरे लेखक इसका अभ्यस्त भी हो जाता है। उसकी अंतर्रात्मा गलत सही की टोका-टोकी बंद कर देती है।
साहित्य-क्षेत्र में दिये जाने वाले पुरस्कार अक्सर विवादों में आ जाते हैं?
क्योंकि बहुत थोड़े से पुरस्कार ही अपनी पारदर्शिता और साख बचा कर रख पाये हैं। शेष सारे पुरस्कारों के साथ अंधे की रेवड़ी वाली कहावत चरितार्थ होती है। सब एक-दूसरे को उपकृत कर रहे होते हैं। पद, प्रतिष्ठा, पुरस्कारों, अनुदानों और विदेश यात्राओं के बीच बड़े दिलचस्प आदान-प्रदान होते रहते हैं। वैसे होता तो यह हर क्षेत्र में है लेकिन साहित्य, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में ऐसी क्षुद्रताओं का जुड़ना कहीं ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण लगता है।
युवा वर्ग हिंदी साहित्य से दूर हो रहा है। क्या साहित्य क्लिष्ट है कहीं यह वजह तो नहीं ?
बहुत से कारणों में एक कारण क्लिष्टताहो सकती है लेकिन मेरी समझ से प्रमुख कारण शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी का हो जाना है। प्रतिदिन के व्यवहार में प्रयुक्त होने वाले हमारे हिंदी के अधिकांश शब्द तेजी से गायब होते जा रहे हैं। जब अपनी भाषा ही अबूझ होती जा रही है, तो साहित्य से जुड़ने का प्रश्न कैसे उठ सकता है
अक्सर युवाओं बच्चों को पशु, पक्षियों, फूल-पत्तों तक के अंग्रेजी नाम ही याद रहते हैं। उनके लिये मोर अब पी-कॉक हो गया है। अंग्रेजी मातृभाषा का स्थान ले चुकी है। सबसे बढ़ कर, युवा वर्ग को अब संवेदना नहीं सनसनी चाहिये जो दिन-रात इलेक्ट्रॉनिक माध्यम उसे परोस रहे हैं। वे जिस तरह पैसा, पद और कैरियर के पीछे भाग रहे हैं, उसके साहित्य और कलाओं की गुंजाइश बहुत थोड़ी ही बनती है।
अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी कि हिंदी पेटी में कभी बंगाली, मराठी, असमिया और दक्षिणी भाषाओं की तरह साहित्य के प्रति सम्मान और समझ रही भी नहीं। साहित्य साधारण जनों से ज्यादा विशिष्ट और मर्मज्ञ पाठकों की रुचि के ही केन्द्र में रहा। बेशक, यदि हम दृश्य माध्यमों का सही उपयोग कर पाये होते तो अपने उत्कृष्ट साहित्य से दर्शकों को काफी कुछ परिचित करा सकते थे।
आपकी स्वरचित कौन सी रचना आपके दिल के काफी करीब है !
रचनाएं अपने बच्चों की तरह होती हैं - हमारा ही अंश... फिर भी उनमें से कुछ ज्यादा करीब महसूस होती हैं और उन्हें बाद में पढ़ने पर एक अनूठे किस्म की खुशी मिलती है ऐसी कहानियों में, ‘बाऊजी और बंदर‘, ‘दादी और रिमोट‘, ‘रेस‘, ‘न किन्नी न‘, ‘गौरा गुनवंती‘, ‘वेणु का नया घरआदि हैं उपन्यासों में यामिनी-कथा‘, ‘अग्निपंखीतथा मेरा पहला उपन्यास मेरे संधिपत्रभी।
आजकल क्या लिख रही हैं ?
प्रवासी भारतीय युवकों को लेकर एक उपन्यास वेणु की डायरीलगभग समाप्ति पर है। इसके अतिरिक्त अपने जीवन से जुड़े संस्मरणों को लिपिबद्ध करने के लिये मेरे पाठक लगातार प्रेरित करते रहे हैं। अपनी चार बहनों को लेकर एक लंबी कहानी पर भी काम कर रही हूं।
समकालीन साहित्यकारों के रचनाकर्म पर कुछ कहना चाहेंगी?
उसके लिये ज्यादा समय और स्थान चाहिये। यही कहूंगी कि हिंदी में बहुत अच्छा, विश्वस्तरीय लिखा जा रहा है लेकिन दुर्भाग्य है कि अच्छी चीजें लोगों तक पहुंच नहीं पा रही। जिनके लिये लिखा जा रहा है वे पढ़ नहीं पा रहे।
साहित्य के क्षेत्र में कई नाम तेजी से उभरे हैं, आपको किसी में संभावना दिख रही है?
युवापीढ़ी सर्वथा नयी- सेन्सिटिविटी और विषय वैविध्य के साथ लिख रही है। भाषा शिल्प की उनकी ताजगी और कथ्य के मार्मिक स्थलों की पकड़ बहुत आश्वस्त करती है लेकिन ऐसे आश्वस्तिकार नामों की सूची भी काफी लंबी है... ऐसे में कुछ सही नाम छूटते हैं तो दुःख होता है। एक बात अवश्य कहूंगी, कहीं-कहीं उनका अति आत्मविश्वास और विवरणों की भरमार खटकती भी है।
अपनी समकालीन लेखिकाओं में एक अकेली आप ही व्यंग्य-लेखनभी करती रही हैं !
मेरा व्यंग्य-लेखन भी प्रारंभ से कथा-लेखन के साथ साथ चला है। मैं लेखन में स्ट्रेटेजी या योजना बिलकुल नहीं बनाती। बहुत मुक्त रखती हूं स्वयं को। मेरे लिये विधानहीं, रचना महत्वपूर्ण है। कौन सा विचार या कौंध कहानी बनेगी और कौन सा व्यंग्य, यह भी मेरी कलम ही स्वयं तय कर लेती है।
साहित्यकार सूर्यबाला को, स्वयं को कुछ पंक्तियों में अभिव्यक्त करने को कहा जाये तो वे क्या कहेंगी?
वर्षों पहले जब जहाजी पति के साथ समन्दर की यात्रा पर थी, एक सेलर ने मेरा हाथ देख कर कहा था - अ वेरी कंप्लेक्स हैंड... अब सोचती हूं ज्यादा गलत नहीं कहा था। शायद मैं जो दिखती हूं, वो हूं नहीं।
हमेशा से दो भिन्न धरातलों पर जीती आई हूं। ऊपर से जितनी हंसने-हंसाने वाली, अंदर से उतनी ही चुप, भीड़ में भी अकेला महसूस करने वाली, बल्कि ज्यादा ही। एक तरफ मोहबंधों में जकड़ी, महामोही... दूसरी तरफ विचित्र किस्म की मूडी और विरक्त... कहेसे ज्यादा अनकहेमें विश्वास करने वाली और स्नेह, ममता तक के प्रदर्शन, डिमांस्ट्रेशन से बेहतर चिढ़ने वाली।
सबसे बढ़कर, मन से रचनाकार और कर्म से एक पूर्ण कालिक गृहणी का धर्म निभाने वाली। जीवन में सबके हिसाब से, लेकिन लिखनेमें सिर्फ अपने मन का लिखते हुए प्रारंभ से ही सम्मानों, पुरस्कारों, से जुड़ी सारी प्रतिस्पद्धाओं से दूर अपनी शर्तों पर जीने वाली।


Monday, 28 April 2014

साहित्य का स्त्रीवादी चेहरा / सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा

सोनी किशोर सिंह

एक स्त्री जब एक स्त्री भर नहीं रह जाती 
एक जलता हुआ सवाल बन जाती है   
ऐसे सवाल को कौन गले लगाना चाहता है।
- यह सवाल है कवयित्री और कथाकार सुधा अरोड़ा का और इसका जवाब भी वो खुद देती हैं अपने लेखन के जरिये, अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता के जरिये। कहानी, उपन्‍यास और आलेखों के माध्‍यम से स्‍त्री-विमर्श के विभिन्‍न पहलुओं पर कलम चलाने वाली सुधा अरोड़ा बीते पांच दशक से हिंदी साहित्‍य को समृद्ध बनाने में जुटी हुई हैं। साहित्‍य की करीब सभी विधाओं में उन्‍होंने अपनी उपस्थिति से पाठकों का एक बड़ा वर्ग तैयार किया है। साफगोई उनके लेखन में ही नहीं, निजी जिंदगी में भी परिलक्षित होती है। अपनी कहानियों में बौद्धिक छल अथवा लोलुपता की बजाए सुधा अरोड़ा ने स्‍त्री-विमर्श के बहाने उसका समाजशास्‍त्रीय विश्‍लेषण कर साहित्‍य में नई जमीन तैयार की है। उम्र के ऐसे पड़ाव पर जब लेखक अपने पूर्व लेखन पर आत्‍ममुग्‍ध होकर महज चिंतन को औजार बनाने से आगे नहीं बढ़ पाते, सुधा अरोड़ा न केवल अपनी सोच को नई धार दे रही हैं बल्कि साहित्‍य और समाज के विभिन्‍न मंचों पर स्‍त्री सशक्तिकरण की दिशा में सक्रिय हस्‍तक्षेप भी कर रही हैं। 
  प्रस्तुत है अपने लेखन में नारी संवेदनाओं, संघर्ष, पीड़ा और विद्रोह के यथार्थ को अपने साहित्‍य में नया स्‍वर देने वालीस्त्री सशक्तिकरण की अगुआ लेखिका सुधा अरोड़ा से उनके लेखकीय सरोकार समेत कई मुद्दों पर सोनी किशोर सिंह की बातचीत के प्रमुख अंश - 

आपके लेखन की शुरूआत कैसे हुई ?
माता-पिता के साहित्यिक रूझान से लेखन के बीज मेरे भीतर अंकुरित हुए। मेरी माँ अपने परिवार की पहली प्रभाकर (स्‍नातक) कन्‍या थीं, साहित्‍य रत्‍न में दाखिला ले चुकी थीं जो एम.ए. के बराबर था। पिता अपने परिवार के पहले बी. कॉम पास थे। घर में साहित्यिक वातावरण था। विप्‍लव, विशाल भारत, हंस आदि तमाम हिंदी पत्रिकाएं आती थीं, जिन्‍हें जिल्‍द बंधवा कर पिता ने संजो रखा था।
दूसरी वजह मेरी बीमारी थी। बचपन में बीमारी के दौरान हमेशा बिस्तर पर पड़े रहना मेरी दिनचर्या हो गई थी। मां की दी हुई डायरी में मैंने लिखना शुरू किया। पहली कहानी लिखी 'एक सेंटीमेंटल डायरी की मौत।' यह कहानी सारिका में मार्च, 1966 में छपी थी। हालांकि इस कहानी के स्वीकृत होने और छपने में एक साल का अंतर रहा और इस बीच मेरी और कहानियां छप गई थीं। इस लिहाज से मेरी पहली छपी हुई कहानी 'मरी हुई चीज' थी जो 1965 में ज्ञानोदय में छपी। तब मैं अठारह साल की थी।
यानी अगले साल आपको लिखते हुए पूरे पचास साल हो जायेंगे ?
हां, पांच दशक। विश्‍वास नहीं होता कि इतना समय बीत गया। कहानी विधा में ही कितनी किस्‍में देखीं। कितनी तोड़-फोड़ देखी। आज अपनी ही पुरानी कहानियां अपनी पहचान में नहीं आतीं कि हम ऐसा भी लिखा करते थे। समय के साथ-साथ हम अपने आप को बदलते चलते हैं। जैसे पहरावा, जीवन शैली, सोच बदलती है वैसे ही लेखन के कथ्‍य, विषय और भाषा में भी बदलाव आता है। पर अन्‍तत: बचता वही है जो सामाजिक सरोकार रखता है और अपने समय से जुड़ा रहता है। देश और समाज से कटा हुआ एकांगी या सनसनीखेज लेखन प्रोमोशन के जरिये सिर्फ तात्‍कालिक प्रसिद्धि पा सकता है, कालजयी नहीं हो सकता।
'एक सेंटीमेंटल डायरी की मौत' के बाद भी आपने मौत को लेकर कई कहानियां लिखीं। आप मृत्यु को किस तरह से देखती हैं ?
अजीब बात है कि 1965 के बाद भी मैंने कई कहानियां मौत पर लिखीं। अभी हाल ही में साहित्‍य अमृत के फरवरी अंक में छपी मेरी कहानी ‘’खिडकी’’ का विषय भी मौत ही है। मृत्यु एक ऐसी स्थिति है जो आपको अपने अंदर खंगालने के लिये विवश करती है, आपकी सोच को विस्‍तार देती है, आपको अच्छा इंसान बनाती है। प्रख्‍यात स्‍वीडिश निर्देशक इंगमार बर्गमैन की एक फिल्‍म थी ‘द सेवेंथ सील’। मौत के इर्द गिर्द घूमती और जिंदगी को कस कर थामे हुए। जब आप यह सोचते हैं कि मृत्‍यु ही एक चरम सत्‍य है और हमें आखिर सब कुछ छोड़ कर चले ही जाना है तो आप दार्शनिक होकर छोटे-छोटे राग द्वेष से उपर उठ जाते हैं। मौत दहशत नहीं देती, आपको अच्छा बनने की प्रेरणा देती है। मृत्यु का भय आपको आध्यात्मिक भी बनाता है। भौतिक सुख सुविधाओं से मन हट जाता है। मौत से हाथ मिला लेना आपको जिन्‍दगी जीने के गुर सिखा देता है।
लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है कि लोग मृत्यु के भय से अकर्मण्य हो जायें और सुख-सुविधाओं में लिप्त रहें ?
नहीं, ऐसा नहीं है। ऐसा लगता है कि आजकल के युवाओं के अपेक्षाकृत बडे तबके पर बाजारवाद और मॉल कल्‍चर हावी है, लेकिन प्रखर जागरूक युवाओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो ‘खाओ-पीयो, मौज करो’ और संचय की प्रवृति से काफी दूर है। वे जानते समझते हैं कि उन्‍हें क्‍या करना है। भौतिकवादी चीजों के संग्रह के लिये वे प्रयास नहीं करते। ऐसे युवा सामाजिक कार्यकर्ता बहुत हैं जो विदेश से तालीम हासिल करने के बाद भी अपने देश की तरक्‍की के लिये जी–जान से जुटे हैं। आय.आय.टी. के कितने ही छात्रों को जानती हूं जो अपने सुनहरे कैरियर को तिलांजलि देकर गांव-देहात की बेहतरी के लिये काम कर रहे हैं। देश के लिये कुछ कर गुजरने का जज्‍बा इन युवाओं में है। जाहिर है, उन्‍हें ऐसे संस्‍कार अपने परिवारों से मिले हैं। यह सच है कि इतनी ज्‍यादा आबादी वाले देश की बेहतरी के लिये ऐसी एक बड़ी जमात की जरूरत है।
आपके लेखन और जीवन पर लौटे। आपके जीवन का शुरूआती हिस्सा कोलकाता में बीता, मुंबई आने के बाद कोलकाता की याद तो आती होगी ?
कलकत्ता में मैंने 25-26 साल गुजारे। शादी के बाद मुंबई आने के बाद लगभग दस साल तक तो मैं कलकत्ता के प्रभामंडल से बाहर ही नहीं आ पाई। कलकत्ता के वाशिंदे इतने आत्मीय है जैसे आपको दुनिया के किसी शहर में नहीं मिलेंगे। ऐसे ही नहीं विदेशी पत्रकारों और यायावरों ने – सिटी ऑफ जॉय - कलकत्ता की शान में कशीदे पढे हैं। कहने को कलकत्ता महानगर है लेकिन उसमें एक गाँव की सारी खूबियां मौजूद है। कलकत्ता के लोग बड़े मिलनसार और आतिथ्यभाव से भरपूर हैं। बंबई आर्थिक राजधानी है और सही मायनों में एक महानगर है जहां पडोसी अपने बगल के पडोसी को नहीं जानता, जहां एक के पास दूसरे के लिये कतई समय नहीं। लेकिन कलकत्ता एक महानगर होते हुए भी एक जागरूक विरासत लिए सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और सुरूचिसंपन्न शहर है।
सुधा अरोड़ा को बनाने में कोलकाता का कितना योगदान है ?
मैं जो हूँ अपने माता-पिता के दिये संस्‍कारों की वजह से। हां , शहर का भी कुछ असर तो पडता ही है। दिल्ली में होती तो शायद कुछ और होती। कोलकाता की वजह से ही मेरे लेखन में सामाजिकता, सरोकार और प्रतिबद्धता आई। कोलकाता शहर हमेशा से मेरी दुखती रग रहा है। अब पिछले चालीस सालों से मुंबई में रहते- रहते इसकी आदत हो चली है।
आपकी कहानियों में महिलाओं की पीड़ा, मनोदशा आदि को बहुत प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया गया है, अगर ये कहा जाये कि आपने स्त्री विमर्श को नया आयाम दिया तो अतिशयोक्ति नहीं होगी
मैंने सायास कभी स्त्री विमर्श नहीं किया। वर्ष 1980-81 तक मैंने जो लिखा उस समय तक मुझे स्त्री विमर्श का क-ख-ग भी मालूम नहीं था। बस मैं अपने अनुभव, आस-पास की समस्याओं पर लिख रही थी। 1993 के बाद जब मैंने पुनः लिखना शुरू किया तो 12-13 वर्षों के जो अनुभव भीतर कैद थे वो खुलकर बाहर आने लगे। तब तक मैं घरेलू गृहिणी के रूप में सीजन्‍ड हो चुकी थी। परिवार की जिम्‍मेदारियों से अपने लिये कुछ घंटे चुरा लेना भी गलत लगता था।
उन दिनों मैंने कई छोटी छोटी कहानियां लिखीं। मेरी दस बारह ऐसी कहानियां हैं जिसमें विस्तार की पूरी गुंजाईश थी लेकिन मैंने उसे कस कर छोटी कहानी के फॉर्मेट में लिखा और वह पूरी तरह कारगर सिद्ध हुआ। किसी भी कहानी को फैलाकर लिखना आसान है पर ऐसे लिखना कि उसमें एक पंक्ति काटी न जा सके ज्‍यादा मुश्किल है और इसलिये असरकारक भी है।
क्‍या पहले के मुकाबले स्त्रियों की स्थिति में बदलाव नहीं आया है ?
कुछ मुट्रठी भर महिलाओं को समाज में अपना एक प्रतिष्ठित मुकाम हासिल करते हुए हम देखते हैं और यह धारणा बना लेते हैं कि महिलाएं अब दोयम दर्जे से बाहर निकल आई हैं और हर जगह अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं| सच तो यह है कि यह मुकाम एक या दो प्रतिशत महिलाओं ने ही हासिल किया है। समाज में महिलाओं का एक बड़ा तबका आज भी समस्याओं से जूझ रहा है। जो महिलाएं बदलाव लाना चाहती हैं, वे राजनीति में हों, न्यायालय में या पुलिस में, उनकी राह में भी लगातार बाधाएं खड़ी कर दी जाती हैं उन्हें आज भी प्रभुताशाली वर्ग गंभीरता से नहीं लेता और भरसक नजरअंदाज करने या उनका नोटिस न लेने की कोशिश करता है। निर्भया कांड के बाद स्थितियों में कुछ तब्‍दीली तो आई है। कानून कड़े हुए हैं। यौन हिंसा की शिकार लडकियों की शिकायतें पुलिस स्‍टेशनों पर दर्ज की जा रही हैं। लंबा समय इससे जूझते हुए गुजरा है आखिर।
स्त्री विमर्श भी कई खानों में विभाजित हो गया है, दलित और आदिवासी महिलाओं के नाम पर अलग से विमर्श चलाने की कोशिश की जा रही है । ऐसे में इन विभाजनों के रहते सशक्तिकरण कैसे संभव होगा ?
गुटबाजी तो हर जगह है लेकिन ऐसा नहीं है कि दलित, सवर्ण, आदिवासी महिलाओं का कोई आपसी विरोध हो। बुनियादी तौर पर स्‍त्री पुरूषसत्‍तात्‍मक समाज द्वारा शोषित और सताई हुई है। इसके पीछे का कारण उसका आर्थिक रूप से अधिकार विहीन होना है। हालांकि गांव में अब भी स्‍त्री उत्‍पीडन के पीछे जाति एक घटक है लेकिन इसकी बुनियाद में भी महिलाओं का आर्थिक रूप से कमजोर होना ही है। इस बात को अलग विशेषता बनाने से स्‍त्री मुक्ति का बुनियादी संघर्ष कमजोर पड़ेगा और स्त्रियां जाति के खाने में विभाजित होती जाएंगी। यह घातक प्रवत्ति हो सकती है। इसलिये संपूर्ण रूप से महिलाओं की एकता जरूरी है ताकि वे लैंगिक भेदभाव और गुलामी से मुक्‍त हो सकें। सवर्ण लेखन हो या दलित लेखन, महिलायें जहां भी लिखेंगी वो अपनी पीड़ाओं के बारे में ही लिखेंगी। आपस में कोई रस्साकशी नहीं होनी चाहिए।
क्‍या नारीवाद का अर्थ ही पुरूष के खिलाफ होना है ?
ऐसा समझा जाता है कि पितृसत्‍तात्‍मक व्‍यवस्‍था और शोषण के विविध रूपों का धारक पुरूष है और इसलिये हिंसा तथा प्रताडना का जिम्‍मेदार भी वही है। हकीकत यह है कि अगर हम कारणों की तह तक जायें तो   सारा असामंजस्‍य और असंतुलन हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था का है जिसके तहत पुरूष स्‍वयं भी उस सामाजिक व्‍यवस्‍था , परंपरागत सोच और रूढिग्रस्‍त संस्‍कारों का शि‍कार - विक्टिम ) है जो बचपन से उसकी शारीरिक संरचना में, उसके सिस्‍टम में इस कदर पैठ गया है कि वह चाहकर भी इससे छुटकारा नहीं पा सकता।
सिमोन की विख्यात पंक्ति है - ‘One is not born a woman, but becomes one.’ जिस तरह लड़की पैदा नहीं होती, उसे बनाया जाता है, वैसे ही लड़का भी पैदा नहीं होता, उसे बचपन से ही ठोक पीट कर लड़का बनाया जाता है वह रोये तो उसके आंसू छीन लिये जाते हैं - क्या लड़कियों की तरह रोता है ! (यानी रोना गले तक आये तो भी आंसू मत बहा , क्योंकि आंसुओं पर लड़कियों की बपौती है ) उससे कोमल, नरम, भीगे रंग छीन लिये जाते हैं - तू क्या लड़की है जो पीला गुलाबी रंग पहनेगा? उसके लिये गाढ़े रंग हैं - काला, भूरा, गहरा नीला रंग ही उस पर फबेगा, आसमानी या गुलाबी में तो वह लड़की दिखेगा ! उसे सॉफ्रट टॉयज़ नहीं दिये जाते - तू क्या लड़की है, जो गुडि़या से खेलेगा ! उसके हाथ में पज़ल्स, ब्लॉक्स, बंदूक और मशीनी औजार थमा दिये जाते हैं यानी एक बच्चे को शुरू से ही कठोर, वर्चस्ववादी, हिंसक होने का रोल थमा दिया जाता है। माना कि प्रकृति ने स्‍त्री और पुरुष की जैविक संरचना में आधारभूत अंतर रखा है पर प्रकृति ने जिस अंतर को एक दूसरे के पूरक के रूप में गढ़ा है, हम उसे ठोक-पीट कर दो परस्पर प्रतिद्वंद्वी या विपरीत खेमे में बदल देते हैंदोनों युद्घरत पक्ष ताउम्र सींग लड़ाते आपस में लहूलुहान होते रहते हैं या एक फुंफकारता है और दूसरा अपने बचाव में आड़ लेता उम्र गुज़ार देता है। दरअसल पुरुष स्वयं भी उसी सामाजिक व्यवस्था, परंपरागत सोच और रूढिग्रस्त संस्कारों का शिकार ( विक्टिम ) है !
आपको नहीं लगता कि आर्थिक आधार पर मजबूत होकर ही स्त्री सशक्त हो सकती है  ?
सशक्तिकरण का इस तरह सरलीकरण नहीं किया जा सकता। एक लंबे समय से हम देख रहे हैं कि कारोबार और नौकरियों में भारी संख्‍या में आने के बावजूद स्त्रियां अब भी पुरूषों के नियंत्रण से अपने को मुक्‍त नहीं कर पाई हैं क्‍यों कि घर के भीतर परिवार और बाहर समाज अपने हिसाब से गढता और चलाता है। आर्थिक सशक्तिकरण भी स्‍त्री को परिवार या समाज से विद्रोह करने की स्थिति में नहीं ले जाता इसलिये बुनियादी चीज यह है कि पुरूषों की मानसिकता में बदलाव आये । महिलाओं के प्रति समाज की जो सोच है उसमें बदलाव आना चाहिए। इसके लिये साहित्य, दृश्‍य मीडिया, फिल्‍में, कानून-तमाम क्षेत्रों में बड़े स्तर पर कोशिश की जा रही है।
स्त्री विमर्श से जुड़ा ज्यादातर लेखन लाइब्रेरी या बुक स्टॉल की शोभा बढ़ाते हैं, जिन स्त्रियों के लिये किताबें लिखी जाती हैं, क्‍या उनतक पहुंच पाती हैं ?
जी हां, प्रताड़ित महिलाओं की संख्या करोड़ों में है और किताबों की बिक्री हजारों में होती है। हालांकि कुछ चीजें कार्यकर्ताओं के माध्यम से गाँव की महिलाओं तक पहुंचती हैं लेकिन वंचित, उत्पीड़ित महिलाओं तक किताबें नहीं पहुंच पाती ।  
मैंने एक कहानी लिखी थी 'अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी', जो एक गरीब परिवार से आई और एक सम्पन्न घर में ब्याह दी गई सुन्दर कन्या की प्रताड़ना की कहानी है। उस लड़की को ससुराल वाले यातना देते हैं और आत्महत्या से पहले वो आखिरी चिट्टी लिखती है। पूरी कहानी केंचुए के प्रतीक के रूप में मैंने लिखी थी। मैंने यह कहानी मुंबई में अनपढ़ महिलाओं के बीच में सुनाई और इन प्रतीकों को समझने में उन महिलाओं को जरा भी दिक्कत नहीं आई । जरूरी है कि कथाकार खुद कार्यकर्ता भी बने और लोगों तक अपनी बात पहुँचाये।  
इस दिशा में एक छोटा सा प्रयास मेरी संपादित किताब औरत की कहानी में है जहां हमने अशिक्षित और अर्द्धशिक्षित महिलाओं को आसान भाषा में लिखी हुईं और सकारात्‍मक संदेश देने वाली कई कहानियां सुनाईं । इसमें महाश्‍वेता देवी (बांग्‍ला) और मन्‍नू भंडारी से लेकर उर्मिला पवार (मराठी) तक की सोलह महिला रचनाकारों की कहानियां हैं। इन पर उन महिलाओं के बीच बेहतरीन चर्चा हुई। यह किताब ज्ञानपीठ से प्रकाशित है।
क्या लेखकों का दायित्व नहीं बनता कि वो अपना लिखा उन पाठकों तक पहुंचाये जिनपर कथावस्तु आधारित है ?
हां, बिल्कुल बनती है। कुछ जगहों पर कहानी पाठ, कविता पाठ के माध्यम से लोगों तक लेखक अपनी पहुंच बनाते हैं। हमारे यहां दिक्कत यह है कि जो लोग लिखते हैं वो सामाजिक कार्यकर्ता नहीं होते, सिर्फ साहित्यकार होते हैं। बंद कमरों में बैठकर लिखते हैं और खुद को जस्टीफाई करते रहते हैं। जबतक वो जमीन से नहीं जुड़ेंगे तबतक स्थिति खराब ही रहेगी। एक रचनाकार का सामाजिक कार्यकर्ता होना बेहद जरूरी है - सिर्फ शोध करने के लिये और लेखन के लिये कच्‍चा माल जुगाड करने के लिये नहीं, बल्कि उनके अपने अंदर का कोई तंतु उस हाशिये की तकलीफ से जुडा हो तभी लेखन धारदार होगा और किसी बदलाव को ला पाने में समर्थ होगा।
क्‍या साहित्‍य से समाज के बदलने की गुंजाइश बनती है ?
इस बात पर यकीन करने का कोई कारण नहीं है कि साहित्य  कारगर औजार नहीं रह गया है और इससे समाज नहीं बदलता समाज में धंस कर बैठी हुई ग़लत रूढि़यों और परम्पराओं पर साहित्य का कोई असर नहीं होता साहित्य सिर्फ पढ़े-लिखों का फि़तूर और कवायद बनकर रह गया है। मेरे निजी अनुभव बताते हैं कि आप समझ में आने वाली भाषा में ऐसे मुद्दों पर बात करें जो आज के समय में स्‍त्री और पुरुष के गले की फांस बन गये हैं तो कौन से दंपति ऐसे होंगे जो अपनी जि़न्दगी को बेहतर बनाने के लिये स्थितियों को समझना और अपने को बदलना नहीं चाहेंगे ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं मेरे पास
मेरा एक आलेख -'जिसके निशान नहीं दिखते' प्रमुख अखबार 'द हिंदू' के मैंगज़ीन में 30 मार्च 2008 को अंग्रेज़ी में ( द वायलेंस ऑफ सायलेंस ) प्रकाशित हुआ था और उसमें मेरा मेल आई डी दिये जाने के कारण दो दिन में पूरे भारत से सौ से ऊपर संदेश आये थे कुछ भुक्तभोगी महिलाओं के, कुछ उनके भाइयों और बेटों की ओर से तभी मैंने इसे पहचाना कि हमारे समाज में मानसिक प्रताड़ना और चुप्पी की हिंसा की समस्या कितनी अनचीन्ही रह गई है। आज भी इसे पढ़ने के बाद महिलायें अपनी त्रासदी को शेअर करने के लिये अपनी बरसों की चुप्पी को तोड़ती हैं लेकिन जिस बात ने मुझे सचमुच सार्थकता का अहसास करवाया, वह था इस आलेख पर पुरुषों की बेहद सार्थक प्रतिकि्रयाजिन्हें अपना नाम दिये जाने से परहेज़ नहीं, मैं उनकी प्रतिकि्रया की बात करना चाहूंगी
एक वरिष्‍ठ रचनाकार श्री सिद्घेश्वर प्रसाद सिंह बोले - आपके लेख का एक पैराग्राफ मुझे भीतर तक छू गयामैं अब वह नहीं रह गया जो कल तक था सचमुच जब मैं लिख रहा होता था और कमरे में मेरी पत्नी चाय का कप उठाने या बच्चा गेंद खेलते खलते आ जाता था तो मैं इतनी जोर से चिल्लाता था जैसे घर सिर्फ मेरा है, उनका नहीं अब मैं आपकी बात याद रखूंगा एक युवा लेखक ने कहा - दीदी , मैं सच कहता हूं, आज के बाद से मैं कभी अपनी पत्नी के पकाए खाने में बेवजह नुक्स नहीं निकालूंगा
मुंबई की एक लघु पत्रिका 'सृजन संवाद' में मेरी डायरी के कुछ अंश छपे थे| एक दिन उसके संपादक प्रो. संजीव दूबे ने फोन पर बताया -'' मेरी पत्नी डॉक्टर के पास जा रही थीमैंने उसे रोककर कहा - मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं मुझे आपकी लिखी बात याद आ गई कि ये पति नहीं जानते कि उनकी पत्नियों की आधी बीमारी तो उनके पतियों के साथ चलने भर से ठीक हो जाती ''
मराठी में मेरे आलेखों के संग्रह ''उंबरठ्रयाच्या अल्याड पल्याड'' में यह आलेख है| एक दिन लातूर से प्रोफेसर राजा होलकुंडे का फोन आया| उन्होंने कहा- मैं आपसे अपना एक अनुभव बांटना चाहता हूं मैंने आपका आलेख बहुत ध्यान से पढ़ा और मुझे लगा, मैं भी तो यही कर रहा हूं घर लौटते ही इतना चिल्लाने लगता हूं कि परिवार के सब सदस्य दहशत में आ जाते हैं। मेरी पत्नी भी मेरे सामने बिल्कुल आवाज़ नहीं निकालती मेरे मन में आया कि मुझे अपने को बदलने की कोशिश करनी चाहिये कुछ दिन मैंने अपने को बदलने के फैसले पर अमल किया चौथे दिन मेरी पत्नी बहुत हैरान-परेशान दिखी और मेरे पास आकर चिंतातुर होकर बोली कि सब ठीक तो है? आप इतने चुप क्यों हैं? आपकी तबीयत तो ठीक है? मैंने तब उसे भी आपका लेख पढ़वाया। अब हमारी जि़ंदगी पहले से बहुत स्‍मूद चल रही है।  
फिर भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि बदलाव उन्हीं में आएगा जो अपने को बदलना चाहते हैं यह एक तल्ख सच्चाई है। जो अपने पौरुषीय अहंकार और शॉविनिज़्म को 'फेदर इन द कैप' की तरह सजाकर बैठे हैं, वे ताउम्र इसी के साथ जि़ंदगी बसर करेंगे। जो अपने को बदलना चाहते ही नहीं, उन्हें कोई क्या खाकर बदलेगा !