सोनी किशोर सिंह
महिलाएं न घर में सुरक्षित हैं न बाहर। खासकर
भारतीय जनमानस में महिलाओं को लेकर जो दोहरी और कामुक मानसिकता है उससे बाहर
निकलने में अभी बहुत वक्त लगनेवाला है। दिनों-दिन बढती हिंसा, बलात्कार, दैहिक
प्रताड़ना के कारण महिलाओं को आगे बढ़कर देश के विकास में अपना योगदान में परेशानी
का सामना करना पड़ रहा है। अधिकांश नौकरीपेशा महिलाओं को घर की जिम्मेदारी,
कार्यस्थल तक पहुँचने और वापस घर आने के बीच होनेवाली परेशानी के अलावा एक मुख्य
समस्या है कार्यस्थल पर उनके साथ होनेवाला शोषण। यह शोषण कई स्तरों पर होता है
लेकिन हम यहाँ सिर्फ यौन शोषण की बात कर रहे हैं, जिसके चलते महिलाओं की कार्य
दक्षता को घटती ही है उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी बुरे तरीके से प्रभावित
होता है।
वैसे तो कार्यस्थल पर सेक्शुअल हैरेसमेंट से बचाने
के लिये उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 1997 में विशाखा निर्णय के तहत दिशानिर्देश दिये
थे लेकिन इनको अमली जामा
पहनाने में कहीं कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई दी। नतीजा यह निकला
कि सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के संस्थानों में उत्पीड़न होता रहा और महिलायें
दिन-ब-दिन असुरक्षित होती गईं।
क्या है विशाखा
दिशानिर्देश
राजस्थान के जयपुर के
पास भटेरी गांव की महिला भंवरी देवी के साथ वर्ष 1992 में
बलात्कार किया गया। इस मामले में
कानूनी फैसला आने के बाद विशाखा और अन्य महिला संगठनों ने उच्चतम न्यायालय में एक
जनहित याचिका दायर की। इस याचिका में माननीय न्यायालय से आग्रह किया गया कि
कामकाजी महिलाओं के बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित कराने के लिए संविधान
की धारा 14, 19 और 21 के तहत कानूनी प्रावधान बनाये जाएं। इस
मामले में कामकाजी महिलाओं को यौन अपराध, उत्पीड़न और प्रताड़ना से बचाने के लिए
कोर्ट ने विशाखा दिशा-निर्देश दिये और अगस्त 1997 में इस फैसले में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की बुनियादी परिभाषाएं
दीं।
इसके तहत नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि वह दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करे।
न्यायालय ने 12 दिशानिर्देश बनाये। इसके तहत नियोक्ता या अन्य जिम्मेदार अधिकारी की ड्यूटी है कि वह कार्यस्थल पर सेक्शुअल हैरेसमेंट को रोके। सेक्शुअल हैरेसमेंट के दायरे में छेड़छाड़, गलत इरादे से स्पर्श करना, यौन इच्छा का आग्रह करना, महिला सहकर्मी को पॉर्न दिखाना, अन्य तरह से आपत्तिजनक व्यवहार करना या फिर अश्लील इशारा करना आता है। इन मामलों के अलावा, कोई भी ऐसा ऐक्ट जो आईपीसी के तहत अपराध है कि शिकायत महिला कर्मी द्वारा की जाती है, तो नियोक्ता की ड्यूटी है कि वह इस मामले में कार्रवाई करते हुए संबंधित अथॉरिटी को शिकायत करे।
इन दिशानिर्देशों के तहत न्यायलय ने इस बात को सुनिश्चित किया कि महिलायें अपने कार्यस्थल पर किसी भी तरह से पीड़ित न हो।
इसके तहत नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि वह दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करे।
न्यायालय ने 12 दिशानिर्देश बनाये। इसके तहत नियोक्ता या अन्य जिम्मेदार अधिकारी की ड्यूटी है कि वह कार्यस्थल पर सेक्शुअल हैरेसमेंट को रोके। सेक्शुअल हैरेसमेंट के दायरे में छेड़छाड़, गलत इरादे से स्पर्श करना, यौन इच्छा का आग्रह करना, महिला सहकर्मी को पॉर्न दिखाना, अन्य तरह से आपत्तिजनक व्यवहार करना या फिर अश्लील इशारा करना आता है। इन मामलों के अलावा, कोई भी ऐसा ऐक्ट जो आईपीसी के तहत अपराध है कि शिकायत महिला कर्मी द्वारा की जाती है, तो नियोक्ता की ड्यूटी है कि वह इस मामले में कार्रवाई करते हुए संबंधित अथॉरिटी को शिकायत करे।
इन दिशानिर्देशों के तहत न्यायलय ने इस बात को सुनिश्चित किया कि महिलायें अपने कार्यस्थल पर किसी भी तरह से पीड़ित न हो।
इसका उल्लंघन होने पर अनुशासनात्मक
कार्रवाई का प्रावधान भी है। प्रत्येक दफ्तर में एक कंप्लेंट
कमिटी होगी, जिसकी चीफ महिला होगी। कमिटी में महिलाओं की संख्या आधे से ज्यादा होगी। इसके
साथ ही हर कार्यालय को पूरे वर्ष के दौरान ऐसी शिकायतों और
कार्रवाई के बारे में सरकार को रिपोर्ट करना होगा। इसके बाद ‘द प्रोटेक्शन ऑफ
वुमन फ्रॉम सेक्शुअल हैरसमेंट एट वर्कप्लेस बिल, 2010 लाया
गया जिसे 2012 में विधेयत के रूप में पारित किया गया।
यह विधेयक कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा हेतु और भी
महत्वपूर्ण है। इससे पहले विशाखा दिशानिर्देश में जो मानक बनाये गये थे उससे कई
कदम आगे बढ़कर कार्यस्थल पर महिलाओं की प्रताड़ना रोकने हेतु यह वैधानिक पहल थी।
इस बिल में यह निर्धारित किया गया कि तमाम कानूनों के बाद भी अगर कार्यस्थल पर
महिला शोषित होती है तो उसे कहां और कैसे अपना विरोध दर्ज कराना है और क्या
दण्डात्मक कार्रवाई की जायेगी, इसका भी उल्लेख किया गया। इस बिल की खासियत यह रही
कि इसमें हर तरह की कामकाजी महिलाओं को शामिल किया गया, मसलन घरेलु कामगार महिला,
नीजि और सरकारी उपक्रमों में काम करने वाली महिला आदि, आदि। इस बिल में साफ तौर पर
ये प्रावधान सुनिश्चित किया गया कि कार्यस्थल पर किसी भी तरह के यौन शोषण की
जवाबदेही नियोक्ता के साथ जिला कलेक्टर की भी होगी एवं सभी कंपनियों को ऐसी शिकायतों
को निबटाने के लिये एक शिकायत सेल का गठन करना होगा। इन कानूनों के अलावा निर्भया
काण्ड के बाद बने एण्टीरेप लॉ व भारतीय दण्ड संहिता के तहत बनी अनके धाराओं की
सहायता से महिलायें अपनी सुरक्षा कर सकती हैं और अगर वो किसी भी तरह से आंशिक,
मौखिक, शारीरिक, सांकेतिक आदि रूप में यौन प्रताड़ित हुई हैं तो वो कानून की शरण
ले सकती हैं।
हालांकि इन तमाम कानूनों के बाद भी आये दिन
कार्यस्थलों पर शोषण की खबरें आती रहती हैं और उन मामलों का उचित समाधान नहीं हो
पाता क्योंकि कानून लागू करने वाली शक्तियां शिथिल हैं और दूसरी तरफ महिलाओं में
कानून की जानकारी का अभाव भी है। लेकिन आज जरूरत है कि अपने वैधानिक अधिकारों को
समझा जाये और उनका उपयोग किया जाये ताकि कार्यस्थल पर यौन शोषण के आंकड़ों को खत्म
किया जा सके और अपराधियों को सजा मिले।
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