Thursday, 27 February 2014

व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर… डॉ. प्रेम जनमेजय



 सोनी किशोर सिंह

प्रेम जनमेजय
व्यंग्य एक गंभीर साहित्यिक कर्म है परन्तु यह साहित्यिक विधाओं से अलग एक नयी विधा है जो समाज का ध्यान उसकी विसंगतियों की तरफ दिलाता है और उसके निदान की पहल करता है। एक व्यंग्यकार अपने समय और समाज का समीक्षक होता है, एक ऐसा समीक्षक जो बुराईयों पर अपने शब्द रूपी बाण से प्रहार कर जागरूक मष्तिष्क को आंदोलित और कुंठित जड़ मन को उद्वेलित करता है। एक सच्चे व्यंग्यकार का कार्य मनोरंजन करना, लोगों को हास्यबोध कराना नहीं बल्कि अपनी रचनाओं से समाज को आंदोलित कर सुपथ पर ले जाना होता है। समाज और देश को सोचने हेतु बाध्य करने वाली रचनाओं के रचयिता प्रेम जनमेजय इसी भूमिका का निर्वहन करते हुए आज व्यंग्य की दुनिया के सशक्त हस्ताक्षर बन चुके हैं। 


व्यंग्य के महारथी प्रेम जनमेजय के लेखन में जितनी धार है उतनी ही वाणी में सहजता,  उनके कटाक्ष का तोड़ किसी के भी पास नहीं है। हिन्दी व्यंग्य की तीसरी पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर प्रेम जनमेजय व्यंग्य के परंपरागत स्वरूप में खुद को सीमित नहीं करते बल्कि उनका मानना है कि व्यंग्य के माध्यम से आर्थिक विसंगतियों पर भरपूर प्रहार किया जा सकता है और समाज को एक दिशा दी जा सकती है। अपनी पत्रिका 'व्यंग्य यात्रा' के माध्यम से व्यंग्य को नई पहचान देने वाले जनमेजय जी से उनके मुंबई प्रवास के दौरान लम्बी बातचीत हुई। प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंशः
आपकी व्यंग्य रचनाएं हिन्दी जगत् को बहुत प्रभावित कर रही हैं। आज आप व्यंग्य की दुनिया में बुलंदियों पर हैं,  हम अपने पाठकों के लिए यह जानना चाहते हैं कि इस बुलंद ईमारत की नींव कहाँ पड़ी?
मेरा जन्म 18 मार्च, 1949 को उत्तर प्रदेश की साहित्यिक नगरी इलाहाबाद में हुआ। भरा-पूरा सुखी परिवार था। पिताजी और माताजी दोनों ने हम तीन भाईयों को काफी अच्छे संस्कार दिये। पिताजी राम प्रकाश कुन्द्रा और माताजी सत्या कुंद्रा पाकिस्तान से भारत आये थे। उस दौरान हुये दंगों में मेरी दादी समेत हमारे परिवार के कई सदस्य मारे गये और घायल हुये लेकिन माँ और पिताजी दोनों ने कभी भी हमलोगों को ऐसे किस्से कहानियाँ नहीं सुनाये जिससे घृणा पैदा हो। मेरी माँ बुरे दौर और बुरी बातों के बजाये अच्छी चीजें बताया करती थीं कि कैसे वो अपनी सहेलियों के साथ खेलती थीं, कितनी अच्छी साझा संस्कृति हुआ करती थी, वगैरह। मेरे परिवार का संस्कार ही था कि मुझे प्रेम करना सीखाया गया, विद्वेष करना नहीं। माता-पिता ने भौतिकतावादी दृष्टिकोण देने के स्थान पर नैतिकतावादी दृष्टिकोण दिया।

क्या इलाहाबाद में जन्म लेना ही आपकी साहित्यिक-यात्रा के लिये सहायक बना ?
इलाहाबाद में जन्म होने के कारण मैं साहित्यकार हो गया ऐसी बात नहीं है   मेरा जन्म इलाहाबाद में हुआ। हिंदी साहित्य के अखाड़ेबाज, उठापटकाउ और इसकी महत्वपूर्ण दिशा तय करने वाले श्रेष्ठी, दलित, वंचित सभी यह जानते हैं कि आज चाहे हिंदी साहित्य की राजधानी दिल्ली है, पर इससे पहले इलाहबाद थी। अगर आप साहित्यकार हैं और इलाहाबाद से जुड़े हुए हैं तो आपके साहित्यकार होने में कोई शक होने का मतलब ही नहीं होता है तथा दूसरों से दो-तीन इंच उँचे उठे होने का आरक्षण भी आपको मिल जाता है। मेरा जन्म इलाहबाद में हुआ है, यह मात्र घटना है और इस घटना के आधार पर मैं अपनी श्रेष्ठता का दावा प्रस्तुत कर सकता हूँ। अब किसने देखा और किसे पता है कि मैंने बचपन में क्या किया है?  किसी और की क्या बात कहूँ,  मुझे ही अपना बचपन कहाँ याद है। पर मैं बड़े आराम से कह सकता हूँ कि उन दिनों हमारे पिता हम भाईयों को सुबह  के समय घुमाने ले जाते और अक्सर दारागंज से होकर जाते थे। वे मुझे हर बार निराला का घर दिखाकर कहते थे कि तुम्हें ऐसा बनना है। और मुझे लगता है कि निराला की उस गली का कोई साहित्यिक कीड़ा मेरे मस्तिष्क में घुस गया और मैं साहित्यकार बन गया। निराला के साहित्य में व्यंग्य भी है, इसलिए हो सकता है कि वो कीड़ा व्यंग्य वाला हो। निराला की गली के कीड़े के कारण व्यंग्यकार बन गया। मेरा एक चित्र महादेवी वर्मा के साथ भी है। वह भी तो इलाहाबाद की थीं, और फिर चित्र का प्रमाण है तो कहने में क्या हर्ज है कि जब मैंनें उन्हें अपनी व्यंग्य कविता सुनाई तो उन्होंने कहा कि तुम्हारे लिए यही मार्ग श्रेष्ठ है।  इलाहाबाद का साहित्यिक महत्व है तो एक जुड़ाव महसूस हुआ उस जगह से। जब मैं भारती जी से पहली बार मिला तो उन्होंने पूछा अरे आप इलाहाबाद से हैं,  मैंने जवाब दिया इलाहाबाद से मैं इतना ही हूँ कि  मेरा बचपन वहाँ का है बाकी मेरा साहित्यिक बचपन दिल्ली का है।
दिल्ली का अनुभव कैसा रहा  ?
दिल्ली में हमलोग 1959 में आ गये थे। शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में ही हुई। पाँचवी क्लास के बाद मेरे जीवन में जरा सा परिवर्तन आया जब पिताजी को लगा कि इसे अच्छी तरह शिक्षा दी जाये तो उन्होंने अंग्रेजी स्कूल में एडमिशन करा दिया। उसके बाद पिताजी आर. के. पूरम की तरफ आ गये और मेरा स्कूल फिर बदल गया।
साहित्य से जुड़ाव कैसे हुआ ?
नौंवी में मेरे एक अध्यापक थे मि. बत्रा। वो अंग्रेजी के प्राध्यापक और बहुत विद्वान व्यक्ति थे। उन्होंने कहा कि मैं स्कूल की एक पत्रिका निकाल रहा हूँ और उन्होंने छात्रों से कहा कि सब लोग लिखो। तब पहली बार मैंने अंग्रेजी में एक कविता लिखी थी। जब वो कविता छपकर आई तो बहुत अच्छा महसूस हुआ। सबलोगों ने बधाई दी तब दिमाग में आया कि मुझे लिखना चाहिए। उसके कुछ समय बाद मैंने छुट्टियाँ नाम से एक कहानी लिखी। इस तरह कुछ और समय बीता और मैंने ग्यारहवीं की परीक्षा दे दी और मेरे पास बहुत सारा समय हो गया। 1966 में  मैंने एक और कहानी लिखी। उसी समय पता चला किसी अखबार में एक विज्ञापन आया था कि खिलते फूल नाम की एक पत्रिका निकल रही है जिसके परामर्शदाता से. रा. यात्री थे तो मैंने उसमे वो कहानी भेज दी और वो छप भी गई।
साहित्य में संवाद परंपरा खत्म होती जा रही है क्यों ?
हाँ, पहले साहित्य में संवाद होता था। हमलोग मिलते थे, बहस होती थी, खूब बातचीत होती थी वो संवाद अब खत्म हो गया है। अब संवादहीनता आ गई है साहित्य में। अगर दिल्ली में गोष्ठियों के चरित्र देखें जायें तो सब एक जैसे ही हैं, पहले से पता होता है कि कौन श्रोता होंगे, कौन वक्ता आदि-आदि। एक तरह से मशीनीकरण हो गया है। एकालाप हो रहा है, संवाद या बहस नहीं। अब सभी चीजें प्रायोजित-सी लगती हैं। साहित्य को जहाँ जीवन मूल्यों से जुड़ना चाहिए था वो जीवनमूल्यों के बजाये मूल्यवान ज्यादा हो गया है।
 एक व्यंग्यकार की नज़र कटाक्ष पर ही क्यों जाती है ?
मेरी नजर विसंगतियों पर पड़ती है, क्योंकि व्यंग्यकार विसंगतियों को ही देखता है और एक सकारात्मक दृष्टि से देखता है। व्यंग्यकार  कोई विशिष्ट जीव नहीं होता,  जो साहित्यकारों के सामाजिक सरोकार हैं वहीं व्यंग्यकारों के भी हैं, बस लिखने का, देखने का दृष्टिकोण अलग है। मान लीजिए एक जुलूस जा रहा है तो उसको सब लोग अगल-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं, उस जुलूस में शामिल मजदूरों के लिये जीवन मरण का प्रश्न है, जिसके खिलाफ जुलूस निकाला गया है उसको लगता है सब लूटेरे हैं, पुलिस वालों को बस ये फिक्र लगी रही रहती कि हमारी ड्यूटी हैं यहाँ पर कोई हंगामा न हो, आस-पास से गुजर रहे लोगों को लगता है कि ट्रैफिक जाम कर दिया तो हर आदमी का दृष्टिकोण है।
व्यंग्य अन्य साहित्यिक विधाओं से अलग कैसे है ?
व्यंग्य का बंधान ही अलग तरह का होता है। अब व्यंग्य को एक अलग स्वरुप मानना शुरू किया गया है। साहित्य अकादमी के कार्यक्रम में पहली बार नित्यानंद तिवारी ने ये बात कही कि व्यंग्य का बंधान अलग होता है। मैं हरिशंकर परसाई की रचनाओं को न तो कहानी के आधार पर कस सकता हूँ न निबंध के आधार पर कस सकता हूँ, क्योंकि उसका बंधान ही अलग है।
आपके लिये व्यंग्य क्या है ?
मैं व्यंग्य  को हथियार के रूप में देखता हूँ। सामाजिक परिवर्तन के हथियार के रूप में। आपके अवसाद से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार व्यंग है। साहित्यकार समाज के आगे चलने वाले मशाल हैं। किताबों और रचनाओं का समाज के योग में महत्वपूर्ण योगदान होता है। गाँधी जी की सोच को बदलने वाली किताबें हीं थीं। तो साहित्य में व्यंग्यकार की अलग भूमिका है। व्यंग्य की मारक क्षमता बनी रहनी चाहिए। व्यंग्य का मतलब हँसाना नहीं है, उसका लक्ष्य है बुराईयों को दिखाना और उस पर प्रहार करना।
आप ईश्वर को किस तरह से देखते हैं ?
मैं ये मानता हूँ कि इतना भी कर्म में विश्वास न करूँ कि अहंकारी हो जाऊँ और इतना भी आस्था में न रहूँ कि कर्महीन हो जाऊँ। आस्था और विश्वास के बिना जीवन में नहीं चल सकते। इनमे संतुलन आवश्यक है। 
हमारा युवा वर्ग बदल रहा है, उसके मूल्य और संस्कार बदल रहे हैं, आप इस स्थिति को किस नज़र से देख रहे हैं?
माँ-बाप को आधुनिक युवा प्रोडक्ट के रुप में समझने लगे हैं। नई पीढ़ी की जिन्दगी से पहले मोहल्ला गायब हुआ, फिर परिवार गायब होने लगे। अब तो हालत हो गई है कि बच्चे भी गायब हो रहे हैं। ये व्यवस्था मशीनीकरण वाली है। आपके पास अपने बच्चे के लिये समय नहीं है लेकिन अगर कंपनी ने कह दिया कि आपको ये काम करना है तो रात के 2 बजे तक वो काम करते रहेंगे। मनुष्य-मनुष्य न रहकर कम्प्यूटर जैसा बनने लगा है। हमारा समय खतरनाक दिशा में जा रहा है। आज पैकेज महत्वपूर्ण है,  न की मानव मूल्य और नैतिक मानदंड। 

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