Friday, 8 August 2014

क्या कार्यस्थल पर आपकी सुरक्षा करता है कानून ?




सोनी किशोर सिंह

महिलाएं न घर में सुरक्षित हैं न बाहर। खासकर भारतीय जनमानस में महिलाओं को लेकर जो दोहरी और कामुक मानसिकता है उससे बाहर निकलने में अभी बहुत वक्त लगनेवाला है। दिनों-दिन बढती हिंसा, बलात्कार, दैहिक प्रताड़ना के कारण महिलाओं को आगे बढ़कर देश के विकास में अपना योगदान में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। अधिकांश नौकरीपेशा महिलाओं को घर की जिम्मेदारी, कार्यस्थल तक पहुँचने और वापस घर आने के बीच होनेवाली परेशानी के अलावा एक मुख्य समस्या है कार्यस्थल पर उनके साथ होनेवाला शोषण। यह शोषण कई स्तरों पर होता है लेकिन हम यहाँ सिर्फ यौन शोषण की बात कर रहे हैं, जिसके चलते महिलाओं की कार्य दक्षता को घटती ही है उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी बुरे तरीके से प्रभावित होता है।
वैसे तो कार्यस्थल पर सेक्शुअल हैरेसमेंट से बचाने के लिये उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 1997 में विशाखा निर्णय के तहत दिशानिर्देश दिये थे लेकिन इनको अमली जामा पहनाने में कहीं कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई दी। नतीजा यह निकला कि सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के संस्थानों में उत्पीड़न होता रहा और महिलायें दिन-ब-दिन असुरक्षित होती गईं।
क्या है विशाखा दिशानिर्देश
राजस्थान के जयपुर के पास भटेरी गांव की महिला भंवरी देवी के साथ वर्ष 1992 में बलात्कार किया गया। इस मामले में कानूनी फैसला आने के बाद विशाखा और अन्य महिला संगठनों ने उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की। इस याचिका में माननीय न्यायालय से आग्रह किया गया कि कामकाजी महिलाओं के बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित कराने के लिए संविधान की धारा 14, 19 और 21 के तहत कानूनी प्रावधान बनाये जाएं। इस मामले में कामकाजी महिलाओं को यौन अपराध, उत्पीड़न और प्रताड़ना से बचाने के लिए कोर्ट ने विशाखा दिशा-निर्देश दिये और अगस्त 1997 में इस फैसले में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की बुनियादी परिभाषाएं दीं।
इसके तहत नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि वह दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करे।
न्यायालय ने 12 दिशानिर्देश बनाये। इसके तहत नियोक्ता या अन्य जिम्मेदार अधिकारी की ड्यूटी है कि वह कार्यस्थल पर सेक्शुअल हैरेसमेंट को रोके। सेक्शुअल हैरेसमेंट के दायरे में छेड़छाड़, गलत इरादे से स्पर्श करना, यौन इच्छा का आग्रह करना, महिला सहकर्मी को पॉर्न दिखाना, अन्य तरह से आपत्तिजनक व्यवहार करना या फिर अश्लील इशारा करना आता है। इन मामलों के अलावा, कोई भी ऐसा ऐक्ट जो आईपीसी के तहत अपराध है कि शिकायत महिला कर्मी द्वारा की जाती है, तो नियोक्ता की ड्यूटी है कि वह इस मामले में कार्रवाई करते हुए संबंधित अथॉरिटी को शिकायत करे।
इन दिशानिर्देशों के तहत न्यायलय ने इस बात को सुनिश्चित किया कि महिलायें अपने कार्यस्थल पर किसी भी तरह से पीड़ित न हो।
इसका उल्लंघन होने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान भी है। प्रत्येक दफ्तर में एक कंप्लेंट कमिटी होगी, जिसकी चीफ महिला होगी। कमिटी में महिलाओं की संख्या आधे से ज्यादा होगी। इसके साथ ही हर कार्यालय को पूरे वर्ष के दौरान ऐसी शिकायतों और कार्रवाई के बारे में सरकार को रिपोर्ट करना होगा। इसके बाद द प्रोटेक्शन ऑफ वुमन फ्रॉम सेक्शुअल हैरसमेंट एट वर्कप्लेस बिल, 2010 लाया गया जिसे 2012 में विधेयत के रूप में पारित किया गया।
यह विधेयक कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा हेतु और भी महत्वपूर्ण है। इससे पहले विशाखा दिशानिर्देश में जो मानक बनाये गये थे उससे कई कदम आगे बढ़कर कार्यस्थल पर महिलाओं की प्रताड़ना रोकने हेतु यह वैधानिक पहल थी। इस बिल में यह निर्धारित किया गया कि तमाम कानूनों के बाद भी अगर कार्यस्थल पर महिला शोषित होती है तो उसे कहां और कैसे अपना विरोध दर्ज कराना है और क्या दण्डात्मक कार्रवाई की जायेगी, इसका भी उल्लेख किया गया। इस बिल की खासियत यह रही कि इसमें हर तरह की कामकाजी महिलाओं को शामिल किया गया, मसलन घरेलु कामगार महिला, नीजि और सरकारी उपक्रमों में काम करने वाली महिला आदि, आदि। इस बिल में साफ तौर पर ये प्रावधान सुनिश्चित किया गया कि कार्यस्थल पर किसी भी तरह के यौन शोषण की जवाबदेही नियोक्ता के साथ जिला कलेक्टर की भी होगी एवं सभी कंपनियों को ऐसी शिकायतों को निबटाने के लिये एक शिकायत सेल का गठन करना होगा। इन कानूनों के अलावा निर्भया काण्ड के बाद बने एण्टीरेप लॉ व भारतीय दण्ड संहिता के तहत बनी अनके धाराओं की सहायता से महिलायें अपनी सुरक्षा कर सकती हैं और अगर वो किसी भी तरह से आंशिक, मौखिक, शारीरिक, सांकेतिक आदि रूप में यौन प्रताड़ित हुई हैं तो वो कानून की शरण ले सकती हैं।
हालांकि इन तमाम कानूनों के बाद भी आये दिन कार्यस्थलों पर शोषण की खबरें आती रहती हैं और उन मामलों का उचित समाधान नहीं हो पाता क्योंकि कानून लागू करने वाली शक्तियां शिथिल हैं और दूसरी तरफ महिलाओं में कानून की जानकारी का अभाव भी है। लेकिन आज जरूरत है कि अपने वैधानिक अधिकारों को समझा जाये और उनका उपयोग किया जाये ताकि कार्यस्थल पर यौन शोषण के आंकड़ों को खत्म किया जा सके और अपराधियों को सजा मिले।

‘श्रवण कुमार’ डॉ. उदय मोदी




सोनी किशोर सिंह

डॉ. उदय मोदी एक बुजुर्ग को खिलाते हुये
दूसरों के दुख दर्द को अपना लेने का दावा बहुत लोग करते हैं लेकिन किसी भूखे को रोटी देना, किसी बीमार का इलाज करवाना, जख्मों पर मरहम लगाना और सबसे बड़ी बात अपनों द्वारा ठुकराये और सताये गये लोगों का सबसे खास और अपना बन जाना काबिले तारीफ है। जिन्दगी की सांझ में मौत का इंतजार कर रहे लोगों का सबसे बड़ा सहारा बनकर दुआयें बटोर रहे ऐसे ही एक शख्स हैं डॉ. उदय मोदी। डॉ. मोदी वो इंसान हैं जो मुंबई के उपनगर मीरा-भायंदर इलाके में तमाम बुजुर्गों को निःशुल्क भोजन, इलाज समेत हर तरह का भावनात्मक संबल भी प्रदान करते हैं। समाज के सच्चे नायक डॉ. मोदी के इस जज्बे की जितनी भी प्रशंसा की जाये वह कम है।
किसी की आँखे अपने बच्चों का इंतजार करते-करते पथरा गई हैं, तो किसी की आँखें हीं नहीं है, किसी के पैरों ने खुद से खड़े होने की हिम्मत खत्म कर दी है, तो कोई डायबिटिज का शिकार है, लेकिन सत्तर पार कर चुके इन तमाम बुजुर्गों का दर्द एक ही है। वह दर्द है बुढ़ापे में अकेले, कमजोर, लाचार और असहाय होने का दर्द। ये वैसे बुजुर्ग हैं जिनके बच्चों ने उन्हें अपने से दूर कर दिया या फिर इनकी सारी सम्पत्ति हड़प कर इन्हें दर-दर भटकने के लिये छोड़ दिया है। ये लाचार-बीमार बुजुर्ग कभी भूख से तड़पते थे तो कभी बुढ़ापे में होने वाली तमाम बीमारियों की वजह से जिन्दगी से हार मान चुके थे। लेकिन कहते हैं कि जब दर्द का अंधेरा बहुत घना हो जाता है तो उम्मीदों का सूरज भी जल्दी निकलता है। इन बुजुर्गों के सूने जीवन को गुलजार किया है डॉ. उदय मोदी ने। डॉ. उदय मोदी श्रवण टिफिन सर्विस के माध्यम से इन बुजुर्गों को निःशुल्क भोजन, उनकी उचित देखभाल, समय-समय पर उनका स्वास्थ्य परीक्षण आदि करते हैं और जीवन से मुंह मोड़ चुके इन बेसहारा माता-पिताओं को जीने की एक नई ललक देते हैं।
5 दिसम्बर 1968 को गुजरात के अमरेली (सौराष्ट्र) में जन्में डॉ. उदय मोदी दो भाई व तीन बहनों में सबसे छोटे हैं। पिताजी हिम्मतलाल मोदी पोस्ट ऑफिस में काम करते थे जबकि माताजी कांता बेन घरेलू कार्यों में व्यस्त रहा करती थीं। डॉ. उदय मोदी ने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया। उनकी माँ ने अपने संघर्ष के बल पर उन्हें पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया। उनका मानना है कि माँ की बदौलत ही वो इस मुकाम पर पहुँचे है जहां वो अन्य माता-पिताओं की सेवा करने में सक्षम हैं। माँ के प्यार, स्नेह और आशीर्वाद का ही फल है कि उन्होंने बुजुर्गों को निःशुल्क भोजन देने वाली अपनी टिफिन सर्विस का नाम श्रवण टिफिन रखा। मोदी बताते हैं कि उनके इस सेवा कार्य में माँ का भरपूर आशीर्वाद ही नहीं है बल्कि सक्रिय सहयोग भी है।
इस सेवा भावना की शुरूआत के विषय में बताते हुये मोदी कहते हैं कि एक दिन मैं अपने क्लीनिक में मरीजों को देख रहा था। तभी एक लकवाग्रस्त बुजुर्ग इलाज के लिए वहां आए। उनकी हालत बहुत खराब थी और जब उन्होंने मुझसे बातों-बातों में बताया कि उनके तीन बेटे हैं और कोई भी उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहता तो मैं विचलित हो गया। उसी वक्त मैंने सोचा कि उनके खाने का इंतजाम मैं करूंगा। यह वर्ष 2009 की घटना थी। बाद में जब मैंने यह बात अपनी पत्नी कल्पना मोदी को बताई तो उन्होंने कहा कि ऐसे बहुत सारे बुजुर्ग होंगे जिनको खाना नहीं मिलता होगा और वो भूख से तड़प-तड़प कर जान देते होंगे और उनके लिये भी कुछ किया जाना चाहिए। तब यहीं से उनके मन में एक टिफिन सर्विस यूनिट शुरू करने का विचार आया। इसके बाद उन्होंने पर्चे छपवा कर और इधर-उधर से पता करके 'मीरा-भयंदर' इलाके में ऐसे बुजुर्गों को ढ़ूंढ निकाला जिनके बच्चों ने उन्हें छोड़ दिया है। पेशे से आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. उदय मोदी ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर 'श्रवण टिफिन सर्विस' की शुरुआत की। इसके लिए उन्होंने अपने स्व. पिता के नाम पर हिम्मतलाल हरजीवनलाल मोदी चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की। इस टिफिन सर्विस में आठ चपाती, दो सब्जी, दाल, चावल और अचार होता है। रविवार के दिन इस टिफिन के साथ बुजुर्गों की पसंद और सेहत के हिसाब से नमकीन और स्वीट्स भी दिया जाता है। मधुमेह के रोगियों के लिए डॉ. मोदी अलग से कम नमक व तेल से बना स्वास्थ्यवर्धक भोजन तैयार करवाते हैं। आज तकरीबन 165 लोगों को हर रोज भोजन करा रहे डॉ. उदय मोदी को इस बात का दुख है कि अभी भी लगभग 72-75 ऐसे बुजुर्ग इस इंतजार में हैं कि उन्हें भी श्रवण टिफिन मिले, लेकिन पैसों के अभाव में डॉ. मोदी विवश हैं।  
हालांकि वो तमाम बुजुर्ग जो डॉ. मोदी की वजह से भोजन पा रहे हैं वो उनको असीम शुभकामनायें और दुआएं देते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि डॉ. मोदी हर हफ्ते उनका स्वास्थ्य परीक्षण करते हैं और उचित दवाइयां देते हैं। साथ ही मधुमेह के रोगियों का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। डॉ. उदय मोदी के इस सेवा मिशन में हर महीने एक अच्छी खासी रकम खर्च होती है लेकिन आर्थिक तंगी कभी भी उन्हें अपने इरादों से डिगा नहीं पायी। भविष्य की योजना पूछने पर डॉ. मोदी कहते हैं कि उनका एक ही सपना है कि वो एक ऐसा ओल्ड एज होम (वृद्धाश्रम) बनायें जहां एक छत के नीचे ये तमाम लोग बिना किसी दुख-दर्द के खुशी-खुशी अपनी जिन्दगी की शाम गुजार सकें।

दर्द भरी शाम और अम्मा


सोनी किशोर सिंह
हमें किसी ने बताया था कि मुम्बई के उपनगर मीरा-भायंदर में सैंकड़ों बुजुर्गों की भूख और बीमारी के कारण बदतर स्थिति है। ये ऐसे सताये हुये माता-पिता हैं जिनके बच्चे नहीं है या फिर जिनके बच्चों ने उनकी सारी सम्पत्ति हड़प कर दर-ब-दर कर दिया है। जांच-पड़ताल के बाद उम्मीद का एक सूरज डॉ. उदय मोदी के रूप में दिखा जो ऐसे तकरीबन 165 बुजुर्गों को निःशुल्क भोजन कराते हैं और उनके इलाज की व्यवस्था भी करते हैं, लेकिन सैंकड़ों बुजुर्ग अब भी किसी श्रवण के इंतजार में हैं जो इनको दो वक्त की रोटी मुहैया करा सके। सत्तर पार इन बुजुर्गों को देखने वाला कोई नहीं है न सरकार न कोई स्वयंसेवी संस्था। ये इंतजार में हैं तो सिर्फ अपनी मौत के, लेकिन मौत भी इनसे रुठकर इन्हें बेबसी के दिन दिखाने को मजबूर कर रहा है। उस रोज हम इन बुजुर्गों और डॉ. मोदी से मिलने निकले और एक भयावह सच और दर्द लेकर वापस लौटे........  
शाम गहराती जा रही थी, हमलोग डॉ. उदय मोदी के क्लीनिक से निकल कर, कई गली पार कर चुके थे। हमारे गाईड भारत पटेल एक संकरी गली में घुसे। एक छोटे से घर के पास जाकर रूक गये। भारत जी बोले यही घर है उनका लेकिन अभी नहीं मिल सकते वो पूजा कर रही हैं और उनके पति बीमार खाट पर पड़े हैं। मैंने अंदर जाने की जिद की और उनके मना करने के बावजूद जबर्दस्ती बिना इजाजत के उस कमरे में घुसी। बमुश्किल दस बाई छह का कमरा होगा। मुश्किल से सांस ली जा सके शायद उतनी ही हवा थी उस कमरे में। एक सत्तर पार बुढ़ी औरत सिर झुकाये स्टोव पर कुछ पका रही थी। बगल में एक बुजुर्ग नीम बेहोशी की हालत में पड़े थे। मैंने बुढ़ी माई के पास धीरे से जाकर कहा कि आपसे मिलने आये हैं, तो वो अचकचा कुछ बोलीं। मैं जैसे ही उनके पास जमीन पर बैठी उन्होंने मेरा हाथ थाम लिया। ऐसा लगा कि मैंने गर्म तवे को छू लिया। लेकिन उस आंच में झुलसने के सिवा कोई चारा नहीं था। मैंने मजबूती से उनका हाथ थाम लिया और आहिस्ता से पूछा आपको तो बहुत तेज बुखार है दवा ली है आपने ?  उन्होंने कुछ अस्पष्ट भाषा में कहा- तबतक भारत और मेरे साथी पत्रकार आशुतोष मेरे बगल में आ चुके थे। भारत ने उनकी टूटी-फूटी गुजराती को अपनी मराठी मिश्रित हिन्दी के साथ अनुवाद करके बताया। एक तरफ गर्म हथेलियों की तपिश के साथ बुढ़िया माई के आँसू मुझे पिघला रहे थे तो दूसरी तरफ भारत के अनुवादित शब्द कानों में गर्म शीशा उड़ेल रहे थे। उनके बच्चों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया था। स्टोव पर वो जरा सा चावल पका रही थीं। वो कह रही थी कि पेट की आग बुझाने के लिये खाना तो बनाना ही पड़ेगा। अपने बूढ़े पति की तरफ इशारा करके वो कह रही थीं- कई दिनों से ऐसे ही पड़े हैं किसी तरह थोड़ी देर के लिये उठाकर खाना खिलाती हूं और ये फिर सो जाते हैं। ये कहते हुए वो बिल्कुल खो जाती हैं यह भूलकर कि वो खुद बुखार से तप रही हैं। सीलन भरे उस कमरे में गर्मी और घुटन महसूस हो रही थी। बदबू से सर फटा जा रहा था लेकिन गर्म हथेलियों को छोड़ने का मन नहीं हो रहा था। उस वक्त ऐसा लग रहा था कि काश उनके लिये कुछ कर पाती और ये ख्याल आते ही मैंने पूछा आपको किसी चीज की जरूरत तो नहीं, वो बोली नहीं बस कुछ देर बैठी रहो, अच्छा लगता है। लेकिन वहां बैठना असहनीय हो रहा था। उनकी बदहाली और लाचारी को देखकर दिल का दर्द दोहरा होता जा रहा था। मैंने बात बदलने की कोशिश करते हुये अपना कैमरा निकालकर पूछा आपकी एक फोटो खींच लूं, वो मुस्कुराने लगीं और अपने फटे हुये कपड़ो की तरफ इशारा करते हुये कहने लगीं ऐसे खींचोगी, ये तो बहुत गंदे, पुराने और फटे हुये हैं, मैंने कहा, कोई बात नहीं आपका मन नहीं है तो नहीं खीचूंगी। मैंने वापस कैमरा अपने बैग में डाल लिया। उनकी आँखों में देखने की बची-खुची मेरी हिम्मत भी जबाव देने लगी थी। मैंने हल्के से हाथ छुड़ाया और फिर मिलने का वादा करके जल्दी से बाहर निकल गई। मुझे पता था मेरी पीठ पर एक जोड़ी आँखें टीकी हैं जो मेरी बात को सच मानकर मेरा इंतजार करेंगी। बाहर निकलते ही मन उदास हो चुका था। साथी पत्रकार आशुतोष जी ने अपनी तरफ से पेशकश की- अम्मां को दवा खरीदकर दे दूं क्या, मैंने कहा- अम्मां को दवा की नहीं खाने की जरूरत है, खाली पेट दवा खिलाने से भला कैसे ठीक होंगी वो... कुछ देर तक हम तीनों चुपचाप चलते रहें। कुछ देर बाद मैंने चुप्पी तोड़ते हुये भारत से कहा- इनको इतना तेज बुखार है आपलोग इलाज नहीं करवाते हैं, भारत ने कहा- करवाते हैं मैडम, लेकिन बुढ़ापे में कुछ न कुछ लगा रहता है। अब पगडंडियों को पार कर हमलोग मुख्य सड़क पर आ चुके थे। भारत ने एक ऑटो को हाथ देकर रुकवाया और हम तीनों उसमें सवार होकर फिर एक दर्द को जीने-समझने निकल पड़े। लगभग 3-4 किलोमीटर के रास्ते को तय करने के बाद ऑटो से उतरकर हम तीनों फिर से एक गली में घुसे। यहां भी भारत हमें रास्ता बता रहे थे। पतली सी गली में जाकर तीसरे मकान के पास भारत ने आवाज लगाई, तो अंदर से आवाज आई- आ जाओ। बाहर से ऐसा लग रहा था कि कोई कबाड़खाना है लेकिन अंदर पहुंचने पर जिन्दगी सिसकती सी दिखाई पड़ी। एक छोटा सा सीलन भरा कमरा। सामान अस्त व्यस्त, गंदे मैले कुचैले कपड़ों में एक बुढ़ी माँ यहां भी थीं, जिन्होंने मुस्कुराते हुये स्वागत किया। आओ बेटा, कहते हुये भी उनके चेहरे की खुशी उनके दर्द को छुपाने में नाकामयाब रही। हमने पूछा- कैसी हैं आप, तो उन्होंने मुस्कुराते हुये ही जबाव दिया, तुम जैसे बच्चों के रहते हुये कोई तकलीफ कैसे होगी। अम्मां की अपनी कोई औलाद नहीं है। भतीजे ने पूरी जिन्दगी की कमाई से खरीदा गया घर जबर्दस्ती अपने नाम करवा लिया। उनके पति बीमार हैं लेकिन जब हमलोग पहुंचे थे तो आस-पास कहीं टहलने के लिये निकले थे। खुद अम्मा बेचारी कहीं नहीं जा पाती क्योंकि उनके पैरों ने काम करना बंद कर दिया है। किसी तरह सहारा देकर अम्मां को फर्श पर से उठाकर बिस्तर पर बैठाया। वो बहुत खुश हो रही थीं। बोलीं भगवान ने कोई औलाद नहीं दी लेकिन उदय मोदी जैसा बेटा दिया है जिसने पूरी जिम्मेदारी निभाई और कभी कोई तकलीफ नहीं होने देता। अम्मां से आधे घंटे बात होती रही। उनकी दर्दभरी जिन्दगी के बीच उनके कहकहे छोटे से घर में माहौल को संजीदा होने से रोक रहे थे लेकिन आंखों की नमी बार बार घर की दीवारों में उतरी नमी से ज्यादा नम दिखाई दे रही थी। इस बार आशुतोष जी ने कहा- चलिये आपकी एक तस्वीर आपकी बेटी के साथ क्लिक करते हैं। अम्मां के मुख पर हज़ारों दिये की रौशनी तैर गई। तुरंत तैयार हो गई। ढ़ेर सारी फोटो अम्मां की खींची हमने। उधर शाम, रात में तब्दील हो गई थी। हमारे निकलने का समय हो रहा था क्योंकि पत्रकारीय दायित्व की समय सीमा कब की खत्म हो चुकी थी, लेकिन मानवीय सरोकार ने हमें रोक रखा था। हम पत्रकार न होकर उस समय अम्मा के बच्चे थे। हमने मुस्कुराते हुये उनसे विदा लिया। अम्मा के साथ भी एक व्यक्तिगत वादा रहा- फिर से लौट कर आने का, फिर से मिलने का, फिर से फोटो खींचवाने का।