Friday, 29 July 2011

पत्थर भी रोता है



बचपन से लेकर जवानी तक कभी वो रोया नहीं था। रोया तो जरूर होगा बस उसे याद नहीं था कि होश संभालने के बाद उसने कभी आंसू बहाये हैं। तब भी नहीं जब उसकी मां मरी थी, तब भी नहीं जब कफन के लिए पैसे नहीं थे और तब भी नहीं जब लगातार भूख के कारण लोगों के फेंके गए जूठन के लिए अपने जैसे बच्चों से छीनाझपटी करनी पड़ी। क्योंकि उसे लगता था कि ये सब उसके जैसे गरीब लोगों की जिंदगी का हिस्सा है। इसी तरह वह बिना रोये जवान हो गया था। लोग उसे पत्थर कहते थे, क्योंकि लोग चाहते थे कि वो रोये अपनी गरीबी पर, अपनी लाचारी पर, भगवान द्वारा लिखी अपनी दुर्दशा पर लेकिन वो रोता नहीं था।
                                                     धीरे-धीरे वो मेहनत से रोटी कमाना सीख गया था। जिंदगी की जंग में उसे अपने जैसा एक और योद्धा मिला था- एक नन्हा योद्धा, कूड़ा बीनते हुए। उसे घर ले आया था और उसी के साथ हंस-बोल लेता था। पता नहीं जरूरत थी या फिर एक तरह की बदकिस्मती, दोनों एक दूसरे का ख्याल रखने लगे थे, बिल्कुल सगे भाईयों की तरह। समय तेजी से बीत रहा था और अब वो अपनी गरीबी से मुक्त होकर एक हंसमुख इंसान बनने लगा था। पैसे तो अब भी नहीं थे बस हंसी का खजाना मिल गया था। लेकिन कालगति ने एक बार फिर उसकी परीक्षा ली। नन्हा योद्धा अचानक बीमार हो गया। उसके पास पैसे नहीं थे कि उसका इलाज करा सके और योद्धा मर गया। फिर उसे याद आया कि बचपन में उसकी मां मरी थी ऐसे ही बिना पैसे के और अब भाई की तरह का उसका साथी। और इस बार वो मजबूत नहीं रह पाया, टूट गया, फूट-फूटकर रो पड़ा। लेकिन उसके दुख में कोई शामिल नहीं हुआ। लोगों ने बस इतना कहा कि देखो पत्थर भी रोता है...
                                                    
                                                                                                       

Sunday, 10 July 2011

काले धन का काला सच

काले धन पर मीडिया, राजनीतिज्ञ और देश की आम जनता सभी बवाल मचा रहे हैं, लेकिन मीडिया और जनता के अलावा जो तीसरा पक्ष है वो नहीं चाहता कि उनकी काली कमाई देश में वापस आए। कांग्रेस सरकार शोर तो मचा रही है कि स्विस बैंकों में जमा देश का पैसा वापस लाया जाएगा लेकिन इस दिशा मे कोई कार्रवाई होती दिखाई नहीं दे रही है। अगर कुछ दिख रहा है तो इसे वापस लाने की मुहिम में जुटे लोगों पर सरकार की दमनात्मक जिद। बाबा रामदेव के आंदोलन को दबाना हो या अन्ना पर सरकार के सिपहसालारों की जुबानी जमाखर्च हर तरफ एक स्याह परत दिख रही है। कांग्रेस सरकार न तो देश में व्याप्त भ्रष्टाचार मिटाने की पहल का साथ दे रही है और न देश के बाहर गए पैसे को वापस लाने में कोई दिलचस्पी दिखा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भ्रष्टाचार और काले धन के पीछे सरकार का मौन समर्थन है? क्या सरकार अपने दामन के दागदार होने के डर से कोई ठोस हल निकालने से हिचकिचा रही है?  या फिर सरकार ( मनमोहन सिंह) इतनी निर्बल है कि वो इस मुद्दे पर कुछ कर हीं नहीं पा रही है? 
                 वजह चाहे जो भी हो कांग्रेस की सरकार हर मुद्दे पर फेल साबित हो रही है और जनआक्रोश बढ़ता जा रहा है। बात एक अन्ना और रामदेव की नहीं है  बल्कि उन्हे मिले दूर दराज के लोगों का समर्थन है जो सरकार के खिलाफ गुस्से की कुलबुलाहट से शुरू हुई है और इसे भड़कते देर नहीं लगेगी।