सोनी किशोर सिंह
ऑफिस में घुसते ही सीधे निगाह पड़ती है उस दढ़ियल पर। देखते ही तन-बदन में आग लग
जाती है लेकिन नजर मिलते ही मुस्कुरा कर अभिवादन में हल्का सा सिर झुका लेना आदत
सी
बन गई है। आदत भी पिछले तीन सालों से एक सी। मुझे ये भी पता होता है कि मेरे ऐसा
करने से वो चिढ़ जाता है लेकिन मैं ऐसा जरूर करती हूँ क्योंकि उसके चिढ़ने से मुझे
खुशी
मिलती है। मैं चाहती हूँ कि वो मुझसे चिढ़ कर मेरी तरह ही चिड़चिड़ा बन जाये या
फिर मेरी
इस हरकत से इतना जले कि लोग उसे जलकुकड़ा नाम दे दें। लेकिन मेरी सोच धरी रह जाती
और ऐसा कुछ भी नहीं होता। मैं मुस्कुराकर अभिवादन करती और वो पूरी बेशर्मी से उसे
स्वीकार करता, बदले में वो भी एक
छिछोरी हँसी उछालता। उसके ऐसा करने पर लगता कि
दिनभर में जितना खा-पीकर खून बनाती हूँ उसकी एक झलक
देखते ही घृणा से सूख जाता है।
तभी तो सब चिड़चिड़ी कहते हैं और मैं हो भी गई हूँ जिद्दी, चिड़चिड़ी, खडूस और न जाने क्या
क्या। आप सोच रहे होंगे मैं किसकी बुराई कर रही हूँ, उसकी या खुद की। दरअसल हम
दोनों ही
अपनी-अपनी जगह या तो बहुत अच्छे हैं या फिर बहुत काईंया, बद्तमीज। न वो सुधरने के
लिए तैयार और न ही मैं। खैर वो तो मेरा बॉस है वो क्यों सुधरेगा, तब? तब लोग मुझे ही
सुधरने की हिदायत देते हैं और मैं कहती हूँ कि जब वो नहीं सुधर सकता तो मैं क्यों
सुधरूँ।
क्या बिगड़ने का ठेका इसी बुड्ढ़े ने ले रखा है मैं क्यों नहीं बिगड़ सकती? यही सोच-सोचकर
मैंने बिगड़ना शुरू किया और मेरी बिगड़ने की रफ्तार इतनी तेज रही कि तीन साल होते-होते मैं
उस खूसट से ज्यादा बिगड़ैल हो गई। इतनी बिगड़ैल की कोई कमेंट पास करता तो मैं उसकी
सात पुश्तों को श्रद्धांजलि दे देती और कोई लड़कियों को ऊँच-नीच समझाने का दिखावा करता तो
उसके पौरुष को प्रदर्शित करने वाले निहायत निजी अंगों को ऐसे-ऐसे उपमान देती कि सामने
वाले की घिग्घी बँध जाती। कुल मिलाकर मैं अपने बलबूते जितना हो सकता था बिगड़ चुकी
थी
और मेरी लगातार कोशिश यही रहती कि अगर निहायत बिगड़ैल होने या बनने के लिये कुछ
योग्यताएँ बाकी रह गई हैं तो उनमें भी निपुणता हासिल कर लूँ क्योंकि मुझे मालूम
था कि देर-
सबेर उस खूसट, कुरुप, बेशर्म
बुड्ढ़े से मेरी भिड़न्त होगी ही और जब ऐसा हो तो मेरी हार नहीं
होनी चाहिए। अब तो मुझे ऐसा लगने लगा है कि मैं दो-दो हाथ करने के लिये तैयार हूँ उससे।
बस एक मौका मिल जाये...।
बहुत देर से टकटकी लगाये देख रहा है, साला...
एक भद्दी सी गाली निकली मेरे मुँह से। सामने
बैठे अग्रवाल साहब ने चश्मे को ठीक करते हुए मेरी तरफ देखा।
‘किसे कह रही हैं मैडम, बड़े साहब को’- अग्रवाल साहब ने प्रश्नवाचक नजरों से मेरी तरफ देखा तो मैंने
जानबूझकर दाँत दिखाते हुये कहा- ‘अग्रवाल साहब, पचपन
के तो होंगे ही, कमीनेपंथी में
दूर-दूर तक आपके बराबर कोई नहीं। जान-बूझकर अनजान बनते हो, अगर नहीं समझे तो मेरी
बला से, साला शुक्ला नहीं तो फिर आपका बाप,,,,।‘
अग्रवाल साहब मेरे इस आक्रमण को खींसे निपोरते हुए झेल गये- ‘क्या मैडम आप भी नाराज
हो जाती हैं, छोड़िये न इनकी तो आदत है।‘
अग्रवाल भी कम खूसट नहीं था, बस वो जरा सा डरपोक था इसलिए बच-बचाकर ही रहने में
अपनी भलाई समझता था।
ऐसा भी नहीं था कि मैं 'बड़े साहब' यानि की अभिलाष शुक्ला को पहली बार कुछ कह रही
थी मेरी तो हर रोज की आदत थी। शुक्ला को दिन भर में पचास-साठ चुनिंदा गालियाँ देने
की, लेकिन अग्रवाल साहब
जब भी सुनते तो पूछते- ‘किसे कह रही हैं मैडम, बड़े साहब को’ और फिर मैं शुक्ला को पीठ पीछे गाली देने की अपनी सारी बेबसी बिना किसी हिचक के
अग्रवाल साहब पर उतार देती।
अब सबको ये जानने का भी कौतुहल होगा कि आखिर अग्रवाल साहब भी कमीनेपंथी के महारथी
हैं तो फिर मैं शुक्ला के पीछे हाथ धोकर क्यों पड़ी हूँ। तो प्रिय पाठकों आपको
जरा फ्लैशबैक में
लेकर चलती हूँ।
मैं यानि कामिनी खन्ना चंडीगढ़ की बहुत सीधी-सादी लड़की थी। तीन साल पहले बेहतर
नौकरी
की चाह में दिल्ली आई और एक विज्ञापन एजेंसी में नौकरी करने लगी। शुरुआती दो महीने
बड़े
आराम से गुजरे, ऐसा लगा कि जि़न्दगी चल पड़ी है, लेकिन वो कहावत है न कि सर मुड़ाते ही
ओले पड़े ठीक वैसे ही दो महीने के बाद मेरे बॉस का तबादला हो गया और उसकी जगह पर
अभिलाष शुक्ला आ गये। उनको ऑफिस के सभी कर्मचारियों से परिचय करवाया जा रहा था।
जब मेरा परिचय कराया गया तो उन्होंने मुझे केबिन में आने को कहा। मैं जब उनके केबिन
में
पहुँची तो उन्होंने मुझे चाय ऑफर की। मेरे मना करने पर अपनी दायीं आँख दबाते हुये
कहा-
‘कामिनी जी, चाय तो आपको पीनी ही पड़ेगी,
मर्जी से पियें तो अच्छा, नहीं तो हम जबर्दस्ती
पिलायेंगे, आखिर हम आपके बॉस हैं।‘
मुझे काटो तो खून नहीं। डर के मारे कनपट्टियाँ सुलग गई। सर चकराने लगा। मैं जल्दी
से बिना
कुछ बोले उठकर उनके केबिन से बाहर आई। बाहर निकलने पर सबकी सवालिया नजरें कुछ
पूछ रही थीं। शायद ये कि अंदर क्या हुआ और मेरी नजरें झुकी थीं, गोया मैंने कोई
अपराध कर रखा हो। मैं उस वक्त फूट-फूट
कर रोना चाह रही थी लेकिन किसी तरह अपनी पलकों को
आँसुओं का बोझ उठाने की सख्त हिदायत दे रखी थी। उस वक्त मुझे हिना याद आ रही थी
ताकि उसके कंधे पर सर रखकर रोती और वो मुझे हौले-हौले थपकियाँ देकर कहती- अरे क्या
कामिनी बस इतनी सी बात पर ये कीमती आँसू बर्बाद कर रही है, तुझे नहीं पीनी चाय तो मत
पी, मैं जाकर पी लेती हूँ तेरे बदले। फिर मुझे चिकोटी काट कर कहती-
क्यों ठीक है न, अगर
चाय मैं पी लूँ तो... हिना ऑफिस में मेरी सबसे अच्छी
दोस्त थी, लेकिन उस दिन वो छुट्टी पर
थी और मैं खुद को बहुत अकेला महसूस कर रही थी। मैंने झूठ बोल दिया कि पेंडिंग काम
को लेकर सर नाराज हो रहे थे। हालाँकि इस बात को न मैं सहज तरीके से बोल पायी और
न
ही मेरे सहकर्मियों ने सहजता से लिया। सब मुझे ऐसे घूर रहे थे जैसे मैं केबिन से
कोई अपराध
करके निकली हूँ।
उस दिन सबसे पहले अग्रवाल साहब ने ही चुटकी ली थी- क्या मैडम, आप परेशान दिख रही हैं,
सर ने चाय की जगह डाँट पिला दी क्या? मैं तब तक कुछ संयत
हो गई थी। लेकिन
शुक्ला का खौफ़ या फिर मेरी बिगड़ी हुई मनोदशा का असर कहिये कि पहली बार मेरे मुँह
से
गाली निकली- ‘अग्रवाल के बच्चे तुझे बहुत मजा आ रहा है, जा अपनी बीबी को बुड्ढे के केबिन
में ले जाकर चाय पिला...'। न जाने मेरे मुँह से क्या-क्या अनाप-शनाप निकलता गया और बेचारे
अग्रवाल साहब चुपचाप सुनते गये। कुछ देर के बाद जब मुझे अहसास हुआ तो मैंने महसूस
किया कि अग्रवाल साहब को मैं क्यों इतनी खरी-खोटी सुना रही हूँ। मेरी आँखें भीग गई और
मैंने माफी माँगने के लिए अग्रवाल साहब की तरफ देखा तो उन्होंने बड़े ही अपनत्व
से कहा-
कोई बात नहीं कामिनी मैडम, होता है... मैं समझ
सकता हूँ आपकी हालत। लेकिन हम लोग कर
भी क्या सकते हैं, आप खुद हीं हैंडल कीजिए।
अगले दिन ऑफिस जाने का मन नहीं हो रहा था लेकिन नौकरी तो करनी ही थी इतनी जल्दी
हार कैसे मानती। नई नौकरी भी नहीं थी कि इस्तीफा देकर चली जाती। तो मैंने सोचा
क्यों न
इस बात को भूल कर नये सिरे से काम शुरू किया जाये। यही सोच मैं ऑफिस पहुँची। पहुँचते
ही शीशे के केबिन से अभिलाष शुक्ला का थोबड़ा दिख गया। उसने एक छिछोरी हँसी उछाली
मेरी तरफ और मैंने शिष्टाचारवश हल्का सा सर झुकाकर अभिवादन चस्पा कर दिया।
मैं अपनी सीट पर बैठकर अभी सोच ही रही थी कि आगे क्या करूँ कि फोन की घंटी बजी..
किर्र... किर्र.. किर्र.. मैंने अनमने ढ़ँग से उठाया- हैलो,
‘कामिनी, केबिन में आओ’- शुक्ला का सपाट सा स्वर उभरा।
मैं फटाफट अंदर गई, ये सोचते हुये कि कल के लिए शुक्ला जी से माफी माँग कर बात
यहीं
खत्म कर दूँ।
‘ मे आय कम इन सर’- मैंने पूरे अदब से
पूछा।
‘आ जाओ कामिनी पूछने की क्या जरुरत है’- शुक्ला साहब बहुत मुलायमियत से बोल रहे थे
लेकिन उनके मन की गंदगी साफ झलक रही थी।
“जी सर, कहिये”
“कहना क्या है कामिनी, बस चाय पीना चाह रहा था तुम्हारे
साथ, कल तो तुमने पी नहीं” -
टेबल पर रखा पेपर वेट अपनी अंगुलियों से नचाते हुये शुक्ला जी बोल रहे थे।
“सर, मैं चाय नहीं पीती”- मुझे उस वक्त यही जवाब सूझा।
“कोई बात नहीं, मेरे साथ एक-दो कप पीने में
बुराई नहीं”- शुक्ला जी जिद पर थे।
“ठीक है सर”- मैंने हामी भर दी।
“चीनी कितनी लेंगी ?”
इससे पहले मैं कुछ बोलूँ उन्होंने जल्दी से कहा- “अरे, मैं भी क्या सवाल कर रहा हूँ आप
तो
खुद इतनी मीठी हैं आपको चीनी की क्या जरुरत?.. क्यों सही कहा न मैंने”- शुक्ला जी बेशर्मी से मुस्कुराये।
“ऐसा नहीं है सर, मैं चीनी लेती हूँ”- मैंने सुलह की आखिरी कोशिश की।
“तो मेरे साथ चाय पीने के लिए तैयार हैं आप?”- कहते हुये शुक्ला जी ने चाय की प्याली मेरी
तरफ बढ़ायी। चाय देते वक्त जान-बूझकर मेरा हाथ छूने की कोशिश की और हड़बड़ी में
मेरे हाथ से प्याली गिर गई।
‘ओह नो मिस कामिनी, आपने तो मजा किरकिरा कर दिया’ - शुक्ला जी ने मेरी हड़बड़ाहट को
और बढ़ा दिया।
‘ऐसा लगता है कामिनी कि ऑफिस की चाय आपको पसंद नहीं है, कहीं बाहर चलें किसी अच्छी जगह...’ - साथ ही शुक्ला जी ने एक आँख दबाई।
‘नहीं सर ऐसी कोई बात नहीं है, वो जल्दबाजी में मेरे हाथ से चाय गिर गई, आई एम रियली
सॉरी सर’ - मेरे माथे पर पसीना छलछला आया।
‘आप इतना डरती क्यों हैं ?’ - शुक्ला जी ने अपना हाथ अचानक मेरे
बायें हाथ पर रख दिया और ठीक उसी वक्त यंत्रवत मेरा दायां हाथ उनके गालों को छूता हुआ
निशान छोड़ गया।
‘हाऊ डेयर यू, तुमने मुझे थप्पड़ मारा....
मैं... मैं... तुम्हे...’ - शुक्ला अपने गालों को सहला रहा
था।
मैं घबरा गई, मुझे खुद इस बात का इल्म न था कि
मेरा हाथ मेरे बॉस पर उठ जायेगा। मैंने
माफी माँगते हुये कहा- ‘सॉरी सर गलती हो गई।‘
शुक्ला पूरी ताकत से चिल्लाया- ‘गेट आऊट।’
अगले ही पल मुझे लगा कि यह इंसान न माफी के लायक है न इज्जत के। इससे सिर्फ और
सिर्फ नफरत की जा सकती है। केबिन से निकलते वक्त मैंने अपनी पूरी हिम्मत जुटा कर
धीरे
से कहा था- ‘सर, मैं यहाँ इम्प्लॉइ हूँ आपकी गुलाम
नहीं। आईंदा ऐसी घटिया हरकत करने की
कोशिश मत कीजिएगा, नहीं तो वो हाल करूँगी कि जिन्दगी
में फिर कभी किसी को चाय ऑफर
करने लायक नहीं रहेंगे।’
वह गुर्राया- ‘तुम्हे मैं छोड़ूँगा नहीं, नाऊ गेट लॉस्ट।’
बस उस दिन से अभिलाष शुक्ला और मेरी अघोषित जंग शुरू हो गई और अग्रवाल साहब मेरी
खुन्नस के शिकार बनते चले गये।
अब फ्लैश बैक से बाहर निकलिये। इस घटना को जानकर कुछ लोगों की सहानुभूति कथानायिका
यानि की कामिनी से होगी और कुछ लोगों की अभिलाष शुक्ला के साथ। तो मुझसे
सहानुभूति न रखने वालों के भी अपने वाजिब तर्क होंगे कि आखिर बेचारा एक प्याली
चाय ही
तो पिलाना चाह रहा था, इतना भाव खाने की क्या जरूरत थी
इस कामिनी को... खैर सोचने की
स्वतंत्रता है। मैं आगे बढ़ती हूँ अपनी कहानी की तरफ...इन तीन सालों में कुछ और परिवर्तन
हुआ था... जैसे हिना और अभिलाष शुक्ला में
भी छत्तीस का आँकड़ा हो गया था... मैं अग्रवाल
साहब से थोड़ा कम चिढ़ने लगी थी, अभिलाष
शुक्ला मुझे हराने की खातिर रोज-रोज
परेशान करने के नये हथकंडे अपना रहा था आदि, आदि। खैर फैसले की घड़ी आ ही गई थी उस
रोज। फैसला भी ऐसा कि न मुझे पता था न अभिलाष शुक्ला को। बस तकदीर ने इस कहानी
का फैसला उसी दिन होने पर अपनी मुहर लगा दी थी।
‘गुड मॉर्निग’ - हिना ऑफिस आते ही मेरी तरफ मुखातिब
होकर चहकी थी।
मैंने भी एक फीकी मुस्कान देते हुए कहा- ‘क्या बात है आज ऑफिस लेट पहुँची तुम।’
‘क्या करें डियर, रास्ते में रुक कर चाय पी रही थी।
कमबख्त ये चाय चीज ही ऐसी है कि एक
बार लत लग गई तो छूटती नहीं’- वो शरारत के मूड में थी।
उसकी खुशदिली देख कर अग्रवाल साहब ने भी बहती गंगा में हाथ धोने की कोशिश की- ‘अरे
वाह हिना जी, अकेले-अकेले
चाय पी ली हमें भी बुला लेतीं, तो मजा आ जाता।’
‘अब मजे की उम्र नहीं रही आपकी, दाढ़ी-मूछों पर सफेदी छा गई है लेकिन चाय पीने की
तलब कम नहीं हुई है’ - हिना ने तपाक से तीर छोड़ा।
‘आपलोगों से तो मजाक भी नहीं सहा जाता’ - अग्रवाल
साहब खुन्नस खा गये।
‘मैं भी तो मजाक ही कर रही हूँ जनाब, कौन
सा पत्थर मार रही हूँ, आप तो हमारे एंग्री यंगमैन
हो’ - हिना की खिलखिलाहट देख मैं और अग्रवाल
साहब दोनों मुस्कुराने लगे।
‘तो कामिनी मैडम आज क्या प्लानिंग है आपकी’ - अग्रवाल
साहब का इशारा समझते देर न
लगी मुझे।
‘कुछ नहीं देखते हैं अभी तो ऑफिस आई हूँ’ - मेरे
उखड़े मूड को देख कर हिना अपनी सीट पर
और अग्रवाल साहब अपनी जुबान पर ताला लगाकर बैठ गए।
‘कुछ देर बाद ऑफिस का चपरासी शंकर आया’ - मैडम
बड़े साहब बुला रहे हैं आपको।
‘उफ्फ, तुम्हारे ये बड़े साहब की गर्दन
मरोड़ दूँगी...फिर कहना मैडम स्वर्ग वासी बड़े साहब की आत्मा
बुला रही है आपको’ - मैं बड़बड़ा रही थी और शंकर मंद
मंद मुस्कुरा रहा था।
तीन साल के हमारे शीत युद्ध का वह भी साक्षी था, चीजों को बारीकी से समझता था।
‘अच्छा शंकर एक बात बता, तुझे ये शुक्ला सही में
'बड़ा साहब' लगता है’ - मैंने पूछा।
‘नहीं मैडम एक नंबर का हरामी है, लेकिन क्या करें रोटी-पानी का सवाल नहीं होता तो ऑफिस
में ही धो देता किसी दिन उसे’ – शंकर ने मुझे कुछ हौसला दिया।
मैं मन ही मन खुश हो गई कि चलो मेरा सपोर्ट ग्रुप कुछ और बड़ा हो गया। मैं शुक्ला
के
केबिन में पहुँची।
‘फरमाइए’ - मैंने शुक्ला को घूरते हुये कहा।
‘कामिनी तुम चाहती क्या हो, अपनी हरकतों से
बाज आ जाओ वरना मुझसे बुरा कोई न होगा’ -
शुक्ला घबराया हुआ सा था।
मुझे शुक्ला की बात समझ में नहीं आई कि वो क्या कह रहा है और क्यों, लेकिन उसकी
घबराहट देख मजा आ रहा था। मैंने कहा- ‘हरकतें तो आपकी भी कम नहीं है सर, आप भी तीन
साल से कहाँ बाज आ रहे हैं... अभी तक मुझे
चाय पिलाने की जिद ठाने बैठे हैं।’
‘देखो अभी मेरी पत्नी पाँच-दस मिनट में ऑफिस
पहुँचने वाली है,,, मुझे और अपने बारे में जो
घटिया बातें तुमने मेरी पत्नी को फोन पर बताया है उसकी तस्दीक करने। भगवान के लिये
मेरा
घर बर्बाद मत करो, मैंने तो तुम्हारे साथ कुछ बुरा
नहीं किया, प्लीज मैं तुम्हारे आगे हाथ.... ’
आगे की बातें उसके गले में घुट कर रह गई।
शुक्ला की मिमियाहट सुनकर बात समझ में आ गई लेकिन ये समझ नहीं आया कि उसकी
पत्नी को फोन किया किसने, बहरहाल मेरे होठों
पर हँसी खिल गई...अब बाजी मेरे हाथों में थी।
मैंने विजयी भाव में कहा- ‘सर आप बहुत कमीने हैं, लेकिन
जब आप मेरे आगे हाथ जोड़ रहे हैं
तो मैं आपकी पिछली सारी गलतियाँ माफ कर देती हूँ।’
शुक्ला आश्वस्त हो गया। मैं भी उसके सामने वाली सीट पर बैठ गई। कुछ पल की खामोशी
के
बाद मैंने कहा- ‘सर एक-एक कप चाय हो जाये, तीन सालों से
आपके साथ चाय पी नहीं... आज
पी ही लेती हूँ..।’
‘न, न, नहीं..
मैं.. मैं... चाय नहीं पीता... मेरा मतलब अभी नहीं.... ’ - शुक्ला के माथे पर पसीना
छलछला आया था।
बाहर हीना और अग्रवाल
साहब के ठहाकों की सम्मिलित आवाजें आ रही थीं...।