बचपन से लेकर जवानी तक कभी वो रोया नहीं था। रोया तो जरूर होगा बस उसे याद नहीं था कि होश संभालने के बाद उसने कभी आंसू बहाये हैं। तब भी नहीं जब उसकी मां मरी थी, तब भी नहीं जब कफन के लिए पैसे नहीं थे और तब भी नहीं जब लगातार भूख के कारण लोगों के फेंके गए जूठन के लिए अपने जैसे बच्चों से छीनाझपटी करनी पड़ी। क्योंकि उसे लगता था कि ये सब उसके जैसे गरीब लोगों की जिंदगी का हिस्सा है। इसी तरह वह बिना रोये जवान हो गया था। लोग उसे पत्थर कहते थे, क्योंकि लोग चाहते थे कि वो रोये अपनी गरीबी पर, अपनी लाचारी पर, भगवान द्वारा लिखी अपनी दुर्दशा पर लेकिन वो रोता नहीं था।
धीरे-धीरे वो मेहनत से रोटी कमाना सीख गया था। जिंदगी की जंग में उसे अपने जैसा एक और योद्धा मिला था- एक नन्हा योद्धा, कूड़ा बीनते हुए। उसे घर ले आया था और उसी के साथ हंस-बोल लेता था। पता नहीं जरूरत थी या फिर एक तरह की बदकिस्मती, दोनों एक दूसरे का ख्याल रखने लगे थे, बिल्कुल सगे भाईयों की तरह। समय तेजी से बीत रहा था और अब वो अपनी गरीबी से मुक्त होकर एक हंसमुख इंसान बनने लगा था। पैसे तो अब भी नहीं थे बस हंसी का खजाना मिल गया था। लेकिन कालगति ने एक बार फिर उसकी परीक्षा ली। नन्हा योद्धा अचानक बीमार हो गया। उसके पास पैसे नहीं थे कि उसका इलाज करा सके और योद्धा मर गया। फिर उसे याद आया कि बचपन में उसकी मां मरी थी ऐसे ही बिना पैसे के और अब भाई की तरह का उसका साथी। और इस बार वो मजबूत नहीं रह पाया, टूट गया, फूट-फूटकर रो पड़ा। लेकिन उसके दुख में कोई शामिल नहीं हुआ। लोगों ने बस इतना कहा कि देखो पत्थर भी रोता है...
