Saturday, 22 March 2014

उम्र क़ैद काफी नहीं



सोनी किशोर सिंह
मुंबई में शक्ति मिल गैंगरेप के मामले में चार बलात्कारियों को उम्र कैद की सजा दी गई। पिछले साल हुये इस मामले में इतनी त्वरित कानूनी कार्रवाई और सज़ा निश्चय ही स्वागत योग्य है। लेकिन इक्का-दुक्का मामले में फैसलों को छोड़ दें तो अभी हज़ारों ऐसे जघन्य बलात्कार के मामले सालों-साल से लंबित पड़े हैं जिसमें क्रूर तरीके से बलात्कार के बाद लड़की की हत्या कर दी गई या फिर उसे गहरा शारीरिक-मानसिक आघात देकर छोड़ दिया गया। ऐसे मामलों में पीड़ित या मृत लड़की ही नहीं बल्कि उसका परिवार भी अत्यंत कठिन मानसिक संत्रास के दौर से गुजरता है। बलात्कार के सभी मामलों को त्वरित अदालत में निबटाकर अपराधियों को सख्त सज़ा देना कानून और प्रशासन का काम है लेकिन हमारी निकम्मी सरकारें और भ्रष्ट व्यवस्था तब तक मदहोश रहती है जबतक आँच उनके घरों तक नहीं पहुँचती।
जरा सोचिये जब एक माँ की आँखें अपनी बच्ची की वापसी के इंतज़ार में पथरा कर रह जाती हैं, एक पिता अपने सपनों को अपनी बेटी में पूरा होते देखे बिना दम तोड़ देता है, एक भाई अपनी सूनी कलाई लिये हर साल आने वाले राखी के त्यौहार पर रो पड़ता है, जब एक बहन अपने दिल की बात बाँटे बिना अपनी हमउम्र बहन की बची-खुची यादों को समेटती रहती है तो हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उस घर की दीवारों में कितना दर्द तैरता होगा। काश ये बातें महज़ शब्दों का जाल होतीं, लेकिन ये सच्चाई है ऐसे परिवारों की जिन्होंने अपनी बेटियों को खो दिया है। कोई प्रतिभाशाली छात्रा, कोई आज्ञाकारी बेटी, कोई चुलबुली बहन बलात्कारियों की भेंट चढ़ती रहती है लेकिन पुलिस में एफआईआर तक दर्ज नहीं होती।
ये दुर्दशा किसी एक अकेले परिवार की नहीं है बल्कि तमाम उन परिवारों की है जिनकी रिपोर्ट पुलिस थाने में लिखी ही नहीं जाती या अगर लिख ली जाती है तो आरोपी को पकड़ना तो दूर उल्टे पैसे लेकर पीड़ित परिवार को ही परेशान किया जाता है। हमारे देश में बलात्कार की अधिकांश वारदातें कहीं किसी पुलिस रिकार्ड में नहीं मिलती। इन वारदातों के निशान लड़की के शरीर और उसके परिवार के मन पर दिखते हैं।    

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