Friday, 8 August 2014

‘श्रवण कुमार’ डॉ. उदय मोदी




सोनी किशोर सिंह

डॉ. उदय मोदी एक बुजुर्ग को खिलाते हुये
दूसरों के दुख दर्द को अपना लेने का दावा बहुत लोग करते हैं लेकिन किसी भूखे को रोटी देना, किसी बीमार का इलाज करवाना, जख्मों पर मरहम लगाना और सबसे बड़ी बात अपनों द्वारा ठुकराये और सताये गये लोगों का सबसे खास और अपना बन जाना काबिले तारीफ है। जिन्दगी की सांझ में मौत का इंतजार कर रहे लोगों का सबसे बड़ा सहारा बनकर दुआयें बटोर रहे ऐसे ही एक शख्स हैं डॉ. उदय मोदी। डॉ. मोदी वो इंसान हैं जो मुंबई के उपनगर मीरा-भायंदर इलाके में तमाम बुजुर्गों को निःशुल्क भोजन, इलाज समेत हर तरह का भावनात्मक संबल भी प्रदान करते हैं। समाज के सच्चे नायक डॉ. मोदी के इस जज्बे की जितनी भी प्रशंसा की जाये वह कम है।
किसी की आँखे अपने बच्चों का इंतजार करते-करते पथरा गई हैं, तो किसी की आँखें हीं नहीं है, किसी के पैरों ने खुद से खड़े होने की हिम्मत खत्म कर दी है, तो कोई डायबिटिज का शिकार है, लेकिन सत्तर पार कर चुके इन तमाम बुजुर्गों का दर्द एक ही है। वह दर्द है बुढ़ापे में अकेले, कमजोर, लाचार और असहाय होने का दर्द। ये वैसे बुजुर्ग हैं जिनके बच्चों ने उन्हें अपने से दूर कर दिया या फिर इनकी सारी सम्पत्ति हड़प कर इन्हें दर-दर भटकने के लिये छोड़ दिया है। ये लाचार-बीमार बुजुर्ग कभी भूख से तड़पते थे तो कभी बुढ़ापे में होने वाली तमाम बीमारियों की वजह से जिन्दगी से हार मान चुके थे। लेकिन कहते हैं कि जब दर्द का अंधेरा बहुत घना हो जाता है तो उम्मीदों का सूरज भी जल्दी निकलता है। इन बुजुर्गों के सूने जीवन को गुलजार किया है डॉ. उदय मोदी ने। डॉ. उदय मोदी श्रवण टिफिन सर्विस के माध्यम से इन बुजुर्गों को निःशुल्क भोजन, उनकी उचित देखभाल, समय-समय पर उनका स्वास्थ्य परीक्षण आदि करते हैं और जीवन से मुंह मोड़ चुके इन बेसहारा माता-पिताओं को जीने की एक नई ललक देते हैं।
5 दिसम्बर 1968 को गुजरात के अमरेली (सौराष्ट्र) में जन्में डॉ. उदय मोदी दो भाई व तीन बहनों में सबसे छोटे हैं। पिताजी हिम्मतलाल मोदी पोस्ट ऑफिस में काम करते थे जबकि माताजी कांता बेन घरेलू कार्यों में व्यस्त रहा करती थीं। डॉ. उदय मोदी ने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया। उनकी माँ ने अपने संघर्ष के बल पर उन्हें पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया। उनका मानना है कि माँ की बदौलत ही वो इस मुकाम पर पहुँचे है जहां वो अन्य माता-पिताओं की सेवा करने में सक्षम हैं। माँ के प्यार, स्नेह और आशीर्वाद का ही फल है कि उन्होंने बुजुर्गों को निःशुल्क भोजन देने वाली अपनी टिफिन सर्विस का नाम श्रवण टिफिन रखा। मोदी बताते हैं कि उनके इस सेवा कार्य में माँ का भरपूर आशीर्वाद ही नहीं है बल्कि सक्रिय सहयोग भी है।
इस सेवा भावना की शुरूआत के विषय में बताते हुये मोदी कहते हैं कि एक दिन मैं अपने क्लीनिक में मरीजों को देख रहा था। तभी एक लकवाग्रस्त बुजुर्ग इलाज के लिए वहां आए। उनकी हालत बहुत खराब थी और जब उन्होंने मुझसे बातों-बातों में बताया कि उनके तीन बेटे हैं और कोई भी उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहता तो मैं विचलित हो गया। उसी वक्त मैंने सोचा कि उनके खाने का इंतजाम मैं करूंगा। यह वर्ष 2009 की घटना थी। बाद में जब मैंने यह बात अपनी पत्नी कल्पना मोदी को बताई तो उन्होंने कहा कि ऐसे बहुत सारे बुजुर्ग होंगे जिनको खाना नहीं मिलता होगा और वो भूख से तड़प-तड़प कर जान देते होंगे और उनके लिये भी कुछ किया जाना चाहिए। तब यहीं से उनके मन में एक टिफिन सर्विस यूनिट शुरू करने का विचार आया। इसके बाद उन्होंने पर्चे छपवा कर और इधर-उधर से पता करके 'मीरा-भयंदर' इलाके में ऐसे बुजुर्गों को ढ़ूंढ निकाला जिनके बच्चों ने उन्हें छोड़ दिया है। पेशे से आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. उदय मोदी ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर 'श्रवण टिफिन सर्विस' की शुरुआत की। इसके लिए उन्होंने अपने स्व. पिता के नाम पर हिम्मतलाल हरजीवनलाल मोदी चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की। इस टिफिन सर्विस में आठ चपाती, दो सब्जी, दाल, चावल और अचार होता है। रविवार के दिन इस टिफिन के साथ बुजुर्गों की पसंद और सेहत के हिसाब से नमकीन और स्वीट्स भी दिया जाता है। मधुमेह के रोगियों के लिए डॉ. मोदी अलग से कम नमक व तेल से बना स्वास्थ्यवर्धक भोजन तैयार करवाते हैं। आज तकरीबन 165 लोगों को हर रोज भोजन करा रहे डॉ. उदय मोदी को इस बात का दुख है कि अभी भी लगभग 72-75 ऐसे बुजुर्ग इस इंतजार में हैं कि उन्हें भी श्रवण टिफिन मिले, लेकिन पैसों के अभाव में डॉ. मोदी विवश हैं।  
हालांकि वो तमाम बुजुर्ग जो डॉ. मोदी की वजह से भोजन पा रहे हैं वो उनको असीम शुभकामनायें और दुआएं देते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि डॉ. मोदी हर हफ्ते उनका स्वास्थ्य परीक्षण करते हैं और उचित दवाइयां देते हैं। साथ ही मधुमेह के रोगियों का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। डॉ. उदय मोदी के इस सेवा मिशन में हर महीने एक अच्छी खासी रकम खर्च होती है लेकिन आर्थिक तंगी कभी भी उन्हें अपने इरादों से डिगा नहीं पायी। भविष्य की योजना पूछने पर डॉ. मोदी कहते हैं कि उनका एक ही सपना है कि वो एक ऐसा ओल्ड एज होम (वृद्धाश्रम) बनायें जहां एक छत के नीचे ये तमाम लोग बिना किसी दुख-दर्द के खुशी-खुशी अपनी जिन्दगी की शाम गुजार सकें।

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