Sunday, 10 April 2011

बांग्लादेशी शरणार्थियों की बढ़ती गुंडागर्दी

कुछ दिनों पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक खबर आई थी कि माना बस्ती में दीवार पर लिखे गए आपत्तिजनक नारों से बिफरे शरणार्थी बांग्लादेशियों ने पुलिस थाने का घेराव किया और जमकर हंगामा किया। बाद में पुलिस के हस्तक्षेप से मामला शांत हुआ। ये महज एक घटना भर नहीं है बल्कि इसके निहितार्थ को समझने की जरूरत है।
काफी पहले से समाजसेवी और पुलिस अधिकारी इस बात को कहते आ रहे हैं कि बांग्लादेशी शरणार्थियों की बढ़ती संख्या भारत के लिए चिंता का विषय है लेकिन वोट बैंक की खातिर किसी भी दल ने इनके खिलाफ सख्त कदम उठाने से परहेज किया है। आज हालत ये है कि ये शरणार्थी भारत में न सिर्फ पक्के मकान और जमीनों के मालिक बन बैठे हैं बल्कि मतदाता सूचि में अपना नाम डालकर भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा बनने की शर्ते भी पूरी करने को तैयार हो चूके हैं। अब लाखों चकमा शरणार्थी भारत की नागरिकता हासिल कर चूके हैं। ये शरणार्थी अब इसी कानून का फायदा उठाकर गुंडागर्दी भी करने लगे हैं क्योकि इन्हे पता है कि उनकी बढ़ती संख्या और भारत की ढ़ुलमुल नीतियां उनका बाल बांका नहीं कर पाएंगी।
हालांकि इस संबंध में कानून मंत्रालय का कहना है कि शरणार्थियों के लिए कोई विशिष्ट कानून नहीं है और इस प्रकार के विदेशियों के मामलों को विदेशी विषयक अधिनियम ए 1946 और उसके अन्तर्गत बनाए गए नियमों के अधीन निपटाया जाता है।
साल 1971 में सिर्फ 1029 बांग्लादेशी शरणार्थी ही आये थे लेकिन अब इनकी संख्या लाखों हो गई है। इनके फर्जी नागरिकता प्रमाणपत्रों के जरिये सरकारी सुविधायें पा लेने से प्रशासन चौकन्ना जरूर हो गया है लेकिन कुछ कर नहीं पा रहा है।
बहरहाल अगर जल्दी हीं इनपर लगाम नहीं लगाया गया तो जल्दी हीं नक्सलियों की तरह ये भी लोकतंत्र के लिए घातक समस्या होंगे क्योंकि इनकी प्रतिबद्धता कभी भी भारत के लिए नहीं हो सकती।

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