Thursday, 13 February 2014

भकोलदास और हरिया का भैलेन्टाइन



सोनी किशोर सिंह
बाबा भकोलदास सुबह से अलसाये पड़े हैं, बीच-बीच में गाँजे का कश खींचे जा रहे हैं और गालियाँ दिये जा रहे हैं। आज हमारी कुटिया में कोई भक्त दिख नहीं रहा है रे हरिया.. जरा पता लगाओ कहाँ गये ससुर के नाती सब, होली के पहले ही पूरा गाँव फगुनिया गया है का...। उनका मुँहलग्गू सेवक हरिया कहता है- ना बाबा ना, फागुन को काहे कोसते हैं, इ सब गाँव वाला भैलेन्टनिया गया है। भकोलदास की आँखे फैल जाती हैं- इ का कह रहा है रे पगला, हमार तो पूरा दाढ़ी सफेद हो गया, हम त कबो न वैलेन्टनियायें हैं, फिर इ दलीद्दर सबको भक्ति भजन छोड़कर ई रोग कैसे लग गया रे ? हरिया भी आँखे दिखाता है, काहे झूठ बोलते हैं सेबेरे सबेरे बाबा, आप त रोज्जे ये ही फिराक में रहते हैं कि कब कोई... भकोलदास चिल्लाते हैं- मारे देंगे हरिया, जो हमारा चरित्र हनन करेगा तो...एक तो पहले से ही हमार साढ़े साती चल रहा है, दान-दक्षिणा नहीं मिल रहा, ऊपर से तुम फिलॉस्फी झाड़ रहे हो। हरिया- हम फिलॉस्फी झाड़ रहे हैं, भूल गये जब पिछले महीने लक्ष्मीनियाँ के हाथ देखने के बहाने छुआ-छापी किये थे त लक्ष्मीनियाँ केतना धुनी थी आपको...और नहीं तो गाँव वाला सब तो आपका लंगोट खोलकर पुरनका बड़ के गाछ में बाँध दिया था... बाप रे बाप, हमको तो इयाद करके अबो रोआं सिहर जाता है... भकोलदास- चुप रे छुछुँदर, जरूर तुम आज चुराकर मेरा गाँजा चाप गया है, भाग जाओ यहाँ से.. जे दिमाग गरमा जायेगा, तो लक्ष्मीनियां के गुस्सा तुम पर ही उतार देंगे...। हरिया गमछा उठाकर जाते हुये कहता है- हमरा दिन एतना खराब नहीं हुआ जे बइठ कर आपका परलाप सुने, हम जा रहे हैं.. हमको लक्ष्मीनियाँ बुलाई है भैलेन्टाइन मनाने...।

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