Saturday, 10 September 2011

नारीः सक्षम भी, समर्पित भी...

नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्‍वास रजत नग, पग-तल में,
पीयूष स्त्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में॥
ये पंक्तियाँ पुरूषों के उस भाव को रेखांकित करती है जिन्हें मालूम है कि नारी शक्ति का भंडार है, दया की प्रतिमूर्ति है,  क्षमा की देवी है लेकिन सब जानने के बाद भी वो महिलाओं को कोमल भावनाओं से आगे बढ़ने नहीं देते हैं और उसे जीवन के झंझावातों में नहीं, बल्कि समतल में बहने को प्रेरित करते हैं| नारी की शक्ति को कोमलता और विवेक को शारीरिक निर्बलता का नाम  देकर उसे कमजोर बनाने की प्रथा सिर्फ पुरूषों की सोच है| औरत यानि जननी, जहाँ से शुरूआत होती है त्याग की, समर्पण की, आत्मविश्‍वास का, शौर्य का, बुद्धि का, चातुर्य का, वीरता का| एक औरत जो जीवन का सृजन करती है, मानवता को सुसंस्कृत करती है और सभ्यता को परिष्कृत करती है, उसे समाज में दोयम  दर्जे का स्थान मिला है| जो शक्ति का स्त्रोत दुर्गा बनकर पुरूषों के लिए पूजनीय  है वो पत्नी बनकर प्रताड़ित क्यों हो रही है? जो काली बनकर दुष्टों का संहार करती है वो बेटी बनकर पिता के गुस्से का शिकार क्यों है? जशंकर प्रसाद ने ठीक ही लिखा है कि
       अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी
,
       आंचल में दूध और आँखों में पानी
|
 कहने को तो नारी नर का सृजन करती है लेकिन जीवन के हर मोड़ पर वो नर दंभ का शिकार हैं| परंतु त्याग, विश्‍वास, सहृदता और समर्पण के बल पर महिलाएं हर बार समाज में अपनी स्थिति मजबूत कर लेती हैं और परिवार के लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन जाती हैं|
                                    वैसे तो भारतीय सभ्यता एक पुरुषप्रधान समाज के रूप में जानी जाती है लेकिन भारतीय महिलाओं का संघर्ष और समर्पण उन्हें दुनिया की दूसरी सभ्यताओं से अलग स्थान प्रदान करती है| सीता की अग्निपरीक्षा से लेकर सावित्री के पति को मृत्यु के मुँह से खींच लाने के विश्‍वास तक,  महिलाओं का हर रूप एक नई ऊर्जा प्रदान करता है| अपने कर्तव्य और त्याग से अनगिनत महिलाओं ने भारतीय सभ्यता को पुष्पित-पल्लवित किया है| हमारा समाज राधा के सौंदर्य को जितनी महत्ता प्रदान करता है उतनी हीं श्रद्धा वो मीरा के अलौकिक प्रेम में भी रखता है| अर्थात सभ्यता के हर काल में नारी का रूप और कार्यक्षेत्र तो बदला है लेकिन उसकी मौलिक गुणवत्ता में कोई परिवर्तन नहीं आया है|
            आधुनिक काल में महिलाओं के कार्यक्षेत्र में बदलाव आया है| इस बदलाव ने महिलाओं के कई नए आयामों को समाज के सामने पेश किया है| अब महिलाएं घर की चारदीवारी से निकलकर परिवार का आर्थिक संबल बनने लगी है| सागर की गहराईयों से लेकर अंतरिक्ष की उँचाईयों तक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सीईओ से लेकर दूर-दराज के खेतों मे हाड़तोड़-मेहनत तक, हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी क्षमता को साबित किया है| आज महिलाएं रक्षा क्षेत्र से लेकर कार्पोरेट कल्चर में अगर अपनी पैठ बना रही हैं तो वो उनकी उस मौलिकता को दर्शाता है जिसमे शक्ति और संघर्ष उनको विरासत में मिली है|
            हालांकि प्रशंसा की बात ये नहीं है कि महिलाओं ने अपने कार्यक्षेत्र में बदलाव किया है बल्कि प्रशंसनीय बात यह है कि वो मानसिक और नैतिक रूप से इतनी सबल हो गई हैं कि अपनी चहुँमुखी जिम्मेदारियों को पूरी कुशलता से निभा रही हैं| एक तरफ जहाँ वो घर में अपने बच्चों की जिम्मेदारियों को निभा रहीं हैं,  अपने सास-ससुर की देखभाल करते हुए सभी रिश्तो को निभा रही हैं, वहीं कार्यक्षेत्र की भी तमाम जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुये एक नई ऊर्जावान नारी के रूप में खुद को पेश कर रहीं हैं| मां, बहन, बेटी, पत्नी से होते हुए वैज्ञानिक, पायलट, शिक्षिका बनने के इस सफर में न तो उनका कोई चारित्रिक पतन हुआ है और न हीं कोई वैचारिक निकृष्टता आई है| दरअसल कामकाजी महिलाओं को दोहरा जीवन जीना पड़ रहा है| अपने पारिवारिक जीवन में वो जितनी सक्षम हैं उतनी हीं कर्तव्यपरायणता वो अपने कार्यक्षेत्र में भी साबित करती हैं|
            अब भी वही पवित्रता है गंगा की धारों में
            तुम विष मत घोलो वसंत की बहारों में|
ये पंक्तियाँ भारतीय कामकाजी महिलाओं पर बिल्कुल सटीक बैठती है| क्योंकि पारंपरिक पारिवारिक आधारस्तंभ से आर्थिक संबल बनने की दिशा में किया गया उनका हर प्रयास उल्लेखनीय है| आज की नारी अपने घर परिवार की जरूरतें तो पूरी कर हीं रही हैं साथ हीं अपने को अस्तित्वमान भी रख रही हैं| आज महिलाओं की एक स्वतंत्र पहचान है तो ये उनकी उस मेहनत का नतीजा है जो उन्हें विपरीत परिस्थितियों में अपना अस्तित्व बनाए रखने की हिम्मत देता है| महिलाओं की अपने पिता और पति के सरनेम के अलावा एक पहचान है, तो ये उस छटपटाहट का नतीजा है जो वर्षों से उनके अंदर कुंठा बनकर जमा हो रही थी| अपने जीवन के फैसले अब वो स्वयं लेने लगी है और उसमे पारिवारिक सहमति भी मिल रही है तो ये उस संघर्ष का फल है जो वो सैंकड़ों सालों से करती आ रही हैं|
    नारी तुम शांति नहीं, तुम्हे युद्ध हेतु तत्पर होना है,
    धधक रही होगी अग्नि,  ढ़ूढ़ो हृदय में कौन सा वो कोना है?
महिलाओं ने आर्थिक संबल मिलते हीं विकास के नए-नए आयाम ढ़ूँढ़ निकाले है| अपने वर्तमान को तो वो भरपूर जी हीं रही है अपने भविष्य को भी सुरक्षित कर रही है और इसी की परिणति है इस वर्किंग कल्चर के बीच उनके द्वारा एक नए युवा वर्ग का निर्माण| यह नया वर्ग जितना आदर अपने पिता का करता है उसी तरह अपनी माँ का भी सम्मान करता है| क्योंकि आधुनिक कामकाजी महिलाएं अपने बच्चों को आर्थिक संबल तो देती हीं हैं साथ हीं उन्हें बचपन से स्वावलंबी और संघर्षशील बनाने का माहौल भी देती हैं| पहले की तरह अब बेटियां हर फैसले के लिए अपने पिता की तरफ नहीं देखती हैं बल्कि अहम फैसलों में माँ के सहयोग और फैसले को भी पूरी तरजीह देती हैं| अब लड़कियाँ अपनी माँ की शिक्षा और मूल्यों को आत्मसात कर रही हैं|
आज भारतीय नारी तमाम मूल्यों को समेटे एक नए रूप में अवतरित हो रही हैं| वो कमजोर नहीं है और न हीं लाचार| पढ़-लिखकर परिवार, समाज और देश के विकास में योगदान दे रही हैं| पुरूषो के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलनेवाली महिलाएं कहीं-कहीं अपने समर्पण के बल पर उनसे आगे निकल रही है| ये बदलाव है आनेवाले नए युग का, ये प्रयास है नई पहचान का| अब महिलाएं अपनी बौद्धिक क्षमता के बल पर देश का निर्माण तो कर ही रहीं है बल्कि अपने अस्तित्व की एक नई इबारत भी लिख रहीं हैं| यानि नारी अब केवल श्रद्धा नहीं नव शक्ति की हुंकार बन चुकी हैं| बिना महिलाओं के न तो जीवन का सृजन होगा और न हीं सृजन में कोई सौंदर्य|

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