Thursday, 13 February 2014

स्त्री अधिकारों को समर्पितः सरोजिनी नायडू

भारत में उन्हें 'गाने वाली चिड़िया' कहकर संबोधित किया जाता था और इंग्लैंड में 'भारत कोकिला' कहकर सम्मानित किया जाता था। लेकिन इस मिठास के साथ वो एक हुंकार भी थीं जो देश प्रेम को चहुँ दिशाओं में फैलाना चाहती थीं। साहित्य और नारी अधिकारों की हिमायती सरोजिनी नायडू का यह मानना था कि भारतीय नारी कभी भी कृपा की पात्र नहीं थी, वह सदैव से समानता की अधिकारी रही हैं।

13 फरवरी सन 1879 में हैदराबाद में जन्मीं सरोजिनी नायडू पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय और माता वरदा सुन्दरी की आठ सन्तानों में सबसे बड़ी थीं। माता-पिता साहित्यिक मिजाज से ओतप्रोत थे और कविता लिखा करते थे। परिणाम यह हुआ कि बालिका सरोजिनी को भी बाल्यकाल से ही साहित्य और कला में रूचि उत्पन्न हो गई। हालाँकि पिता वैज्ञानिक और शिक्षाशास्त्री पिता चाहते थे कि सरोजिनी गणित में निपुण बने लेकिन सरोजिनी का मन गणित के बजाये साहित्य में रमता था। बाल्यावस्था में ही सरोजिनी ने अंग्रेजी भाषा की अच्छी जानकारी हासिल कर ली और मात्र 13 वर्ष की अल्पावस्था में 1300 पदों की लम्बी कविता झील की रानी लिख डाली। अघोरनाथ जी पुत्री की इस प्रतिभा से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने एस. चट्टोपाध्याय लिखित पोयम्स के नाम से वर्ष 1903 में एक कविता संग्रह प्रकाशित किया।

सरोजिनी चट्टोपाध्याय कई भाषाओं की जानकार थीं। अपनी माता से जहाँ उन्होंने बंगला भाषा की जानकारी पाई, वहीं हैदराबाद के परिवेश ने उन्हें तेलुगु सिखा दिया। हिन्दी और अंग्रेजी की विद्वान तो वो थीं ही। उर्दू शायरी की शौकीन थीं इसलिये उर्दू भाषा भी उन्हें बहुत अच्छे से आती थी। उनकी विद्वता का आलम यह था कि मात्र 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने मैट्रीक की परीक्षा न सिर्फ उत्तीर्ण की बल्कि मद्रास प्रेसीडेंसी में पहला स्थान भी प्राप्त किया। तत्पश्चात उच्च अध्ययन के लिये वो इंग्लैंड चली गईं लेकिन कुछ वर्ष के उपरांत वह स्वदेश वापस लौट आयीं। हालाँकि इंग्लैंड के अल्प प्रवास के बावजूद वहाँ के साहित्यकारों ने सरोजिनी की कविताओं और साहित्यिक अभिव्यक्तियों की खूब सराहना की। आर्थर सिमन्स और एडमंड गॉस जैसे कवियों ने उन्हें अपनी कविता में गहराई लाने की प्रेरणा दी। उनकी बातों पर अमल करते हुये सरोजिनी चट्टोपाध्याय ने 20 वर्ष की आयु तक तीन कविता संग्रह तैयार कर लिये थे। उनकी प्रकाशित कृतियाँ बर्ड ऑफ टाइम और ब्रोकन विंग ने उन्हें प्रख्यात कवयित्री की श्रेणी में ला खड़ा किया। उनके कविता संग्रह द गोल्डन थ्रेसहोल्ड ने तो उन्हें साहित्य में नवोदित प्रभावशाली रचनाकार के रूप में स्थापित ही कर दिया। उन दिनों ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबारों में इस कविता संग्रह की प्रशंसा में समीक्षायें लिखी गईं। हालाँकि सरोजिनी ने कभी अपने आपको कवियित्री नहीं माना। वो कहती थीं कि मैं कवयित्री नहीं हूँ। लेकिन उनकी रचनायें लोगों की प्रशंसा पाती रहीं। सन् 1937 में एक लम्बे अंतराल के बाद सरोजिनी ने अपना आखिरी कविता संग्रह द सेप्टर्ड फ्लूट लिखा। 

वैवाहिक जीवन

सरोजिनी चट्टोपाध्याय का विवाह डॉ. गोविन्दराजुलु नायडू से हुआ था। गोविन्दराजुलु फौज में चिकित्सक थे। प्रारंभ में उनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय इस विवाह के विरुद्ध थे लेकिन कालान्तर में उन्होंने इस विवाह को सहमति दे दी। डॉ. गोविन्दराजुलु से विवाह कर सरोजिनी ने हैदराबाद में ही सुखमय जीवन शुरु किया और अपने बच्चों तथा पति की अच्छी तरह से देखभाल की। परन्तु साहित्य और परिवार के अलावा भी उन्हें कुछ और करना था जिसकी झलक उनकी कविताओं में अक्सर मिला करती थी। गोपाल कृष्ण गोखले ने सरोजिनी नायडू के इसी मनोभाव को समझा और अपने जीवन तथा कविताओं को राष्ट्र की सेवा में समर्पित करने हेतु प्रेरित किया। तत्पश्चात महात्मा गाँधी से वो मिलीं और अपने आपको पूरी तरह से राजनीति और देश सेवा में समर्पित कर दिया।

लगभग चौबीस वर्ष की आयु में राजनीतिक यात्रा पर निकलने वाली सरोजिनी नायडू ने देश प्रेम का झंडा तो बुलंद किया ही साथ ही कांग्रेस पार्टी से जुड़कर महिला सशक्तिकरण का नारा भी बुलंद किया। सरोजिनी को देखकर हजारों भारतीय महिलाओं का खोया आत्मविश्वास लौट आया और वो पुरजोर तरीके से स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद पड़ीं। सरोजिनी नायडू ने अपनी सूझ बूझ और सक्रियता से बहुत जल्दी कांग्रेस में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। सन 1925 ईस्वी में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की अध्यक्ष चुनी गई। अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा कि स्वाधीनता संग्राम में भय एक अक्षम्य विश्वासघात है और निराशा एक अक्षम्य पाप है।

स्त्री अधिकारों की समर्थक

सरोजिनी नायडू मानती थीं कि भारतीय नारी हमेशा से समानता की अधिकारिणी रही है और उसे अपना स्थान स्वयं सुनिश्चित करना चाहिए। वस्तुतः नायडू स्वयं एक नारी होने के कारण स्त्री  की दयनीय परिस्थितियों से अवगत थीं और चाहती थीं कि महिलाओं को आत्मनिर्भर और सजग बनाया जाये जिससे वो स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ अन्य सामाजिक गतिविधियों में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें। उन्होंने भारत में हो रहे स्त्री शोषण के विरुद्ध आवाज उठायी। स्त्रियों के मौलिक अधिकारों का हनन करने वाली कुप्रथाओं का विरोध किया और उसे जड़ मूल से खत्म करने का बीड़ा उठाया। सरोजिनी नायडू 'नारी मुक्ति आंदोलन' को भारत के स्वाधीनता संग्राम का एक हिस्सा ही समझती थीं। सरोजिनी नायडू शिक्षा को नारी मुक्ति की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण क़दम मानती थीं। वो कहती थीं कि शिक्षित होकर ही स्त्री अपने परिवार और समाज को बेहतर बना सकती है। वो कहती थीं कि स्त्री में सृजन की क्षमता है तो उसमें शासन की क्षमता भी है। शिक्षा के द्वारा उस क्षमता को संवर्धित किया जाना चाहिए। बिना शिक्षित हुये कोई भी स्त्री देश और समाज का भला नहीं कर सकती और सबसे महत्वपूर्ण की वो खुद की स्थिति में सुधार नहीं कर सकती। इसलिये शिक्षा के बल पर ही स्त्री को शासन और सशक्तिकरण का हथियार प्राप्त हो सकता है। सरोजिनी नायडू यह भी मानती थीं कि स्त्रियों को अपनी क्षमता और अधिकारों का बोध होना चाहिए। जिस प्रकार नारी-शिक्षा महत्त्वपूर्ण है उसी प्रकार क्षमताओं और अधिकार-कर्तव्यों के बोध का भी स्मरण होना चाहिए।

सरोजिनी नायडू अपने संबोधनों में हमेशा नारी विकास और शिक्षा पर ज़ोर देती रहीं। उन्होंने नारी को उसके अधिकारों और शक्ति के प्रति जागरूक किया जिससे प्रेरणा पाकर हजारों लाखों महिलायें बेहतर नागरिक और बेहतर इंसान बनीं। सरोजिनी नायडू के नारी विकास की इसी चिन्ता को देखते हुए 'अखिल भारतीय महिला परिषदने इस दिशा में कार्य करना प्रारंभ किया। यह देश की सबसे पुरानी और महत्त्वपूर्ण नारी संस्था है। अपने जीवन के सक्रिय वर्षों में सरोजिनी नायडू इस संस्था की गतिविधियों की प्रेरणा रही।

नारी अधिकारों की समर्थक और स्वयं एक जागरूक सक्रिय राजनेता, स्वतंत्रता सेवी महिला सरोजिनी नायडू की मृत्यु 2 मार्च 1949 को हुई। मृत्यु के वक्त भी वो राज्यपाल के पद को सुशोभित कर रही थीं। भले ही वो सशरीर इस धरा पर नहीं है लेकिन नारी जागरण हेतु शुरू किया गया उनका अभियान अब पूर्णतः आकार ले चुका है और भारतीय नारियों ने समानता की कसौटी पर खुद को खरा सोना साबित कर दिया है।


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