मौत किसी चीज का हल नहीं होती लेकिन फिर भी जिंदगी से निराश होकर लोग मौत को गले लगाने को तैयार हो जाते हैं। लोगों के सपनों का घरौंदा जब हकीकत से टकराकर टूटता है तो बजाये मेहनत के वो कायर बन जाते हैं। संघर्ष और मेहनत जैसी चीजें उन्हें बेमानी लगने लगती है। सपने और हकीकत का यही फर्क लोगों की समझ में नहीं आता तो जिंदगी हार जाती है-
थी सजी हसरतें दुकानों पर
जिंदगी के अजीब मेले थे,
खुदकुशी क्या दुखों का हल बनती
मौत के अपने सौ झमेले थे।
थी सजी हसरतें दुकानों पर
जिंदगी के अजीब मेले थे,
खुदकुशी क्या दुखों का हल बनती
मौत के अपने सौ झमेले थे।
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