सोनी किशोर सिंह
अक्सर
महिलाओं के शारीरिक स्वास्थ्य के बजाए उनके मेकअप और रूप रंग को निखारने के लिए ही
मीडिया और विज्ञापन एजेंसियां कसरत करती रहती हैं। इस दौड़ में टीवी सीरियल,
फिल्में और खुद महिलाएं भी आगे रहती हैं। “महिला स्वास्थ्य” महिला सशक्तिकरण की बुनियाद है लेकिन इसकी अनदेखी कर
सशक्तिकरण का आधार साज-श्रृंगार और बोल्डनेस को बना दिया गया है। एक शोध के अनुसार
लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया और 70 प्रतिशत कुपोषण की शिकार हैं। वरिष्ठ
लेखिका मृणाल पांडे का कहना है कि महिला स्वास्थ्य का एक अहम हिस्सा है प्रजनन
स्वास्थ्य, जिस पर अबतक बहुत झिझक और दबे स्वरों में ही चर्चा होती रही है,
किशोरियों से घरवालों को प्रजननांगों, माहवारी, सहवास या गर्भधारण जैसे मसलों पर
चुप्पी और संकोच बरतने की उम्मीद रहती है। लिहाजा उनको न तो घर पर अपनी माताओं से
और न ही स्कूल में शिक्षिकाओं या सहेलियों से प्रजननांगों, उनके महत्व या संक्रमण
पर कोई सटीक जानकारी मिल पाती है, गंदे सैनीटरी नैपकिन के प्रयोग से और निजी साफ
सफाई की उपेक्षा से कई किशोरियां लंबे समय तक चुपचाप तकलीफदेह संक्रमण झेलती रहती
हैं। हाल के दिनों में इन मसलों पर चुप्पी टूटती दिख रही है, जो एक शुभ लक्षण है।
पहले सैनिटरी पैड्स के विज्ञापन आने शुरू हुए फिर सोशल मीडिया के मार्फत ध्यान
खींचने की कोशिश की गई।

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