Sunday, 23 August 2015

माउंटेन मैन मांझी

सोनी किशोर सिंह

फिल्म मांझी द माउंटेन मैन एक सतही फिल्म है। हालांकि समीक्षको ने इसे काफी सराहा लेकिन 22 वर्षों की कठिन तपस्या को केतन मेहता एक फिल्मी ड्रामे के अलावा और कुछ नहीं बना पाये। अगर नवाजुद्दीन के शानदार अभिनय और राधिका आप्टे की चपलता को छोड़ दिया जाए तो फिल्म में कोई रस, कोई स्तर और कोई मौलिकता नहीं बचती। ऐसा लगता है कि प्रेरणादायी मील के पत्थर दशरथ मांझी को फिल्म में उतारने से पहले निर्देशक ने कोई होमवर्क नहीं किया। जो किस्से-कहानियां अखबारों की कतरनों, चैनलों के फुटेज से मिले उनपर फिल्म बनाकर वाहवाही लूटने की होड़ में कूद पड़े। किसी भी शख्सियत को फिल्म में उतारने से पहले रिसर्च की जरूरत पड़ती है लेकिन असल ज़िन्दगी के नायक को पर्दे पर उतारने के समय केतन मेहता ने ज्यादा मेहनत नहीं की। फिल्म में कई चीजें बुरी तरह खटकती हैं जो दशरथ मांझी से खुद को कनेक्ट कर पाने से रोक देती हैं। फर्स्ट हाफ तक तो लगता ही नहीं है कि हम बिहार के मुसहर जाति के लोगों को देख रहे हैं। साफ सुथरे घर, नये गमछे, अति ड्रामा करने वाले लोग...और तो और दशरथ जब कई साल के बाद अपने घर आता है तो उसके पिता जो अति गरीबी में है वो नई खाट पर सो रहे हैं। काश कोई केतन मेहता को ये समझा पाता कि मुसहरों के घर न उतने साफ-सुथरे होते हैं न सब के सब गमछा रखते हैं, अगर रखते भी हैं तो मैला कुचैला सा। औरतें भी इतनी साफ-सुथरी की मुसहर जाति की विपन्नता, उनके दुख आदि को महसूस करने के बजाए लोग चुटीले संवादों पर हँसते नजर आते हैं। हाँ सेकेंड हाफ जरा सा बेहतर है लेकिन जैसे ही दशरथ के संघर्ष और उनके महान काम को देख-देख कर मन वाह! कहने को होता है केतन रोमांस की छौंक मार देते हैं और सब गुड़-गोबर हो जाता है। यह सही है कि दशरथ मांझी ने अपनी पत्नी के प्रेम में पहाड़ काटकर रास्ता बना दिया तो फिल्म में इस अथक परिश्रम और बुलंद हौसले को रेखांकित करना था न कि हर पाँच-सात मिनट के बाद दशरथ को फगुनिया के साथ रोमांस करते दिखाना। इससे फिल्म की गंभीरता, रुहानियत, कनेक्टिविटी तो कम हुई ही एक महान इंसान के महान काम को महज फिल्म की तरह देख कर थियेटर से निकल जाने का मलाल भी होता है।

फिल्म में अगर नवाज के उम्दा अभिनय को छोड़ दें तो यह कहीं से प्रभावित नहीं करती। केतन आपको कम से कम दशरथ के 22 सालों की तपस्या को देखते हुए और होमवर्क करना चाहिए था ताकि मेरे जैसे बिहारी अपने प्रदेश की इस महान विभूति पर बनी फिल्म को देखकर गर्व महसूस करते। फिल्म को आपने फिल्म ही बना दिया अगर उसे ज़िन्दगी बनाते तो लोग थियेटर से यह हौसला लेकर निकलते कि हमें भी कुछ महान करना है, दशरथ मांझी की तरह।  

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