अथाह जलराशि के किसी छोर पर,
छुपा था एक छोटा सा रेगिस्तान।
कभी-कभी खारे पानी की कुछ बूँदें,
आ जाती थीं वहाँ अठखेलियाँ करते।
बूँदों संग बलुआही कण धूम मचाते,
वो युगों-युगों तक छुपे रहना चाहते थे,
ऐसे ही खेलते, बल खाते, इतराते,
हाहाकार करते जलदेव के सीने में।
एक सुकून की जगह मिली थी उनको,
जहाँ वो अपने सुख-दुख बतियाते रहते।
इस तरह उग आये थे कई खर-पतवार,
अब नाविक भी आने लगे थे बेझिझक,
और रेगिस्तान में होने लगी थी हलचल।
उभर आया वो समुन्दर के मानचित्र पर,
इस तरह बूँदों की अल्हड़ अठखेलियों ने,
मिटा दी पहचान एक छुपे रेगिस्तान की।
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