Monday, 15 April 2013

एक अजनबी यात्रा



रविवार
सप्ताह के छह दिन वह ये सोचता कि रविवार के दिन खूब आराम करेगा, जी भर के सोयेगा, मुवी देखेगा, दोस्तों से मिलने जायेगा.. और भी अनगिनत काम वह संडे के दिन प्लान करके रखता। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर होता। शनिवार की रात को देखा उसका सपना संडे की सुबह ऐसे चकनाचूर होता कि वह बिलबिला जाता। अपने आप को कोसता... अरे कहाँ आकर फँस गया, चूल्हे में जाये ऐसी नौकरी... कोई ऐसे कुत्ते की तरह दिन-रात मेहनत करे और सप्ताह में एक दिन आराम भी न करे तो लानत है ऐसी नौकरी पर...। कई बार तो रविवार की सुबह कबूतरों की गुटरगूँ और गली के बाहर आवारा कुत्तों की भौं भौं से शुरू होती। उसका मन होता एक-एक को पकड़ के थप्पड़ मारे और बोले आज रविवार है कम से कम आज के दिन तो जी भर के सो लेने दो। कल से बॉस की कांव कांव तो सुननी ही है। फिर उसे अपने आप पर हँसी आती कि थप्पड़ भी मारे तो कबूतरों और कुत्तों को बस यही औकात रह गई उसकी... सीधे समस्या की जड़ पर ही हमला बोल दूँ...।
वह लेटे-लेटे ही सोचने लगता अभी जाता हूँ सोसाइटी वालों से पूछता हूँ कि क्या कुत्तों की लोरी सुनने के लिये पैसे लेते हो... कम से कम अपने गार्ड को तो बोले कि इन कुत्तों को चुप कराए। अभी वह बिस्तर पर युद्ध की तरकीबें सोच ही रहा होता कि कॉलबेल बज उठती। वह नीरीह भाव से इधर-उधर देखता जबकि उसे पता है कि उसके अलावा कमरे में कोई नहीं है। वह अलसाया हुआ उठ कर दरवाजा खोलता है- सामने दूध वाला खड़ा है। वह फिर वापस मुड़ता है दूध का बर्तन लेने के लिये तब पीछे से दूधवाला बड़बड़ाता है- साहब जरा जल्दी करो दूसरी जगह भी जाना है,,, आपकी तरह हमलोगों ने सुस्ती दिखायी तो हमारा तो धंधा ही चौपट हो जायेगा। वह अंदर ही अंदर सुलग उठता है मन में सोचता है ज्यादा चुस्ती-फुर्ती है तभी तो दूध बेच रहा है मुंहजोर कही का, लेकिन ऊपर से सहज होकर कहता है लाता हूँ भईया... नाराज क्यों होते हो।
दूध वाले के जाने के बाद वह फिर बिस्तर पर लेट जाता है... अब तो 11-12 बजे के पहले नहीं उठूँगा.. चाहे कुछ भी जाये। थोड़ी देर तक वह आँखें बंद किये सोने की कोशिश करता है... तभी फोन की घंटी बज उठती है। वह तकिये में मुंह घुसा कर आवाज अनसुनी कर देता है। कुछ देर बाद फिर फोन की घंटी बजती है तो इस बार उसके मन में ये जानने की इच्छा होती है कि पता नहीं कौन है जरा देख ही लिया जाये। वह फोन उठाता है उस तरफ से आवाज आती है- हैलो....हाँ पहचाना मैं.... वह झुंझलाता है- अबे मैं कौन?..  क्या बेटा मेरी आवाज नहीं पहचान रहे, सो रहे थे क्या ? वह अभय की आवाज पहचान लेता है लेकिन सोचता है कि अनजान बनकर खूब गालियाँ दें। वह शुरू हो जाता है- हाँ मेरे सौतेले बाप,,, तूझे नहीं पहचान रहा मैं और सुन...... मुझे पता है तू रांग नंबर है फालतू में सुबह सुबह फोन करके टाइम खोटी मत कर मेरा....। उधर अभय की आवाज से सारा रौब खत्म हो जाता है और वह जल्दी से बोलता है- यार मैं अभय बोल रहा हूँ,,, सुन तो सही...लेकिन उसने ठान लिया था कि खूब सुना कर रिसीवर पटक देना है तो उसने वैसा ही किया। फिर एक मुस्कुराहट के साथ लंबी साँस ली और बिस्तर पर फैल गया।
उसे सोच-सोच कर हँसी आ रही थी- अभय के बच्चे...हर संडे को फोन पर रायता फैलाना शुरु कर देता है, आज अच्छी खबर ली मैंने उसकी, अब दुबारा फोन करने से पहले सोचेगा जरूर। वह फिर सो जाता है। सपनों में दूर-दूर तक उड़ाने भरता है- हवा में एक महल है और उसमें साफ सुथरे बिस्तर पर वह आराम से सो रहा है तभी उसे कॉलबेल की आवाज सुनाई देती है, वह चौंकता है- अरे रे स्वर्ग में भी कॉलबेल,, नहीं यह सब भ्रम है, स्वर्ग अभी भी धरती की तकनीक से वंचित है,,, लेकिन कॉलबेल की आवाज लगातार आ रही है तभी उसकी नींद खुल जाती है। वह बिस्तर से अचानक उठ बैठता है- ओह इसका मतलब है कि वह सपना देख रहा था और दरवाजे पर काफी देर से कोई घंटी बजा रहा है।
वह हड़बड़ाया हुआ दरवाजा खोलता है- सामने अभय खड़ा है। वह लपककर अभय के गले लगता है कैसा है मेरे यार.... अभय भी मुस्कुराकर कहता है- ठीक हूँ... इधर से गुजर रहा था तो सोचा आज संडे है तू घर पर ही होगा तो मिलता चलूँ... अरे मैंने तूझे फोन भी किया था लेकिन पता नहीं तूने पहचाना नहीं शायद,, रांग नंबर कहकर रख दिया। उसका मन हुआ कि बोल दे रांग नंबर कहने के अलावे भी बहुत कुछ कहा था... वो सब क्यों नहीं बोल रहा...लेकिन वह कहता है- अबे तो वो तू था जिसे मैंने रांग नंबर समझ लिया था, सॉरी यार नींद में था, आवाज भी ठीक से नहीं आ रही थी। अभय कहता है कोई बात नहीं मुझे पता है तूने मुझे नहीं पहचाना होगा तभी तो तेरे से मिलने चला आया। अब पूरे दिन गप्पें लड़ायेंगे,,, खूब मजा आयेगा, है ना ! उसका मन होता है कि अभय को एक जोरदार थप्पड़ रसीद कर दे, वो थप्पड़ इतनी जोर का हो कि पाँचों उंगलियों के निशान छप जाये, उसका मुँह रुआँसा हो जाता है। अभय पूछता है- क्या सोचने लगा? वह कहता – यह सोच रहा हूँ कि चाय बनाऊँ या कॉफी? अभय जोर से हँसता है – अरे तू क्यों सोच रहा है मुझसे पूछ ले, मैं कोई गैर तो हूँ नहीं, जा बढ़िया सी कॉफी बना कर ले आ मेरे लिये....। वह पैर पटकता हुआ किचन में चला जाता है।   

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