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| पुष्पा भारती |
सोनी किशोर सिंह
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला, कभी न कण भर खाली होगा, लाख पियें दो लाख पियें, पाठकगण हैं पीने वाले, पुस्तक मेरी मधुशाला !
कवि हरिवंश राय बच्चन के मधुशाला की ये पंक्तियाँ कई भाव
समेटे है लेकिन इन भावों को जिस शख्स ने आत्मसात कर लिया, उसे जिया, समझा और बच्चन
जी के सानिध्य में रहकर उन भावों को महसूस किया वो शख्सियत भी विलक्षण ही हैं।
पुष्पा भारती एक अद्भुत साहित्यकार, पत्रकार, कला मर्मज्ञ और एक ज़हीन इंसान हैं
जिन्होंने पुत्री बनकर बच्चन जी के मधुशाला का रसास्वादन किया, पत्नी के रूप में
भारती जी की साहित्य साधना में सहयोग दिया और एक कर्मठ पत्रकार बनकर धर्मयुग को
धार दिया।
तुमने गढ़ा है मुझे
किन्तु प्रतिमा की तरह स्थापित नहीं किया
या फूल की तरह
मुझको बहा नहीं दिया
प्रश्न की तरह मुझको रह-रह दोहराया है
नयी-नयी स्थितियों में मुझको तराशा है
सहज बनाया है
गहरा बनाया है
प्रश्न की तरह मुझको
अर्पित कर डाला है ।।
किन्तु प्रतिमा की तरह स्थापित नहीं किया
या फूल की तरह
मुझको बहा नहीं दिया
प्रश्न की तरह मुझको रह-रह दोहराया है
नयी-नयी स्थितियों में मुझको तराशा है
सहज बनाया है
गहरा बनाया है
प्रश्न की तरह मुझको
अर्पित कर डाला है ।।
अगर स्मृतियों को नदी की तरह प्रवाहमान कर दिया जाये तो कलकल-छलछल करती वेगमती
जलधारा अपने पीछे एक शोर मिश्रित शांति और रेत की श्रृंखलायें छोड़ जाती है।
पुष्पा भारती उस नदी के समान हैं जिनको अतीत की स्मृतियों में ले जाने पर अनायास
ही साहित्य की रेत पर यादों के मोती बिखर जाते हैं। सहज, सरल, सजग, वात्सल्यमयी,
कर्मठ साहित्यकार पुष्पा भारती से मिलना ऊर्जामय बना देता है साथ ही साहित्य की
परतें अपने आप उघड़ती चली जाती हैं। पुष्पा भारती से उनके आवास पर हुई मुलाकात में
उनके बचपन, साहित्यिक रुझान, शैक्षिक गतिविधियाँ, धर्मवीर भारती और धर्मयुग की
यादों समेत कई मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई। प्रस्तुत है उस चर्चा का संक्षिप्त और
संपादित रूप -
आप अपने बचपन के बारे में कुछ बताइए।
मैं गंगा दशहरा के दिन यानि 11 जून 1935 को मुरादाबाद में पैदा हुई थी। पिताजी
रघुनंदन प्रसाद शर्मा मुरादाबाद गवर्नमेंट कॉलेज में हिन्दी के प्राध्यापक थे।
पिताजी हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी तीनों भाषाओं में एम. ए. थे। तीनों भाषाओं का
भरपूर ज्ञान था। मेरे पिताजी पढ़ने लिखने के बेहद शौकीन थे और आशु कविता लिखा करते
थे। हिन्दी उन्हें विशेष प्रिय था। माता जी भी धर्मपरायण महिला थीं। मेरे सभी
भाई-बहन पढ़ने में बहुत तेज थे। सन 1943 में पिताजी का ट्रांसफर लखनऊ हो गया। लखनऊ
में भी पढ़ने-लिखने के शौकीन लोग अक्सर हमारे घर आया करते थे। पिताजी को किताबें
खरीदने का शौक था। घर में ढ़ेर सारी किताबें थीं। पिताजी शाम को पढ़ाकर कॉलेज से
लौटते थे तो रास्ते से मौसमी फल ले आते थे। घर लौटते ही अम्मा उसको धो-काटकर बैठक
में लाकर रख देती थी। फिर हम सब भाई-बहन बैठकर उसे खाते थे और पिताजी किताबें
पढ़कर सुनाया करते थे। हमलोग कुछ फल खाने के लालच से और कुछ कहानियाँ सुनने के
लालच से वहाँ पहुँच जाते। हम सारे भाई-बहनों को पिताजी ने क्लासिक वर्ल्ड लिट्रेचर
पढ़कर सुना दिया। इस तरह हमारे घर का अद्भुत पढ़ाई-लिखाई का वातावरण था।
बालपन की कुछ और स्मृतियाँ ?
कुछ घटनायें याद हैं। पिताजी के कई मित्र घर आते तो मेरे बारे में कहते थे कि
लड़की बड़ी मनहूस है, ये जिस वर्ष पैदा हुई उसी वर्ष हमारे हिन्दी के कई महान रत्न
जयशंकर प्रसाद, प्रेमचन्द आदि चले गये। इस बात को सुनकर मेरे बालमन में ये धारणा
बैठ गई थी कि मैं तो मनहूस हूँ और मेरे पैदा होते ही इतने बड़े लेखकों की मृत्यु
हो गई, साहित्य का घोर नुकसान हो गया, लेकिन जब मैं सातवीं क्लास में पढ़ती थी तभी
पता चला कि 1935 में हरिवंश राय बच्चन जी ने मधुशाला लिखी। मेरे लिये यह बात इतनी
खुशी कि थी मैं अब सबको जवाब दे सकती हूँ कि मैं मनहूस नहीं हूँ। मैने सोचा कि
मरते तो सभी एक दिन है लेकिन जिस सन में मैं पैदा हुई उसी सन में मधुशाला लिखी गई
जो आज सारे हिन्दुस्तान में गर्व से सुना जाता है। इसी बात ने मुझे गर्व से भर
दिया। एक और बात बताना चाहूँगी कि बचपन में मैं बहुत शरारती हुआ करती थी। अक्सर
खुराफातें करती रहती। एक बार की बात है हमारे घर में एक मेज रखी रहती थी जिसके चारो
तरफ बैठकर हम भाई-बहन पढ़ा करते थे। वो पुरानी हो गई तो हिलने पर चर्र चर्र चूँ
चूँ की आवाज होती थी। सब लोग जब शांति से पढ़ने लगते तो मैं जान-बूझकर उसे हिला
देती ताकी आवाज हो। सब मुझपर गुस्सा करते कि मैं उनलोगों को पढ़ने नहीं देती। एक
दिन मैं सबकी नजर बचाकर मेज के नीचे छिप गई और मेज को हिलाने लगी, उससे चूँ चूँ की
आवाजें आने लगी। मेरी बड़ी दीदी ने देख लिया और वो चिल्लाई कि पिताजी हमलोगों को
पुष्पा परेशान कर रही है। पिताजी आकर प्यार से बोले- सब बच्चे इतने सीधे हैं तू
बहुत शरारती है। न खुद पढ़ती है न पढ़ने देती है। मैने कहा पिताजी मैं शरारत नहीं
कर रही, आज भगवती चरण वर्मा की एक कविता पढ़ी... उसमें लिखा था- चूँ चरर, मरर जा
रही चली भैंसा गाड़ी... मैं तो कविता महसूस कर रही थी, किसी को परेशान नहीं कर रही
थी। इस बात पिताजी हँसने लगे।
साहित्य के प्रति इतना गहरा लगाव क्या घर के साहित्यिक माहौल की देन थी ?
हाँ, पिताजी ने बचपन में जो सिखाया- पढ़ाया उसने साहित्य की तरफ मेरी रुचि जगा
दी। मैंने सारे साहित्यकारों को पढ़ना शुरु कर दिया। उस जमाने में सभी स्कूल-कॉलेज
अपने यहाँ कवि दरबार लगाते थे। उसमें सभी विद्यार्थी कवियों की कवितायें सुनाते थे
और अपने प्रिय कवि का वेश भी बनाते थे। मैं भी कवि दरबार में बच्चन जी जैसा बनाकर
जाने लगी। उन दिनों बच्चन जी के बाल बहुत घुंघराले होते थे तो मैं भी अपने बालों
को घुँघराले करके कवि दरबार में जाती और लोग खूब वाहवाही भी देते। हालाँकि मेरे
पास बच्चन जी जैसा कोट नहीं था तो मैंने अम्मा से कहा कि मुझे बच्चन जी जैसा कोट
सिलवा दो। उन्होंने कहा कि इतने पैसे कहाँ से आयेंगे और कोट सिलवाने से मना कर
दिया। मैं बच्चन जी की नकल करते हुये इतनी प्रसिद्ध हो गई कि दूसरे कॉलेज वाले भी
बुलाने लगे। वहाँ कविता प्रतियोगिताओं में पुरस्कार स्वरुप जीते गये पैसे जोड़ कर
माँ को दिये और कहा कि अब कोट सिलवा दो। माँ ने कोट बनवाया और मैं कवि दरबार में
हरिवंश राय बच्चन की तरह कोट पहनकर जाने लगी। बच्चन जी तबसे मेरे इतने प्रिय थे।
तब मुझे ये मालूम नहीं था कि जिस कवि की रचनायें मैं सुनाती हूँ एक दिन उनकी सबसे
लाड़ली बेटी बन जाऊँगी।
हरिवंश राय बच्चन आपके सबसे प्रिय कवि थे, उनसे आपकी पहली मुलाकात कब हुई ?
मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में बीए में पढ़ती थी। जब मैं यूनिवर्सिटी में
एडमिशन लेने गई तो लड़कियाँ आपस में बात कर रही थीं कि यहाँ हिन्दी विभाग में
धर्मवीर भारती पढ़ाते हैं और इंग्लिश विभाग में हरिवंश राय बच्चन। मैं सुनकर बहुत
खुश हुई कि बच्चन जी यहाँ पढ़ाते हैं। तब फिराक गोरखपुरी भी वहाँ इंग्लिश
डिपार्टमेंट में पढ़ाते थे। मैं तब तक भारती जी का गुनाहों का देवता आदि भी पढ़
चुकी थी। लेकिन जब मैं पढ़ने पहुँची तो पता चला कि ये लोग लड़कों को पढ़ाते हैं।
लड़कियों के विभाग में आते ही नहीं। मुझे बहुत दुख हुआ लेकिन मैं निराश नही हुई।
अपनी तरह की साहित्यिक मिजाज वाली कुछ सहेलियों को मिलाया और बच्चन जी से मिलने के
मिशन में लग गई। हमलोग एडमिशन होते हीं क्लासेज बंक करने लगे और हिन्दी
डिपार्टमेंट औऱ इंग्लिश डिपार्टमेंट के चक्कर काटने लगे ताकी ये महान साहित्यकार
दिख जायें। धर्मवीर भारती जी तो कुछ दिन की मेहनत के बाद हिन्दी डिपार्टमेंट में
दिखाई दे गये। लेकिन बच्चन जी नहीं दिखे। एक दिन पता चला कि बच्चन जी फलां टाइम
में आने वाले हैं हमलोगों ने तय किया कि आज कुछ भी हो जाये उनको देखना ही है।
बच्चन जी तय समय पर आये, कार से उतरे और फटाफट डिपार्टमेंट में घुस गये। हमलोग फिर
ठीक से नहीं देख पाये तो बड़ी वाली आलपीनें लाकर उनकी कार को पंक्चर कर दिया और ये
सोचकर खुश होने लगे कि अब तो बच्चन जी जरूर दिखेंगे, लेकिन जब बच्चन जी आये तो
पंक्चर देखकर वो फिर फटाफट अपने डिपार्टमेंट में घुस गये और उनकी पंक्चर कार कोई
और ठीक कराने ले गया। निराश होकर हमलोग उनकी कुछ झलक देख लौट आये थे। इस घटना के
करीब चार-पाँच महीने बाद हिन्दी विभाग में एक कार्यक्रम होने वाला था जिसमें
स्वलिखित कविताओं का पाठ करना था। मुझे पता चला कि इस प्रतियोगिता को जज करने के
लिये हरिवंश राय बच्चन आने वाले हैं तो मैंने निश्चय किया कि इस प्रतियोगिता में
अवश्य भाग लूँगी। मैने जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत
त्रिपाठी निराला आदि तमाम बड़े कवियों की किताबें इकट्ठा की, सबकी कवितायें पढ़ना
शुरू किया, कविताओं के अच्छे-अच्छे भाव उठाकर मैंने अपनी कविता तैयार कर ली,
जोड़-तोड़ से कविता बहुत अच्छी बन पड़ी। कार्यक्रम में मैंने सुनाया। बच्चन जी आये
तो हमलोग की साध पूरी हो गई। हमलोग उन्हें लगातार देखे जा रहे थे। कार्यक्रम के
बाद बच्चन जी ने खड़े होकर रिजल्ट घोषित किया, फिर एक छोटा सा भाषण दिया और उसमें
उन्होंने कहा कि मैं बड़ा प्रसन्न हूँ कि इतनी छोटी उम्र में आपलोगों ने इतना
अच्छा लिखा, आपलोगों के पास इतना ज्ञान, इतनी कोमलता, इतना भाव, भाषा में इतनी
रवानगी है, मैं आपलोगों को साधुवाद देता हूँ। फिर मेरी तरफ देख कर कहने लगे कि अंत
में आपलोगों को एक सलाह देना चाहूँगा कि उधार की ली हुई भाषा और उधार के लिये हुये
भाव बहुत दिनों तक जीवन में साथ नहीं देते...। मैं समझ गई कि मेरी चोरी पकड़ी गई
तब मैंने उनके सामने ही अपने कानों को हाथ लगाया और मन ही मन कहा कि अब कविता कभी
नहीं लिखूँगी। इस तरह बच्चन जी से मेरी पहली मुलाकात हुई।
धर्मवीर भारती जी से कैसे
मुलाकात हुई ?
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में तो उन्हें देख ही चुकी थी। दुबले, पतले, काला
चश्मा लगाये साइकिल पर आते थे। साइकिल को स्टैंड में खड़ी कर आराम से अपने विभाग
की तरफ जाते थे। लेकिन औपचारिक मुलाकात हुई मेरे रिसर्च के दौरान। एम. ए. फाइनल के
बाद मैंने रिसर्च के लिये आवेदन दिया तो डॉ. धीरेन्द्र वर्मा ने कहा कि तुम सिद्ध
साहित्य और नाथ साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन में रिसर्च करो। उन्होंने बताया कि इस
विषय पर जूनियर लेक्चरर धर्मवीर भारती ही गाईड कर सकते हैं। हालाँकि वो रिसर्च
स्कॉलर को गाईड करने के लिये इनटाइटल्ड नहीं थे। इस समस्या का हल निकालते हुए
उन्होने कहा कि गाईड उदयनारायण तिवारी होंगे लेकिन असली गाइडेन्स भारती जी देंगे।
मैं बहुत खुश हुई क्योंकि भारती जी भी मेरे प्रिय लेखक थे। वैसे मेरे मन में शंका
थी कि उन्होंने मुझे कभी पढ़ाया नहीं, मुझे जानते तक नहीं, वो मेरी सहायता करेंगे
भी या नहीं ? मैंने ये शंका
धीरेन्द्र वर्मा को बताई तो उन्होंने कहा कि मैं भारती जी को बोल दूँगा। मैं भारती
जी के पास गई और कहा कि मेरा नाम पुष्पलता शर्मा है और मुझे डॉ. धीरेन्द्र जी ने
आपके पास भेजा है, मुझे सिनोप्सिस बनानी है। भारती जी गुस्से में उबल पड़े-
सिनोप्सिस बनानी है आपको, और मैं आपको लिख कर दूँ... खुद लिखकर लाइए, उसमें जो
गलती होगी उसमें सुधार कर दूँगा। मैं निराश हो लौट गई और लाइब्रेरी से जाकर
किताबें पढ़ी और अपने मन से सिनोप्सिस तैयार किया। फिर भारती जी के पास ले गई। इस
प्रकार भारती जी से मिलना हुआ।
धर्मवीर भारती जी की तरफ झुकाव कैसे हुआ ?
भारती जी की शादी कांता कोहली से हुई थी। कांता मेरी सहपाठी और दोस्त थीं।
लेकिन बाद में वो एक साल पीछे होकर जूनियर हो गई थी। जब मैं रिसर्च करने लगी तो
कांता ने कहा कि तुम मेरी सहेली हो पढ़ने के लिये घर आ जाया करो, मेरे घर में बहुत
अच्छी लाइब्रेरी है। मैं भारती जी और कांता के घर जाकर पढ़ाई करने लगी। भारती जी
साहित्य के प्रति मेरा लगाव देखकर बहुत खुश थे। इसी बीच रिसर्च के सिलसिले में मैं
कोलकाता के नेशनल लाइब्रेरी में गई। वहाँ भंवरमल सिंह और श्वेताराम जी ने मुझे
कोलकाता यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज में लेक्चरर बनने का प्रस्ताव रखा। मैने पिताजी
से पूछा तो उन्होने कहा कि तुम्हारी रिसर्च का क्या होगा। मैने कहा कि मैं रिसर्च
भी पूरा करूँगी और अध्यापन भी करूँगी। वहाँ शिक्षायतन कॉलेज की लड़कियों ने मुझे
बेइंतहा प्यार दिया। मुझे पढ़ाने में बहुत मजा आने लगा। इन सबके बीच मेरा रिसर्च
छूट गया, लेकिन आधुनिक साहित्य को पढ़ने-लिखने का काम जारी रहा। कोलकाता में
अध्यापन के दौरान भारती जी मुझे रोज एक पत्र लिखते थे। पति-पत्नी (भारती जी और
कांता) दोनों मिलकर इलाहाबाद रेलवे स्टेशन जाकर कालका मेल ट्रेन के आरएमएस डिब्बे
में पत्र डाल आते थे. जिससे अगले दिन चिट्ठी मुझे मिल जाये। कोई भी मौसम हो दोनों
हर रोज मुझे चिट्ठी भेजते थे। ये सारी चिट्ठियाँ एक साहित्यिक की प्रेमकथा के नाम
से बाद में प्रकाशित भी हुईं।
धर्मवीर भारती जैसे महान साहित्यकार की जीवनसंगिनी बनने को आप किस रूप में
देखती हैं ?
हमलोगों में आपसी विश्वास और प्रेम बहुत था। वो मेरा बहुत आदर करते थे,
पसंद-नापसंद का ख्याल रखते थे। मैं भी उन्हें आजीवन अपना गुरु मानती रही। मैं बहुत
भाग्यशाली हूँ कि मुझे उनका सानिध्य और साथ मिला।
धर्मवीर भारती जी के बारे में कोई खास बात ?
बहुत सारी बातें हैं। वो बहुत नेक इंसान थे। मैं अपने शब्दों में क्या कहूँ,
माखनलाल चतुर्वेदी के शब्दों में -ऐसा लग रहा है कि इसके कंधों पर हिन्दी साहित्य
का भार आने वाला है, इस लड़के में अद्भुत प्रतिभा है... ऊपर मैंने जो कुछ भी लिखा
है उसे मेरा पक्षपात न समझा जाये, इस बात को स्वयं भारती को प्रमाणित करना है..
ख़ास की कलम से नहीं, साँस की कलम से।

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