Thursday, 28 November 2013

एक आवाज़

मैं जानती हूँ तू बेपरवाह है मेरे लिये
पर मैं तुझे याद करके तिनका-तिनका हर रोज टूटती हूँ,
बस कभी मेरे टूटने की आवाज़ होने दे।।
    तू सिमटता नहीं मुझमे, बिखर जाने की आदत है तेरी
    मैं भी बिखरी हूँ हर रोज तेरे लिये सितारों की तरह,
    इस बेख्याली के लिये मुझे नाराज़ होने दे।।
मेरी आँखों में कैद आँसू चीख कर कहने लगे हैं,
अब तो बह जाने दे मुझे दर्द का दरिया बनकर,
चल, अश्कों की बारिश का आगाज़ होने दे।।
    न जाने कैसे तू रो लेता है, मेरे दामन में सर छुपाके
    तब भी रहते हैं लफ्ज़-ए-हौसलों से खाली लब मेरे
    बस खुदा अब मुझे बेआवाज होने दे।।
न रूह, न जिस्म, न हौसला कोई, बस तू एक ख्याल है
तू शाख पर लगे रहना, मैं जी लूँगी हवा का झोंका बनकर
कभी तो इस झूठी मोहब्बत पर मुझे नाज़ होने दे।।

 


समंदर में रेगिस्तान



अथाह जलराशि के किसी छोर पर,
छुपा था एक छोटा सा रेगिस्तान।
कभी-कभी खारे पानी की कुछ बूँदें,
आ जाती थीं वहाँ अठखेलियाँ करते।
बूँदों संग बलुआही कण धूम मचाते,
वो युगों-युगों तक छुपे रहना चाहते थे,
ऐसे ही खेलते, बल खाते, इतराते,
हाहाकार करते जलदेव के सीने में।
एक सुकून की जगह मिली थी उनको,
जहाँ वो अपने सुख-दुख बतियाते रहते।
इस तरह उग आये थे कई खर-पतवार,
अब नाविक भी आने लगे थे बेझिझक,
और रेगिस्तान में होने लगी थी हलचल।
उभर आया वो समुन्दर के मानचित्र पर,
इस तरह बूँदों की अल्हड़ अठखेलियों ने,
मिटा दी पहचान एक छुपे रेगिस्तान की।