Tuesday, 27 August 2013

बाबा की महिमा



सोनी किशोर सिंह
गोरे, लम्बे, तगड़े और खूबसूरत बाबा को देखकर अक्सर भक्तों को यह गुमान होता कि मेरे परम पूज्य बाबा जी किसी मॉडल से कम नहीं हैं। स्वयं बाबा भी इसी गुमान में रहते कि वो किसी फिल्मी एक्टर की तरह दिखते हैं और उनकी सम्मोहन कला तो अच्छी-अच्छी अभिनेत्रियों को सम्मोहित करने की क्षमता रखती ही थी। पर बाबा में एक कमी थी। उनका व्यक्तित्व जितना प्रभावकारी था वाणी उतनी ही निकृष्ट। बाबा जब भी वार्तालाप करते ऐसा लगता किसी से वाक् युद्ध कर रहे हैं। अपनी वाणी पर उनका अंकुश न था। वो तो भला हो उनके चेलों का जो बाबा के कर्कश प्रहारों को प्रसाद का रूप बताकर भक्तों को भ्रमित कर देते थे और करें भी क्यों न बाबा ने चेलों को रखा ही इसीलिये था कि उनकी लौकिक बुराईयों को अलौकिक बताकर भक्तजनों के बीच उन्हें महिमामंडित किया जाता रहे।
लगभग दो दशक से बाबा का कारोबार फल-फूल रहा था। बाबा दिन में भक्तों के सम्मुख ब्रह्मचर्य की शिक्षा देते और संध्या काल में सांसारिक भोग विलास में लिप्त हो जाते। यह क्रम वर्षों से चल रहा था। एक तरफ बाबा की जय जयकार हो रही थी दूसरी तरफ संसार के सम्मुख दिखाई देने वाली बाबा की श्वेत श्याम कुटिया में चोरी छिपे नये नये रंगों का आगमन हो रहा था। बाबा उन रंगों में सराबोर होकर और निखर उठे थे। अब वो भक्तों को उपदेश देते समय भी यदा कदा कोमल संवाद कर बैठते। भक्तगण आश्चर्य में डूबते जा रहे थे कि कर्कश वाणी सम्राट उनके बाबा अचानक कोमल हृदय क्यों होते जा रहे हैं। भक्तगण की आपसी काना-फूसी एक दिन बाबा के मुख्य चेले केलाराम तक जा पहुँची। केलाराम व्यथित हो उठे। जिस बाबा को वर्षों तक अपने पीआर के दम पर ब्रांड बनाया उसकी पब्लिक इमेज को सेंसेक्स की तरह धड़ाम से गिरते देख केलाराम आग बबूला हो उठे और सीधे धड़धड़ाते हुये बाबा तक पहुँच गये। संध्याकाल का प्रवचन समाप्त कर बाबा उस वक्त सुरापान कर रहे थे। केलाराम को तैश में देख कर कुछ अचंभित होते हुये बोले- क्यों बे इतनी तमीज नहीं है तेरे को कि किसी के कमरे में पूछ कर आते हैं... ।
केलाराम बाबा की बात अनसुनी करते हुये बोला- आपको क्या हो गया है, इतनी मेहनत से बनायी आपकी इमेज आप खुद ही खराब करने पर तुले हुये हैं....। केलाराम अलां-फलां समझाते रहे। बाबा हूँ, हाँ, हाँ, करते रहे। लगभग एक घण्टे बाद बाबा लड़खड़ाते हुये उठे और बोले केलाराम अब तू दफा हो यहाँ से मेरे सोने का टाइम हो गया..। केलाराम बुरी तरह उखड़ गया- मैं आपको क्या समझा रहा हूँ आपको नींद की पड़ी है.... उधर बाबा पर नशा विराजमान हो चुका था। बाबा अपने असली रूप में आ गये। केलाराम पर चीख-चीख कर उसके अतीत का वर्णन करने लगे। पूरा आश्रम एकत्रित हो गया। केलाराम भी अपना अपमान बर्दाश्त करने के मूड में न था। वह भी बाबा की बखिया उधेड़ने लगा। दोनों ने एक दूसरे की खूब छीछालेदार की। कोई भी एक दूसरे से दबने के लिये तैयार न था। बाकि चेलों ने किसी तरह से बीच-बचाव किया। सब अपने अपने शयन कक्ष की ओर चले गये।
सुबह आँखे खोलते ही केलाराम ने देखा बाबा तमंचा लेकर उसके सीने पर सवार है। केलाराम पसीने पसीने हो गया। मुझे क्षमा कर दीजिए जैसी भावना के साथ उसके नयनों से भय की धारा बह रही थी। बाबा के मुख से निरन्तर अग्निवर्षा हो रही थी। बड़ी मुश्किल से केलाराम को उन्होंने क्षमा किया और बोले देख केले मैं मानता हूँ कि मुझे तूने स्टार बनाया लेकिन तू ये क्यों नहीं मानता कि स्टार बनने की काबिलियत मुझमें पहले से थी। अभी देख तू तूझे जान से मारा भी नहीं और तू भयभीत हो गया। इसी को कहते हैं काबिलियत... समझ गया.... केलाराम थर थर काँपते हुये बस हाँ,हाँ में सिर हिला रहा था।



Saturday, 24 August 2013

बहिष्कार करो बलात्कारी बाबाओं का



सोनी किशोर सिंह
इस देश की आधी से ज्यादा आबादी धार्मिक होने के चक्कर में मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना तो करती ही है साथ ही साधु-महात्माओं की कृपा पाने के लिये भी सदैव तत्पर रहती है। परिणाम यह होता है कि धर्म के ये ठेकेदार हजारों पाप करके संत और महात्मा बन जाते हैं, लोग इनकी बातें आँख मूँदकर मानने लगते हैं। धीरे-धीरे धन, वैभव, लोकप्रियता के आसमान पर पहुँच जाते हैं और तब दुनिया की आँखों में ब्रह्मचर्य का धूल झोंकने वाले ये तमाम बाबा अपने असली रूप में आते हैं। इनके रसूख के चलते इनके भोग विलास के किस्से दुनिया के सामने खुलकर आता ही नहीं और अगर गलती से पता चल भी जाता है तो इनके ऊपर कार्रवाई नहीं होती, क्योंकि इस हम्माम में सब नंगे हैं।
इस देश में शायद ही कोई ऐसा लोकप्रिय संत हो जिसके ऊपर हत्या, बलात्कार आदि का आरोप न लगा हो। ये अलग बात है कि हर बार ये बच निकलते हैं क्योंकि सरकार और प्रशासन इन पर हाथ डालने से डरती है। सवाल यह है कि ऐसे हत्यारे-बलात्कारी बाबाओं के हजारों-लाखों भक्तों का विवेक उस वक्त सुन्न क्यों हो जाता है जब इनके तथाकथित भगवान किसी की अस्मत लूटते हैं, गुण्डागर्दी करते हैं, हत्या करते हैं, आदि, आदि। भारत धर्मभिरूओं का देश है ये तो पता है लेकिन कायरों की इतनी लम्बी चौड़ी फौज हमारे आपके बीच पनप गई है जो आस्था और धर्म के नाम पर ये घिनौना खेल देख रहे हैं। दोषी बाबाओं को सजा मिले न मिले ये कानून का विषय है लेकिन सामाजिक बहिष्कार तो होना ही चाहिए वरना ऐसे ही बच्चियों की अस्मत लुटती रहेगी और एक दिन ऐसा आयेगा जब धर्म के नाम पर ये ठेकेदार निरंकुश बलात्कारी होकर हर घर पर कुदृष्टि डालेंगे।
लोगों को समझना होगा कि धर्म के इन दलालों का अतीत कितना काला है। अगर भक्तों की आस्था और विश्वास के बल पर इन्हें महान और भगवान की संज्ञा दी भी जाये तो ये अपनी मूल पैशाचिक प्रवृति से मुँह नहीं मोड़ पाते हैं। इसलिये धर्म का कारोबार और इसके ठेकेदारों को अगर सरकार सजा देने से बच रही है तो हम-आप मिलकर उसे सजा दे सकते हैं उसके संत होने का तमगा छीनकर, उसे यह अहसास करा कर कि वो संत तो क्या आम इंसान होने के लायक भी नहीं है।
http://beyondheadlines.in/2013/08/do-boycott-of-rapist-baba/ 


Tuesday, 6 August 2013

अधूरे ख्वाब

मेरी कहानी 'अधूरे ख्वाब' का एक अंश...
तुम नहीं समझोगे माधव, बहुत तकलीफ होती है जब तुम हवाओं से बातें करते हो, बहुत दर्द होता है जब तुम्हे आसमान की बुलंदियों पर देखती हूँ, देखती हूँ कि तुम्हारे आस-पास ढ़ेर सारे लोगों का जमघट लगा है और तुम खुश होकर अपनी कामयाबी का जश्न मना रहे हो। तुम कहोगे कि मैं कैसी पत्नी हूँ जो तुम्हे खुश देखकर खुश नहीं होती। पर क्या करुँ माधव मैं चाहती हूँ कि तुम्हे सारी खुशियाँ मिले लेकिन मेरे बगैर नहीं। मुझे ये कभी मंजूर नहीं कि मेरे बिना अपने जीवन का एक पल भी तुम जियो। मुझे तुम्हारे बिना साँस भी लेना मंजूर नहीं और तुम मुकम्मल जिन्दगी जिये जा रहे हो।
माफ करना, ये कहने का भी हक तो नहीं दिया है तुमने, शायद मुझे कभी पत्नी माना ही नहीं लेकिन क्या करूँ समाज ने और खुद मैंने भी तुम पर ये अनचाहा रिश्ता थोप दिया है और यही वजह है कि मैं तुम्हारी खुशियों में कहीं शामिल नहीं हो पाती। लेकिन अगर तुम कामयाब नहीं होते, तुम्हारे पास पैसे नहीं होते तो शायद तुम मुझे यूँ अधूरे न मिलते। हाँ.. तुम हमेशा अधूरे रहते हो मेरे पास, संपूर्णता में कभी देखा ही नहीं। जब बातें करते हो तो तुम्हारी नजरें मेरे चेहरे को नहीं देखती तुम कहीं दूसरी तरफ देखते रहते हो। कई बार मन होता है कि तुम्हे जबर्दस्ती अपनी तरफ देखने को कहूँ और फिर पुछूँ कि क्यों नही देख पाते तुम मुझे। जब तुम मुझे छूते हो तो लगता है कि किसी बेजान बुत को छू रहे हो और उस वक्त... उफ्फ... तुम्हे पता नहीं पर कई ऐसी छोटी-छोटी बातें होती हैं जो तुम्हारे लिये मायने नहीं रखती पर मेरा तो वजूद हिला देती हैं माधव...। एक पल के लिए भी कभी तुमने सोचा है कि मुझे किस बात की सजा दे रहे हो। क्या तुम्हे प्यार करना गलत था, क्या तुम्हे पागलपन की हद तक हासिल करने का जुनून गलत था और अगर ऐसा था तो एक बार सिर्फ एक बार मुझे बोल देते कि कामिनी मेरे सपने में तुम कभी नहीं आती... मेरी आनेवाली जिन्दगी के कैनवास पर तुम्हारे नाम का कोई रंग नहीं है... मैं तो तुम्हारे मौन को स्वीकृति समझ बैठी। क्या प्रेम को परिणति देने का मेरा फैसला गलत था माधव.......
सोनी किशोर सिंह