Wednesday, 3 September 2014

उम्र नहीं बाधा- डॉ. सुशील मदान



सोनी किशोर सिंह

डॉ. सुशील मदान
जब जिन्दगी अपने आखिरी पड़ाव पर हो और उत्साह बालपन की ठिठोलियों में मशगूल तो जीवन का आनंद कई गुणा बढ़ जाता है। धीरे-धीरे बुढ़ापा को झेलने की मजबूरी में कुढ़ते-चिढ़ते वृद्धों में अगर बाल सुलभ जीवन संचार हो जाये तो जीवन का अंत बहुत सुखमय होता है। जो बुजुर्ग जीवन के तमाम झंझावातों को हँसी खुशी झेल लेते हैं वो बुढ़ापे में भले ही शरीर से लाचार हो जायें, लेकिन अगर उनका मन मस्तिष्क सक्रिय और समाजोपयोगी बना रहे तो वो अपनी वृद्धावस्था को भी उपयोगी बना लेते हैं।
जब जीवन उत्साह से लबालब हो तो उम्र कोई बंदिश नहीं लगा पाता। तमाम शारीरिक, मानसिक व्याधियों पर इंसान विजय प्राप्त कर लेता है। बुढ़ापे को अभिशाप समझने वाले बुजुर्ग अगर अपनी खूबियों को पहचानकर उन्हें विकसित और संवर्धित करते रहे तो जीवन के अंत में भी वो समाज और लोगों के लिये बहुत महत्वपूर्ण रहते हैं। जिन्दगी को इसी जिन्दादिली से जीते हुये उम्र के 78वें वर्ष में भी डॉ. सुशील मदान बेहद सरल, सजग, चुस्त और आशावादी हैं। उनकी व्यस्त दिनचर्या किसी युवा को भी सोचने पर मजबूर कर देगी कि जीवन का प्रत्येक पल कैसे उपयोगी बनाया जाये। पेशे से बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सुशील मदान वृद्धावस्था में किसी पर बोझ नहीं है बल्कि वो उन तमाम असहायों की मुफ्त चिकित्सा और भोजन आदि की व्यवस्था करती हैं जो उनके पास जाकर अपनी तकलीफ बताते हैं।
प्रख्यात चिकित्सक और कर्मठ समाजसेवी
डॉ. सुशील मदान वो शख्सियत हैं जिन्होंने पिछले कई दशकों तक नई दिल्ली और कोलकाता के अस्पताल में बच्चों का इलाज किया साथ ही मेडिकल स्टूडेंट को पढ़ाया भी। प्रो. डॉ. मदान बच्चों के स्वास्थ्य और उनके खान पान को लेकर बहुत सजग हैं। इस वजह से उन्होंने एक किताब भी लिखी है। ग्रोइंग अप नाम की ये किताब स्कूल जानेवाले उन तमाम किशोर बच्चों के स्वास्थ्य संवर्धन के लिये उपयोगी है जो अपनी बढ़ती उम्र में कई प्रकार की शारीरिक, मानसिक, पोषकीय, संवेगात्मक और चिकित्सकीय समस्याओं से जूझते हैं। यह किताब शिक्षकों, माता-पिता और बच्चों तीनों के लिये समान रूप से फायदेमंद है।  
विभाजन का दर्द भी झेला
डॉ. सुशील मदान मूल रूप से सरगोदा (अब पाकिस्तान में) की हैं। जब बँटवारे के समय जगह-जगह भीषण दंगे होने लगे तो डॉ. मदान के माता-पिता ने यह निर्णय लिया कि भारत में जाकर नये जीवन की शुरूआत की जाये। किसी तरह से उनका परिवार जान बचाकर हिन्दुस्तान आया। उनके पिताजी अनाज के व्यापारी थे। पार्टीशन के बाद दिल्ली के करोल बाग में उनलोगों को रहने की जगह मिली लेकिन कारोबार पाकिस्तान में छूट गया था। सबकुछ नये तरीके से व्यवस्थित करना था। बहुत कठिन काम था यह, लेकिन डॉ सुशील मदान के माता-पिता ने हिम्मत नहीं हारी और फिर से शुरूआत की। सुशील मदान कहती हैं कि मेरे माता-पिता बहुत परिश्रमी थे। उन्होंने जीवन को अपनी शर्तों और अपने अनुशासन में बाँधा और मैं भी उनका अनुसरण करती आई हूँ।
दिल्ली की टॉपर
डॉ. सुशील मदान बचपन से कुशाग्र बुद्धि की थीं। वो कहतीं हैं कि विभाजन के बाद दिल्ली तो किसी तरह से पहुँच कर एक छत नसीब हो गई थी, लेकिन इन सबके बीच मेरी पढ़ाई छूट गई। काफी सोच-विचार कर दिल्ली में ही किसी तरह मेरा एडमिशन हुआ। मैं सरगोदा में छठी में थी इसलिये दिल्ली में सातवीं में दाखिला चाहती थी। लेकिन जब स्कूल वालों ने सातवीं के बजाये नवीं में दाखिला दिया तो मजबूरी में उनको एडमीशन लेना पड़ा। तीन महीने बाद ही परीक्षा हुई और दिल्ली में डॉ. सुशील मदान ने टॉप किया। स्कूल के प्रिंसिपल ने बधाई देते हुये कई जगहों पर उनका पोस्टर लगाया। हालाँकि इस बात से उनके पिताजी को परेशानी हुई और उन्होंने कहा कि मेरी बच्ची की तस्वीर को गली मुहल्लों में इस तरह से नहीं लगाना चाहिए। इसके बाद डॉ. मदान की शिक्षा यात्रा आगे बढ़ती गई। सन् 1958 में उन्होंने लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की डिग्री हासिल की।
कदम-कदम पर मिला सहयोग
12 अक्टूबर 1963 को डॉ. सुशील मदान की शादी सुरेन्द्र कुमार मदान से हुई। शादी के बाद वो अपने पति सुरेन्द्र मदान के साथ दिल्ली से कोलकाता चली गई। कोलकाता में उन्होंने एकमात्र चाइल्ड हॉस्पीटल और मेडिकल कॉलेज इन्स्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हर्ट में नौकरी शुरू कर दीं। यहाँ डॉ. मदान पूरी शिद्दत से बच्चों का इलाज तो करती हीं थी साथ ही मेडिकल स्टूडेंट को चाइल्ड हर्ट के बारे में पढ़ाती भी थीं। साथ ही साथ वो ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर वहाँ की स्वास्थ्य समस्याओं से रुबरू होकर लोगों को स्वास्थ्य सुविधायें भी मुहैया करवाती थीं। इन सब कार्यों में उनके जीवन साथी सुरेन्द्र कुमार मदान का हमेशा सहयोग बना रहा। डॉ. मदान कहती हैं कि आगे बढ़ने और सकारात्मकता बढ़ाने में परिवार का सहयोग आवश्यक है और उन्हें पति और बच्चों का भरपूर सहयोग मिला जिससे वो अपने कर्म-पथ पर आगे बढ़ती रहीं।
बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित
डॉ. सुशील मदान कहती हैं कि बच्चों में डायरिया सबसे सामान्य बीमारी है। दूषित पानी की वजह से होने वाली ये बीमारी बच्चों में सबसे ज्यादा होती है। इसके अलावा ब्रोंकाइटिस, न्यूमोनिया वगैरह बीमारियाँ होती हैं। हालाँकि उन्हें खुशी है कि अपने देश में पोलियो का उन्मूलन हो गया है।
बुढापे को दिया मात
डॉ. सुशील मदान आज भी रोजाना खुद खाना बनाती हैं, मॉर्निंग वॉक करती हैं, कई राष्ट्रीय-अतर्राष्ट्रीय जर्नल पढ़ कर स्वास्थ्य समस्याओं का विश्लेषण करती हैं। लेकिन इन सबके साथ जो सबसे महत्वपूर्ण काम है वो है मरीजों का निःशुल्क इलाज। डॉ. मदान की सेवा भावना इतनी प्रबल है कि कई बार वो मरीजों की दवाईयाँ और खाने का इंतजाम भी करती हैं।
खुशहाल दंपत्ति
एक ओर आज जहाँ एकल परिवार भी टूट की कगार पर है, वहाँ पर मदान दंपत्ति का जीवन एक मिसाल है। दोनों ने एक दूसरे को बखूबी समझा है। अगर कोई नाराज हो जाता है तो उसकी नाराजगी को दूसरा सम्मान करता है। एक-दूसरे को सम्मानित दृष्टि से देखने की कला के कारण ही आज मदान दंपत्ति इतनी खुशहाल हैं।
सूत्र वाक्य
डॉ. सुशील मदान कहती हैं कि लाइफ इज ब्यूटीफुल बट लाइफ इज स्ट्रगल। आपको लगातार बाधायें पार करनी होगी। आपके पास इच्छा शक्ति होनी चाहिए इन तमाम परेशानियों से छुटकारा पाकर जिन्दगी जीने का।
 आज भी याद है वो कत्लेआमः सुरेन्द्र कुमार मदान
उस वक्त हमलोग लाहौर में थे। मेरे पिताजी ब्रिटिश आर्मी में डॉक्टर थे और सिंगापुर हॉस्पीटल में उनकी तैनाती थी। सन् 1943-44 में वहाँ उनकी मौत हो गई लेकिन ब्रिटिश सरकार ने हमलोगों को कोई सूचना नहीं दी। हमलोग इस सदमे से अभी उबरे भी नहीं थे कि बँटवारे की घोषणा हो गई और रक्तेआम शुरू हो गया। परिवार और रिश्तेदार के ढ़ेर सारे लोग मारे गये। मैं और मेरी माँ किसी तरह से बचते-बचाते हिन्दुस्तान पहुँचे। अमृतसर पहुँचने का वो एक घंटे का रास्ता 44 घंटे में खत्म हुआ। अमृतसर पहुँचने तक ट्रेन के अधिकांश मुसाफिर कत्ल कर दिये गये थे। पर मैं अपनी माँ के साथ किसी तरह सुरक्षित पहुँच गया था। 14 साल की उम्र रही होगी मेरी। इसलिये वो मौत का सफर हमेशा जेहन में बैठा रहा। मुझे याद है अमृतसर में कुछ दिन रहने के बाद हमलोग अम्बाला पहुँचे। वहाँ हमारी एक आंटी थी। उनके पास एक रूम था जहाँ कई रिश्तेदार रहते थे। वहाँ रोड के किनारे एक छोटा सा बल्ब लगा था उसी की रोशनी में ढ़ेर सारे बच्चे पढ़ते थे। पानी के एक नलके के पास लम्बी लाइन लगी रहती थी।

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