Tuesday, 6 September 2011

बहुत तरसता है एक सपना....

"नहीं बची कोई खाली जगह,
बस, दर्द भर लिया दामन में अपने।
बहुत तरसता है एक सपना आने को इसमें।
पर इजाजत नहीं तेरी, तू खुद से है परेशाँ,
तुम ढूँढ़ते रहे राहों पर, मंजिल को हरकदम,
कभी ख्वाबों में, दामन को ख्वाबों से ही आबाद करो।
दम घुटता होगा
, दामन में कैद होकर तेरे।
तड़प तुझे है, तो दर्द में भी जान होती है,
तेरी एक हरकत पर मुस्कुरा उठेंगे दर्द सारे,
बस खोल दो दामन और…..
दो पल के लिए उसकी रूह को आजाद करो।"
 
मैने ये पंक्तियाँ उन हजारों मासूमों के हालात पर तरस खाने के लिए नहीं लिखी है जो मुंबई की सड़कों और स्टेशनों पर हाथ फैलाये खड़े होते हैं बल्कि इसलिए लिखी है कि ये फैले हुए हाथ मेहनत के लिए शायद हीं उठे। हो सकता है मेरी ये सोच कुछ लोगों को अतिवादी लगे लेकिन सच्चाई यही है। मुंबई में फैले ये सैंकडों बच्चे अनाथ है, इनका कोई सहारा नहीं है, ये लोगों से रेलवे स्टेशनों पर, रेड लाईट पर पैसे मांगकर अपना पेट भरते हैं। इन बच्चों में पैसे मांगते वक्त कभी भी आत्मग्लानि का भाव नहीं होता, क्योंकि ये इतने अभ्यस्त हो चुके होते हैं कि लज्जा और शर्म जैसी कोई बात आती ही नहीं। वैसे भी जब भूख बलवती हो तो लज्जा अपने आप तिरोहित हो जाती है। लेकिन सबसे बुरी बात होती है इनके सपनो का मर जाना। एक आम इंसान शायद इस वाक्य के मर्म को समझ सकता है कि जिनके पास सपने नहीं होते उनका जीवन कितना शुष्क और नीरस होता है। लेकिन ये अनाथ बच्चें खुशी, आनंद, उत्साह के मायने नहीं समझ पाते हैं। ये दर्द में डूबे होते हैं और इनके आनंदित होने का एकमात्र जरिया इनके फैले हुए हाथों पर सिक्कों का वजन होता है। सवाल ये है कि कल का भारत एक तरफ जहाँ सपनों से भरपूर, ऊर्जावान और उत्साही होगा दूसरी तरफ वो लाचार, बेबस और पराश्रित होगा।

No comments:

Post a Comment