Saturday, 22 March 2014

उम्र क़ैद काफी नहीं



सोनी किशोर सिंह
मुंबई में शक्ति मिल गैंगरेप के मामले में चार बलात्कारियों को उम्र कैद की सजा दी गई। पिछले साल हुये इस मामले में इतनी त्वरित कानूनी कार्रवाई और सज़ा निश्चय ही स्वागत योग्य है। लेकिन इक्का-दुक्का मामले में फैसलों को छोड़ दें तो अभी हज़ारों ऐसे जघन्य बलात्कार के मामले सालों-साल से लंबित पड़े हैं जिसमें क्रूर तरीके से बलात्कार के बाद लड़की की हत्या कर दी गई या फिर उसे गहरा शारीरिक-मानसिक आघात देकर छोड़ दिया गया। ऐसे मामलों में पीड़ित या मृत लड़की ही नहीं बल्कि उसका परिवार भी अत्यंत कठिन मानसिक संत्रास के दौर से गुजरता है। बलात्कार के सभी मामलों को त्वरित अदालत में निबटाकर अपराधियों को सख्त सज़ा देना कानून और प्रशासन का काम है लेकिन हमारी निकम्मी सरकारें और भ्रष्ट व्यवस्था तब तक मदहोश रहती है जबतक आँच उनके घरों तक नहीं पहुँचती।
जरा सोचिये जब एक माँ की आँखें अपनी बच्ची की वापसी के इंतज़ार में पथरा कर रह जाती हैं, एक पिता अपने सपनों को अपनी बेटी में पूरा होते देखे बिना दम तोड़ देता है, एक भाई अपनी सूनी कलाई लिये हर साल आने वाले राखी के त्यौहार पर रो पड़ता है, जब एक बहन अपने दिल की बात बाँटे बिना अपनी हमउम्र बहन की बची-खुची यादों को समेटती रहती है तो हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उस घर की दीवारों में कितना दर्द तैरता होगा। काश ये बातें महज़ शब्दों का जाल होतीं, लेकिन ये सच्चाई है ऐसे परिवारों की जिन्होंने अपनी बेटियों को खो दिया है। कोई प्रतिभाशाली छात्रा, कोई आज्ञाकारी बेटी, कोई चुलबुली बहन बलात्कारियों की भेंट चढ़ती रहती है लेकिन पुलिस में एफआईआर तक दर्ज नहीं होती।
ये दुर्दशा किसी एक अकेले परिवार की नहीं है बल्कि तमाम उन परिवारों की है जिनकी रिपोर्ट पुलिस थाने में लिखी ही नहीं जाती या अगर लिख ली जाती है तो आरोपी को पकड़ना तो दूर उल्टे पैसे लेकर पीड़ित परिवार को ही परेशान किया जाता है। हमारे देश में बलात्कार की अधिकांश वारदातें कहीं किसी पुलिस रिकार्ड में नहीं मिलती। इन वारदातों के निशान लड़की के शरीर और उसके परिवार के मन पर दिखते हैं।    

Friday, 7 March 2014

औरत के हक़ में



सोनी किशोर सिंह
तस्लीमा मेरी प्रिय लेखिका हैं। उनकी 'द्विखंडिता' का कुछ अँश पढ़ा था, तभी से वो और अच्छी लगने लगीं। उनकी बेबाकी, हिम्मत, संघर्ष, स्त्रीवादी विचारधारा, उनका लिखा साहित्य, आदि मुझे बहुत पसंद है। एक स्त्री जब अपनी शक्तियों को पहचान कर उसके आयामों को जीना शुरू करती है तो उसे हज़ार मुसीबतें उठानी पड़ती है। हमारा समाज एक बौद्धिक और क्रांतिकारी सोच वाली स्त्री को स्वीकार नहीं करता, उस सोच को पचा नहीं पाता और उल्टियाँ करता है। इसकी बास से बाकी तमाम स्त्रियाँ या तो डर कर अपनी सोच का दायरा सीमित कर लेती हैं या प्रतिकार कर अपना विस्तार करती हैं। हमारे समाज की अधिकाँश स्त्रियाँ, दायरा सीमित करने में अपनी भलाई समझती हैं और सदियों की सड़ी-गली परंपराओं को ढ़ोते हुये मृत्यु का वरण करती हैं, लेकिन जो अपना विस्तार करना चाहती हैं उनके लिये बहुत कठिन जीवन होता है। वो तस्लीमा नसरीन और आंग-सान सू की बन जाती हैं।
स्त्रियों के लिये जीवन के दो ही रास्ते हैं - डरो या डराओ, कोई मध्यम मार्ग बना ही नहीं है। तमाम स्त्रियाँ डरी हुई होती हैं। पुरुषवादी व्यवस्था के बीच अपने को अबला मानकर पराश्रित रहने के लिये मानसिक रूप से खुद को तैयार कर लेती हैं। वो मनु और तुलसीदास के विचारों को पोषित करने के लिये पैदा होती हैं कि स्त्रियाँ बंधन में रहने के ही योग्य होती हैं और उनका आश्रयदाता पिता, पति और पुत्र के रूप में कोई पुरुष ही हो सकता है। कभी-कभी इस डरी हुई आबादी को अपनी शक्ति का अहसास कराने के लिये कोई आवाज उठती है और हजारों-लाखों की भीड़ में कोई तस्लीमा उभरती है। अपनी किताब 'औरत के हक में' तस्लीमा ने उन तमाम वर्जनाओं, डर, संशय को लिखा है जो किसी औरत को औरत होने के लिये भुगतना होता है। वो मनुष्य न होकर सिर्फ औरत होती हैं। तस्लीमा इसीलिये बेहतरीन हैं कि उन्होंने अपने औरतपन का विस्तार किया है। समाज के बनाये साँचे में ढ़लने के बजाये अपने स्त्रीत्व का विस्तार किया है। असीमित, अपरिमित, असंख्य, अलौकिक, अतार्किक स्त्री के रूप में। तस्लीमा नसरीन ने औरत की अबतक की बनी-बनायी झूठी परिभाषा के स्थान पर एक नयी सोच गढ़ी है, जो देह के बंधन से ऊपर उठकर मनुष्यता की माँग करती है और जब यह मनुष्यता उसे इस समाज से नहीं मिलती तो वो तमाम स्त्रियों से अपना हक छीनने को कहती हैं। यह समाज 'जीयो और जीने दो' का नारा देता है तो सिर्फ पुरुषों के लिये क्योंकि स्त्रियों को समाज का हिस्सा कभी माना ही नहीं जाता है। वो सिर्फ ऐश्वर्य और उपभोग की वस्तु है। इसलिये तस्लीमा जिन्दगी की नयी परिभाषा गढ़ती हैं अपने लिये और तमाम उन स्त्रियों के लिये जो मनुष्य बनकर जीना चाहती हैं।    

Saturday, 1 March 2014

शुक्ला की चाय



सोनी किशोर सिंह
ऑफिस में घुसते ही सीधे निगाह पड़ती है उस दढ़ियल पर। देखते ही तन-बदन में आग लग
जाती है लेकिन नजर मिलते ही मुस्कुरा कर अभिवादन में हल्का सा सिर झुका लेना आदत सी
बन गई है। आदत भी पिछले तीन सालों से एक सी। मुझे ये भी पता होता है कि मेरे ऐसा
करने से वो चिढ़ जाता है लेकिन मैं ऐसा जरूर करती हूँ क्योंकि उसके चिढ़ने से मुझे खुशी
मिलती है। मैं चाहती हूँ कि वो मुझसे चिढ़ कर मेरी तरह ही चिड़चिड़ा बन जाये या फिर मेरी
इस हरकत से इतना जले कि लोग उसे जलकुकड़ा नाम दे दें। लेकिन मेरी सोच धरी रह जाती
और ऐसा कुछ भी नहीं होता। मैं मुस्कुराकर अभिवादन करती और वो पूरी बेशर्मी से उसे
स्वीकार करता, बदले में वो भी एक छिछोरी हँसी उछालता। उसके ऐसा करने पर लगता कि
दिनभर में जितना खा-पीकर खून बनाती हूँ उसकी एक झलक देखते ही घृणा से सूख जाता है।
तभी तो सब चिड़चिड़ी कहते हैं और मैं हो भी गई हूँ जिद्दी, चिड़चिड़ी, खडूस और न जाने क्या
क्या। आप सोच रहे होंगे मैं किसकी बुराई कर रही हूँ, उसकी या खुद की। दरअसल हम दोनों ही
अपनी-अपनी जगह या तो बहुत अच्छे हैं या फिर बहुत काईंया, बद्तमीज। न वो सुधरने के
लिए तैयार और न ही मैं। खैर वो तो मेरा बॉस है वो क्यों सुधरेगा, तब? तब लोग मुझे ही
सुधरने की हिदायत देते हैं और मैं कहती हूँ कि जब वो नहीं सुधर सकता तो मैं क्यों सुधरूँ।
क्या बिगड़ने का ठेका इसी बुड्ढ़े ने ले रखा है मैं क्यों नहीं बिगड़ सकती? यही सोच-सोचकर
मैंने बिगड़ना शुरू किया और मेरी बिगड़ने की रफ्तार इतनी तेज रही कि तीन साल होते-होते मैं
उस खूसट से ज्यादा बिगड़ैल हो गई। इतनी बिगड़ैल की कोई कमेंट पास करता तो मैं उसकी
सात पुश्तों को श्रद्धांजलि दे देती और कोई लड़कियों को ऊँच-नीच समझाने का दिखावा करता तो
उसके पौरुष को प्रदर्शित करने वाले निहायत निजी अंगों को ऐसे-ऐसे उपमान देती कि सामने
वाले की घिग्घी बँध जाती। कुल मिलाकर मैं अपने बलबूते जितना हो सकता था बिगड़ चुकी थी
और मेरी लगातार कोशिश यही रहती कि अगर निहायत बिगड़ैल होने या बनने के लिये कुछ
योग्यताएँ बाकी रह गई हैं तो उनमें भी निपुणता हासिल कर लूँ क्योंकि मुझे मालूम था कि देर-
सबेर उस खूसट, कुरुप, बेशर्म बुड्ढ़े से मेरी भिड़न्त होगी ही और जब ऐसा हो तो मेरी हार नहीं
होनी चाहिए। अब तो मुझे ऐसा लगने लगा है कि मैं दो-दो हाथ करने के लिये तैयार हूँ उससे।
बस एक मौका मिल जाये...
बहुत देर से टकटकी लगाये देख रहा है, साला... एक भद्दी सी गाली निकली मेरे मुँह से। सामने
बैठे अग्रवाल साहब ने चश्मे को ठीक करते हुए मेरी तरफ देखा।
किसे कह रही हैं मैडम, बड़े साहब को- अग्रवाल साहब ने प्रश्नवाचक नजरों से मेरी तरफ देखा तो मैंने जानबूझकर दाँत दिखाते हुये कहा- अग्रवाल साहब, पचपन के तो होंगे ही, कमीनेपंथी में
दूर-दूर तक आपके बराबर कोई नहीं। जान-बूझकर अनजान बनते हो, अगर नहीं समझे तो मेरी
बला से, साला शुक्ला नहीं तो फिर आपका बाप,,,,
अग्रवाल साहब मेरे इस आक्रमण को खींसे निपोरते हुए झेल गये- क्या मैडम आप भी नाराज
हो जाती हैं, छोड़िये न इनकी तो आदत है।
अग्रवाल भी कम खूसट नहीं था, बस वो जरा सा डरपोक था इसलिए बच-बचाकर ही रहने में
अपनी भलाई समझता था।
ऐसा भी नहीं था कि मैं 'बड़े साहब' यानि की अभिलाष शुक्ला को पहली बार कुछ कह रही थी मेरी तो हर रोज की आदत थी। शुक्ला को दिन भर में पचास-साठ चुनिंदा गालियाँ देने की, लेकिन अग्रवाल साहब जब भी सुनते तो पूछते- किसे कह रही हैं मैडम, बड़े साहब कोऔर फिर मैं शुक्ला को पीठ पीछे गाली देने की अपनी सारी बेबसी बिना किसी हिचक के अग्रवाल साहब पर उतार देती।
अब सबको ये जानने का भी कौतुहल होगा कि आखिर अग्रवाल साहब भी कमीनेपंथी के महारथी
हैं तो फिर मैं शुक्ला के पीछे हाथ धोकर क्यों पड़ी हूँ। तो प्रिय पाठकों आपको जरा फ्लैशबैक में
लेकर चलती हूँ।
मैं यानि कामिनी खन्ना चंडीगढ़ की बहुत सीधी-सादी लड़की थी। तीन साल पहले बेहतर नौकरी
की चाह में दिल्ली आई और एक विज्ञापन एजेंसी में नौकरी करने लगी। शुरुआती दो महीने बड़े
आराम से गुजरे, ऐसा लगा कि जि़न्दगी चल पड़ी है, लेकिन वो कहावत है न कि सर मुड़ाते ही
ओले पड़े ठीक वैसे ही दो महीने के बाद मेरे बॉस का तबादला हो गया और उसकी जगह पर
अभिलाष शुक्ला आ गये। उनको ऑफिस के सभी कर्मचारियों से परिचय करवाया जा रहा था।
जब मेरा परिचय कराया गया तो उन्होंने मुझे केबिन में आने को कहा। मैं जब उनके केबिन में
पहुँची तो उन्होंने मुझे चाय ऑफर की। मेरे मना करने पर अपनी दायीं आँख दबाते हुये कहा-
कामिनी जी, चाय तो आपको पीनी ही पड़ेगी, मर्जी से पियें तो अच्छा, नहीं तो हम जबर्दस्ती
पिलायेंगे, आखिर हम आपके बॉस हैं।
मुझे काटो तो खून नहीं। डर के मारे कनपट्टियाँ सुलग गई। सर चकराने लगा। मैं जल्दी से बिना
कुछ बोले उठकर उनके केबिन से बाहर आई। बाहर निकलने पर सबकी सवालिया नजरें कुछ
पूछ रही थीं। शायद ये कि अंदर क्या हुआ और मेरी नजरें झुकी थीं, गोया मैंने कोई अपराध कर रखा हो। मैं उस वक्त फूट-फूट कर रोना चाह रही थी लेकिन किसी तरह अपनी पलकों को
आँसुओं का बोझ उठाने की सख्त हिदायत दे रखी थी। उस वक्त मुझे हिना याद आ रही थी
ताकि उसके कंधे पर सर रखकर रोती और वो मुझे हौले-हौले थपकियाँ देकर कहती- अरे क्या
कामिनी बस इतनी सी बात पर ये कीमती आँसू बर्बाद कर रही है, तुझे नहीं पीनी चाय तो मत
पी,  मैं जाकर पी लेती हूँ तेरे बदले। फिर मुझे चिकोटी काट कर कहती- क्यों ठीक है न, अगर
चाय मैं पी लूँ तो... हिना ऑफिस में मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी, लेकिन उस दिन वो छुट्टी पर
थी और मैं खुद को बहुत अकेला महसूस कर रही थी। मैंने झूठ बोल दिया कि पेंडिंग काम
को लेकर सर नाराज हो रहे थे। हालाँकि इस बात को न मैं सहज तरीके से बोल पायी और न
ही मेरे सहकर्मियों ने सहजता से लिया। सब मुझे ऐसे घूर रहे थे जैसे मैं केबिन से कोई अपराध
करके निकली हूँ।
उस दिन सबसे पहले अग्रवाल साहब ने ही चुटकी ली थी- क्या मैडम, आप परेशान दिख रही हैं,
सर ने चाय की जगह डाँट पिला दी क्या?  मैं तब तक कुछ संयत हो गई थी। लेकिन
शुक्ला का खौफ़ या फिर मेरी बिगड़ी हुई मनोदशा का असर कहिये कि पहली बार मेरे मुँह से
गाली निकली- अग्रवाल के बच्चे तुझे बहुत मजा आ रहा है, जा अपनी बीबी को बुड्ढे के केबिन
में ले जाकर चाय पिला...'। न जाने मेरे मुँह से क्या-क्या अनाप-शनाप निकलता गया और बेचारे
अग्रवाल साहब चुपचाप सुनते गये। कुछ देर के बाद जब मुझे अहसास हुआ तो मैंने महसूस
किया कि अग्रवाल साहब को मैं क्यों इतनी खरी-खोटी सुना रही हूँ। मेरी आँखें भीग गई और
मैंने माफी माँगने के लिए अग्रवाल साहब की तरफ देखा तो उन्होंने बड़े ही अपनत्व से कहा-
कोई बात नहीं कामिनी मैडम, होता है... मैं समझ सकता हूँ आपकी हालत। लेकिन हम लोग कर
भी क्या सकते हैं, आप खुद हीं हैंडल कीजिए।
अगले दिन ऑफिस जाने का मन नहीं हो रहा था लेकिन नौकरी तो करनी ही थी इतनी जल्दी
हार कैसे मानती। नई नौकरी भी नहीं थी कि इस्तीफा देकर चली जाती। तो मैंने सोचा क्यों न
इस बात को भूल कर नये सिरे से काम शुरू किया जाये। यही सोच मैं ऑफिस पहुँची। पहुँचते
ही शीशे के केबिन से अभिलाष शुक्ला का थोबड़ा दिख गया। उसने एक छिछोरी हँसी उछाली
मेरी तरफ और मैंने शिष्टाचारवश हल्का सा सर झुकाकर अभिवादन चस्पा कर दिया।
मैं अपनी सीट पर बैठकर अभी सोच ही रही थी कि आगे क्या करूँ कि फोन की घंटी बजी..
किर्र... किर्र.. किर्र.. मैंने अनमने ढ़ँग से उठाया- हैलो,
कामिनी, केबिन में आओ- शुक्ला का सपाट सा स्वर उभरा।
मैं फटाफट अंदर गई, ये सोचते हुये कि कल के लिए शुक्ला जी से माफी माँग कर बात यहीं
खत्म कर दूँ।
मे आय कम इन सर’- मैंने पूरे अदब से पूछा।
आ जाओ कामिनी पूछने की क्या जरुरत है’- शुक्ला साहब बहुत मुलायमियत से बोल रहे थे
लेकिन उनके मन की गंदगी साफ झलक रही थी।
जी सर, कहिये
कहना क्या है कामिनी, बस चाय पीना चाह रहा था तुम्हारे साथ, कल तो तुमने पी नहीं-
टेबल पर रखा पेपर वेट अपनी अंगुलियों से नचाते हुये शुक्ला जी बोल रहे थे।
सर, मैं चाय नहीं पीती- मुझे उस वक्त यही जवाब सूझा।
कोई बात नहीं, मेरे साथ एक-दो कप पीने में बुराई नहीं- शुक्ला जी जिद पर थे।
ठीक है सर- मैंने हामी भर दी।
चीनी कितनी लेंगी ?”
इससे पहले मैं कुछ बोलूँ उन्होंने जल्दी से कहा- अरे, मैं भी क्या सवाल कर रहा हूँ आप तो
खुद इतनी मीठी हैं आपको चीनी की क्या जरुरत?.. क्यों सही कहा न मैंने- शुक्ला जी बेशर्मी से मुस्कुराये।
ऐसा नहीं है सर, मैं चीनी लेती हूँ- मैंने सुलह की आखिरी कोशिश की।
तो मेरे साथ चाय पीने के लिए तैयार हैं आप?”- कहते हुये शुक्ला जी ने चाय की प्याली मेरी
तरफ बढ़ायी। चाय देते वक्त जान-बूझकर मेरा हाथ छूने की कोशिश की और हड़बड़ी में मेरे हाथ से प्याली गिर गई।
ओह नो मिस कामिनी, आपने तो मजा किरकिरा कर दिया- शुक्ला जी ने मेरी हड़बड़ाहट को
और बढ़ा दिया।
ऐसा लगता है कामिनी कि ऑफिस की चाय आपको पसंद नहीं है, कहीं बाहर चलें किसी अच्छी जगह...- साथ ही शुक्ला जी ने एक आँख दबाई।
नहीं सर ऐसी कोई बात नहीं है, वो जल्दबाजी में मेरे हाथ से चाय गिर गई, आई एम रियली
सॉरी सर- मेरे माथे पर पसीना छलछला आया।
आप इतना डरती क्यों हैं ?’ - शुक्ला जी ने अपना हाथ अचानक मेरे बायें हाथ पर रख दिया और ठीक उसी वक्त यंत्रवत मेरा दायां हाथ उनके गालों को छूता हुआ निशान छोड़ गया।
हाऊ डेयर यू, तुमने मुझे थप्पड़ मारा.... मैं... मैं... तुम्हे...- शुक्ला अपने गालों को सहला रहा
था।
मैं घबरा गई, मुझे खुद इस बात का इल्म न था कि मेरा हाथ मेरे बॉस पर उठ जायेगा। मैंने
माफी माँगते हुये कहा- सॉरी सर गलती हो गई।
शुक्ला पूरी ताकत से चिल्लाया- गेट आऊट।
अगले ही पल मुझे लगा कि यह इंसान न माफी के लायक है न इज्जत के। इससे सिर्फ और
सिर्फ नफरत की जा सकती है। केबिन से निकलते वक्त मैंने अपनी पूरी हिम्मत जुटा कर धीरे
से कहा था- सर, मैं यहाँ इम्प्लॉइ हूँ आपकी गुलाम नहीं। आईंदा ऐसी घटिया हरकत करने की
कोशिश मत कीजिएगा, नहीं तो वो हाल करूँगी कि जिन्दगी में फिर कभी किसी को चाय ऑफर
करने लायक नहीं रहेंगे।
वह गुर्राया- तुम्हे मैं छोड़ूँगा नहीं, नाऊ गेट लॉस्ट।
बस उस दिन से अभिलाष शुक्ला और मेरी अघोषित जंग शुरू हो गई और अग्रवाल साहब मेरी
खुन्नस के शिकार बनते चले गये।
अब फ्लैश बैक से बाहर निकलिये। इस घटना को जानकर कुछ लोगों की सहानुभूति कथानायिका यानि की कामिनी से होगी और कुछ लोगों की अभिलाष शुक्ला के साथ। तो मुझसे
सहानुभूति न रखने वालों के भी अपने वाजिब तर्क होंगे कि आखिर बेचारा एक प्याली चाय ही
तो पिलाना चाह रहा था, इतना भाव खाने की क्या जरूरत थी इस कामिनी को... खैर सोचने की
स्वतंत्रता है। मैं आगे बढ़ती हूँ अपनी कहानी की तरफ...इन तीन सालों में कुछ और परिवर्तन
हुआ था... जैसे हिना और अभिलाष शुक्ला में भी छत्तीस का आँकड़ा हो गया था... मैं अग्रवाल
साहब से थोड़ा कम चिढ़ने लगी थी, अभिलाष शुक्ला मुझे हराने की खातिर रोज-रोज
परेशान करने के नये हथकंडे अपना रहा था आदि, आदि। खैर फैसले की घड़ी आ ही गई थी उस
रोज। फैसला भी ऐसा कि न मुझे पता था न अभिलाष शुक्ला को। बस तकदीर ने इस कहानी
का फैसला उसी दिन होने पर अपनी मुहर लगा दी थी।
गुड मॉर्निग- हिना ऑफिस आते ही मेरी तरफ मुखातिब होकर चहकी थी।
मैंने भी एक फीकी मुस्कान देते हुए कहा- क्या बात है आज ऑफिस लेट पहुँची तुम।
क्या करें डियर, रास्ते में रुक कर चाय पी रही थी। कमबख्त ये चाय चीज ही ऐसी है कि एक
बार लत लग गई तो छूटती नहीं- वो शरारत के मूड में थी।
उसकी खुशदिली देख कर अग्रवाल साहब ने भी बहती गंगा में हाथ धोने की कोशिश की- अरे
वाह हिना जी, अकेले-अकेले चाय पी ली हमें भी बुला लेतीं, तो मजा आ जाता।
अब मजे की उम्र नहीं रही आपकी, दाढ़ी-मूछों पर सफेदी छा गई है लेकिन चाय पीने की
तलब कम नहीं हुई है- हिना ने तपाक से तीर छोड़ा।
आपलोगों से तो मजाक भी नहीं सहा जाता- अग्रवाल साहब खुन्नस खा गये।
मैं भी तो मजाक ही कर रही हूँ जनाब, कौन सा पत्थर मार रही हूँ, आप तो हमारे एंग्री यंगमैन
हो- हिना की खिलखिलाहट देख मैं और अग्रवाल साहब दोनों मुस्कुराने लगे।
तो कामिनी मैडम आज क्या प्लानिंग है आपकी- अग्रवाल साहब का इशारा समझते देर न
लगी मुझे।
कुछ नहीं देखते हैं अभी तो ऑफिस आई हूँ- मेरे उखड़े मूड को देख कर हिना अपनी सीट पर
और अग्रवाल साहब अपनी जुबान पर ताला लगाकर बैठ गए।
कुछ देर बाद ऑफिस का चपरासी शंकर आया- मैडम बड़े साहब बुला रहे हैं आपको।
उफ्फ, तुम्हारे ये बड़े साहब की गर्दन मरोड़ दूँगी...फिर कहना मैडम स्वर्ग वासी बड़े साहब की आत्मा बुला रही है आपको- मैं बड़बड़ा रही थी और शंकर मंद मंद मुस्कुरा रहा था।
तीन साल के हमारे शीत युद्ध का वह भी साक्षी था, चीजों को बारीकी से समझता था।
अच्छा शंकर एक बात बता, तुझे ये शुक्ला सही में 'बड़ा साहब' लगता है- मैंने पूछा।
नहीं मैडम एक नंबर का हरामी है, लेकिन क्या करें रोटी-पानी का सवाल नहीं होता तो ऑफिस
में ही धो देता किसी दिन उसेशंकर ने मुझे कुछ हौसला दिया।
मैं मन ही मन खुश हो गई कि चलो मेरा सपोर्ट ग्रुप कुछ और बड़ा हो गया। मैं शुक्ला के
केबिन में पहुँची।
फरमाइए- मैंने शुक्ला को घूरते हुये कहा।
कामिनी तुम चाहती क्या हो, अपनी हरकतों से बाज आ जाओ वरना मुझसे बुरा कोई न होगा-
शुक्ला घबराया हुआ सा था।
मुझे शुक्ला की बात समझ में नहीं आई कि वो क्या कह रहा है और क्यों, लेकिन उसकी
घबराहट देख मजा आ रहा था। मैंने कहा- हरकतें तो आपकी भी कम नहीं है सर, आप भी तीन
साल से कहाँ बाज आ रहे हैं... अभी तक मुझे चाय पिलाने की जिद ठाने बैठे हैं।
देखो अभी मेरी पत्नी पाँच-दस मिनट में ऑफिस पहुँचने वाली है,,, मुझे और अपने बारे में जो
घटिया बातें तुमने मेरी पत्नी को फोन पर बताया है उसकी तस्दीक करने। भगवान के लिये मेरा
घर बर्बाद मत करो, मैंने तो तुम्हारे साथ कुछ बुरा नहीं किया, प्लीज मैं तुम्हारे आगे हाथ....
आगे की बातें उसके गले में घुट कर रह गई।
शुक्ला की मिमियाहट सुनकर बात समझ में आ गई लेकिन ये समझ नहीं आया कि उसकी
पत्नी को फोन किया किसने, बहरहाल मेरे होठों पर हँसी खिल गई...अब बाजी मेरे हाथों में थी।
मैंने विजयी भाव में कहा- सर आप बहुत कमीने हैं, लेकिन जब आप मेरे आगे हाथ जोड़ रहे हैं
तो मैं आपकी पिछली सारी गलतियाँ माफ कर देती हूँ।
शुक्ला आश्वस्त हो गया। मैं भी उसके सामने वाली सीट पर बैठ गई। कुछ पल की खामोशी के
बाद मैंने कहा- सर एक-एक कप चाय हो जाये, तीन सालों से आपके साथ चाय पी नहीं... आज
पी ही लेती हूँ..
, , नहीं.. मैं.. मैं... चाय नहीं पीता... मेरा मतलब अभी नहीं.... ’ - शुक्ला के माथे पर पसीना
छलछला आया था।
बाहर हीना और अग्रवाल साहब के ठहाकों की सम्मिलित आवाजें आ रही थीं...