चहलकदमी
पिछले दो सालों से शाम उसी रास्ते पर गुजरती थी, चहलकदमी करते हुए। चहलकदमी
इसलिये कि चलने की गति हर रोज एक सी होती थी, न कम न ज्यादा। पैरों में तेज चलने
की चाहत न थी ऐसी बात नहीं बल्कि मन में कोई उत्साह नहीं था और जब मन अनुमति न दे
तो पैर अपनी गति पकड़े कैसे? बस फिर क्या है रोज हौले-हौले
कदम ताल होती उबड़ खाबड़ रास्तों से और मन आस पास की बजबजाती नालियों को देखते
हुये दूर तक चला जाता। इतनी दूर की कभी हजारों किलोमीटर दूर चुल्हे के पास बैठी
माँ के हाथों सिंकती रोटियों की सुगंध आती तो कभी आँगन में फुदकते नन्हें गोरैय्या
की याद आती और हाँ याद आती एक रोबदार आवाज जिसे सुनकर मन क्या आत्मा तक थर्रा
उठती, बेशक पापा को याद करना उसके लिये कोई मीठा आनंद नहीं था बल्कि वो तो खुद ब
खुद माँ और गोरैय्या की बहुत मीठी यादों को संतुलित करने के लिये कड़वे नीम की तरह
आ टपकते थे। जैसे ही पिता की याद आती होठों पर खिलती हुई मुस्कान खो जाती और वो
लौट आता बजबजाती नालियों पर और उसे घिन आती देखकर। पिच्च से थूकते हुये
म्यूनिसिपल्टी वालों को कोसता- इतने सारे टैक्स लेते हैं लेकिन इन खुली नालियों को
ढंकने का कोई उपाय नहीं करते, अरे कम से कम इन पर जमा होने वाले मच्छरों को रोकने
के लिये किसी दवा का तो छिड़काव करते,,, कुछ नहीं हो सकता इस देश का,,, सोचते हुये
अचानक पिता की याद आती वो भी तो ऐसे ही बोलते हैं... इस बार वह मुस्कुरा उठता और
माँ की बातें याद आ जाती- तू बिल्कुल अपने पिताजी पर गया है… बदले में वो कहता हाँ, खून
का असर तो होगा ही....। इस तरह हर रोज उसका रास्ता कटता। खरामा खरामा वो एक
किलोमीटर का सफर शुरु करता और उस सफर के अंत तक आते आते वह एक युग जी चुका
होता।
वो तो खुद ब खुद माँ और गोरैय्या की बहुत मीठी यादों को संतुलित करने के लिये कड़वे नीम की तरह आ टपकते थे। .........bahut sundar.
ReplyDeleteGood one...well written...!!!
ReplyDeletenice
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