Friday, 10 April 2015

जब सरकारें दर्द देने लगें......


सुप्रीम कोर्ट ने दो दशक पहले हर राज्य सरकार को ये हिदायत दी थी कि वे बलात्कार पीड़ित महिलाओं के लिए हर्जाने की योजना बनाएं। इस उद्देश्य के लिए केन्द्र ने करोड़ों रूपये आवंटित भी किए लेकिन पीड़िताएं अभी भी आर्थिक सहायता के लिए संघर्ष करती दिखाई देती हैं। दो दशकों बाद कई राज्य सरकारों ने इस योजना को अमली जामा पहनाया है। फिलहाल कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 357ए के तहत हर राज्य सरकार के लिए यह अनिर्वाय है कि वह केन्द्र सरकार के साथ मिलकर पीड़ितों के हर्जाने की योजना बनाएं, जिसके तहत उन्हें मुआवजा दिया जा सके। हालांकि यौन हमलों और एसिड अटैक को लेकर देश के सभी राज्यों ने सर्वाइवर कंपन्सेशन स्कीम (पीड़ित मुआवजा योजना) बनाई तो है लेकिन चीजें बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रही हैं।
दिल्ली
अगर बात करें राजधानी दिल्ली की तो डेल्ही विक्टिम कंपन्सेशन स्कीम, 2011 के तहत बलात्कार पीड़िताओं को 3 लाख तक का मुआवजा दिए जाने का प्रावधान है। लेकिन सच्चाई ये है कि एक तो पीड़िता को यह मालूम ही नहीं होता कि उनके लिए किसी मुआवजे का प्रावधान भी है तो दूसरी तरफ अगर उन्हें पता भी हो तो उन्हें मुआवजे के लिए कठिन प्रक्रिया से गुजरना होता है। पिछले तीन वर्षों में सरकार के 15 करोड़ के निर्धारित फंड में से सिर्फ 2 करोड़ रूपये का ही भुगतान किया गया है। दिलचस्प ये है कि सिर्फ 361 प्रकरणों में मुआवजे के आदेश दिए गये और मात्र 91 प्रकरणों में मुआवजा दिया जा सका। क्या और किन कारणों से मुआवजा पीड़िताओं तक नहीं पहुँचा यह प्रशासनिक पेचिदगियों में उलझ सकता है लेकिन रेप सिटी दिल्ली को अगर मानवीय पहलू के आधार पर देखा जाए तो यह संवेदनहीनता की हद है...।  
महाराष्ट्र
अगस्त 2013 में मुंबई में हुए शक्ति मिल सामूहिक बलात्कार कांड के बाद महाराष्ट्र राज्य मंत्रिमंडल ने मनोधैर्य योजना को मंजूरी दी थी, जिसके अन्तर्गत बलात्कार की शिकार महिलाओं व सेक्सुअल दुर्व्यवहार से पीड़ित बच्चों को चिकित्सकीय, कानूनी व आर्थिक मदद के साथ उनके पुनर्वास और काउंसलिंग की व्यवस्था का प्रावधान किया गया था। योजना के तहत पीड़िता को 2-3 लाख के बीच का मुआवजा देना भी तय हुआ। महाराष्ट्र की मनोधैर्य योजना देश में इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि किस तरह बलात्कार पीड़ितों के हर्जाने के मुद्दे से प्रभावकारी ढ़ंग से निपटा जा सकता है। इस योजना के तहत अभीतक लगभग 600 पीड़ितों को मुआवजा मिल चुका है। मुआवजे की पूरी प्रक्रिया स्वचलित है। एफआईआर दर्ज कराने के साथ ही पूरा सिस्टम सक्रिय हो जाता है और पीड़िता को मुआवजे की राशि का 50 फीसदी हिस्सा मिल सकता है और बची हुई राशि चार्जशीट दाखिल होने के बाद मिलती है।  
कर्नाटक
कर्नाटक ने केन्द्र सरकार के साथ मिलकर वर्ष 2011 में विक्टिम कंपन्सेशन स्कीम बनाई थी। वर्ष 2012 में उसमें कुछ संशोधन भी किया लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि वर्ष 2012-13 के लिए सरकार द्वारा आवंटित 1 करोड़ की राशि में से मात्र 25 लाख को मुआवजे के तौर पर बाँटा गया और बची हुई राशि को रद्द कर दिया गया।
पश्चिम बंगाल
राज्य में विक्टिम कंपन्सेशन स्कीम के तहत किसी को कोई मुआवजा नहीं दिया गया क्योंकि इसके लिए राशि ही आवंटित नहीं की गई है। प्रशासन का कहना है कि मुआवजे के लिए विस्तृत दिशा निर्देश अबतक नहीं बनाए गए हैं इसलिए अबतक इस योजना के तहत किसी की मदद नहीं की गई है। 

साभार फेमिना पत्रिका

Wednesday, 3 September 2014

उम्र नहीं बाधा- डॉ. सुशील मदान



सोनी किशोर सिंह

डॉ. सुशील मदान
जब जिन्दगी अपने आखिरी पड़ाव पर हो और उत्साह बालपन की ठिठोलियों में मशगूल तो जीवन का आनंद कई गुणा बढ़ जाता है। धीरे-धीरे बुढ़ापा को झेलने की मजबूरी में कुढ़ते-चिढ़ते वृद्धों में अगर बाल सुलभ जीवन संचार हो जाये तो जीवन का अंत बहुत सुखमय होता है। जो बुजुर्ग जीवन के तमाम झंझावातों को हँसी खुशी झेल लेते हैं वो बुढ़ापे में भले ही शरीर से लाचार हो जायें, लेकिन अगर उनका मन मस्तिष्क सक्रिय और समाजोपयोगी बना रहे तो वो अपनी वृद्धावस्था को भी उपयोगी बना लेते हैं।
जब जीवन उत्साह से लबालब हो तो उम्र कोई बंदिश नहीं लगा पाता। तमाम शारीरिक, मानसिक व्याधियों पर इंसान विजय प्राप्त कर लेता है। बुढ़ापे को अभिशाप समझने वाले बुजुर्ग अगर अपनी खूबियों को पहचानकर उन्हें विकसित और संवर्धित करते रहे तो जीवन के अंत में भी वो समाज और लोगों के लिये बहुत महत्वपूर्ण रहते हैं। जिन्दगी को इसी जिन्दादिली से जीते हुये उम्र के 78वें वर्ष में भी डॉ. सुशील मदान बेहद सरल, सजग, चुस्त और आशावादी हैं। उनकी व्यस्त दिनचर्या किसी युवा को भी सोचने पर मजबूर कर देगी कि जीवन का प्रत्येक पल कैसे उपयोगी बनाया जाये। पेशे से बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सुशील मदान वृद्धावस्था में किसी पर बोझ नहीं है बल्कि वो उन तमाम असहायों की मुफ्त चिकित्सा और भोजन आदि की व्यवस्था करती हैं जो उनके पास जाकर अपनी तकलीफ बताते हैं।
प्रख्यात चिकित्सक और कर्मठ समाजसेवी
डॉ. सुशील मदान वो शख्सियत हैं जिन्होंने पिछले कई दशकों तक नई दिल्ली और कोलकाता के अस्पताल में बच्चों का इलाज किया साथ ही मेडिकल स्टूडेंट को पढ़ाया भी। प्रो. डॉ. मदान बच्चों के स्वास्थ्य और उनके खान पान को लेकर बहुत सजग हैं। इस वजह से उन्होंने एक किताब भी लिखी है। ग्रोइंग अप नाम की ये किताब स्कूल जानेवाले उन तमाम किशोर बच्चों के स्वास्थ्य संवर्धन के लिये उपयोगी है जो अपनी बढ़ती उम्र में कई प्रकार की शारीरिक, मानसिक, पोषकीय, संवेगात्मक और चिकित्सकीय समस्याओं से जूझते हैं। यह किताब शिक्षकों, माता-पिता और बच्चों तीनों के लिये समान रूप से फायदेमंद है।  
विभाजन का दर्द भी झेला
डॉ. सुशील मदान मूल रूप से सरगोदा (अब पाकिस्तान में) की हैं। जब बँटवारे के समय जगह-जगह भीषण दंगे होने लगे तो डॉ. मदान के माता-पिता ने यह निर्णय लिया कि भारत में जाकर नये जीवन की शुरूआत की जाये। किसी तरह से उनका परिवार जान बचाकर हिन्दुस्तान आया। उनके पिताजी अनाज के व्यापारी थे। पार्टीशन के बाद दिल्ली के करोल बाग में उनलोगों को रहने की जगह मिली लेकिन कारोबार पाकिस्तान में छूट गया था। सबकुछ नये तरीके से व्यवस्थित करना था। बहुत कठिन काम था यह, लेकिन डॉ सुशील मदान के माता-पिता ने हिम्मत नहीं हारी और फिर से शुरूआत की। सुशील मदान कहती हैं कि मेरे माता-पिता बहुत परिश्रमी थे। उन्होंने जीवन को अपनी शर्तों और अपने अनुशासन में बाँधा और मैं भी उनका अनुसरण करती आई हूँ।
दिल्ली की टॉपर
डॉ. सुशील मदान बचपन से कुशाग्र बुद्धि की थीं। वो कहतीं हैं कि विभाजन के बाद दिल्ली तो किसी तरह से पहुँच कर एक छत नसीब हो गई थी, लेकिन इन सबके बीच मेरी पढ़ाई छूट गई। काफी सोच-विचार कर दिल्ली में ही किसी तरह मेरा एडमिशन हुआ। मैं सरगोदा में छठी में थी इसलिये दिल्ली में सातवीं में दाखिला चाहती थी। लेकिन जब स्कूल वालों ने सातवीं के बजाये नवीं में दाखिला दिया तो मजबूरी में उनको एडमीशन लेना पड़ा। तीन महीने बाद ही परीक्षा हुई और दिल्ली में डॉ. सुशील मदान ने टॉप किया। स्कूल के प्रिंसिपल ने बधाई देते हुये कई जगहों पर उनका पोस्टर लगाया। हालाँकि इस बात से उनके पिताजी को परेशानी हुई और उन्होंने कहा कि मेरी बच्ची की तस्वीर को गली मुहल्लों में इस तरह से नहीं लगाना चाहिए। इसके बाद डॉ. मदान की शिक्षा यात्रा आगे बढ़ती गई। सन् 1958 में उन्होंने लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की डिग्री हासिल की।
कदम-कदम पर मिला सहयोग
12 अक्टूबर 1963 को डॉ. सुशील मदान की शादी सुरेन्द्र कुमार मदान से हुई। शादी के बाद वो अपने पति सुरेन्द्र मदान के साथ दिल्ली से कोलकाता चली गई। कोलकाता में उन्होंने एकमात्र चाइल्ड हॉस्पीटल और मेडिकल कॉलेज इन्स्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हर्ट में नौकरी शुरू कर दीं। यहाँ डॉ. मदान पूरी शिद्दत से बच्चों का इलाज तो करती हीं थी साथ ही मेडिकल स्टूडेंट को चाइल्ड हर्ट के बारे में पढ़ाती भी थीं। साथ ही साथ वो ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर वहाँ की स्वास्थ्य समस्याओं से रुबरू होकर लोगों को स्वास्थ्य सुविधायें भी मुहैया करवाती थीं। इन सब कार्यों में उनके जीवन साथी सुरेन्द्र कुमार मदान का हमेशा सहयोग बना रहा। डॉ. मदान कहती हैं कि आगे बढ़ने और सकारात्मकता बढ़ाने में परिवार का सहयोग आवश्यक है और उन्हें पति और बच्चों का भरपूर सहयोग मिला जिससे वो अपने कर्म-पथ पर आगे बढ़ती रहीं।
बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित
डॉ. सुशील मदान कहती हैं कि बच्चों में डायरिया सबसे सामान्य बीमारी है। दूषित पानी की वजह से होने वाली ये बीमारी बच्चों में सबसे ज्यादा होती है। इसके अलावा ब्रोंकाइटिस, न्यूमोनिया वगैरह बीमारियाँ होती हैं। हालाँकि उन्हें खुशी है कि अपने देश में पोलियो का उन्मूलन हो गया है।
बुढापे को दिया मात
डॉ. सुशील मदान आज भी रोजाना खुद खाना बनाती हैं, मॉर्निंग वॉक करती हैं, कई राष्ट्रीय-अतर्राष्ट्रीय जर्नल पढ़ कर स्वास्थ्य समस्याओं का विश्लेषण करती हैं। लेकिन इन सबके साथ जो सबसे महत्वपूर्ण काम है वो है मरीजों का निःशुल्क इलाज। डॉ. मदान की सेवा भावना इतनी प्रबल है कि कई बार वो मरीजों की दवाईयाँ और खाने का इंतजाम भी करती हैं।
खुशहाल दंपत्ति
एक ओर आज जहाँ एकल परिवार भी टूट की कगार पर है, वहाँ पर मदान दंपत्ति का जीवन एक मिसाल है। दोनों ने एक दूसरे को बखूबी समझा है। अगर कोई नाराज हो जाता है तो उसकी नाराजगी को दूसरा सम्मान करता है। एक-दूसरे को सम्मानित दृष्टि से देखने की कला के कारण ही आज मदान दंपत्ति इतनी खुशहाल हैं।
सूत्र वाक्य
डॉ. सुशील मदान कहती हैं कि लाइफ इज ब्यूटीफुल बट लाइफ इज स्ट्रगल। आपको लगातार बाधायें पार करनी होगी। आपके पास इच्छा शक्ति होनी चाहिए इन तमाम परेशानियों से छुटकारा पाकर जिन्दगी जीने का।
 आज भी याद है वो कत्लेआमः सुरेन्द्र कुमार मदान
उस वक्त हमलोग लाहौर में थे। मेरे पिताजी ब्रिटिश आर्मी में डॉक्टर थे और सिंगापुर हॉस्पीटल में उनकी तैनाती थी। सन् 1943-44 में वहाँ उनकी मौत हो गई लेकिन ब्रिटिश सरकार ने हमलोगों को कोई सूचना नहीं दी। हमलोग इस सदमे से अभी उबरे भी नहीं थे कि बँटवारे की घोषणा हो गई और रक्तेआम शुरू हो गया। परिवार और रिश्तेदार के ढ़ेर सारे लोग मारे गये। मैं और मेरी माँ किसी तरह से बचते-बचाते हिन्दुस्तान पहुँचे। अमृतसर पहुँचने का वो एक घंटे का रास्ता 44 घंटे में खत्म हुआ। अमृतसर पहुँचने तक ट्रेन के अधिकांश मुसाफिर कत्ल कर दिये गये थे। पर मैं अपनी माँ के साथ किसी तरह सुरक्षित पहुँच गया था। 14 साल की उम्र रही होगी मेरी। इसलिये वो मौत का सफर हमेशा जेहन में बैठा रहा। मुझे याद है अमृतसर में कुछ दिन रहने के बाद हमलोग अम्बाला पहुँचे। वहाँ हमारी एक आंटी थी। उनके पास एक रूम था जहाँ कई रिश्तेदार रहते थे। वहाँ रोड के किनारे एक छोटा सा बल्ब लगा था उसी की रोशनी में ढ़ेर सारे बच्चे पढ़ते थे। पानी के एक नलके के पास लम्बी लाइन लगी रहती थी।

मैं कविता को जीता हूँ- विमलेश त्रिपाठी



सोनी किशोर सिंह

विमलेश त्रिपाठी
शब्दों में ही खोजूँगा
और पाऊँगा तुम्हें
 
वर्ण-वर्ण जोड़कर गढूँगा
बिल्कुल तुम्हारे जितना ही सुन्दर
एक शब्द
और
आत्मा की संपूर्ण शक्ति भर
फूँक दूँगा निश्छल प्राण
जीवंत कर तुम्हें
कवि हो जाऊँगा….
युवा कवि और कथाकार विमलेश त्रिपाठी की ये पंक्तियाँ इस बात को रेखांकित करती हैं कि इसके रचयिता न सिर्फ कविता को जीते-समझते हैं बल्कि शब्दों में प्राण भरकर दूसरों के लिये भी संजीवनी देते हैं। बिहार के बक्सर जिले के हरनाथपुर गांव में 7 अप्रैल 1979 को जन्में विमलेश ने बहुत कम समय में साहित्य के क्षेत्र में एक मजबूत उपस्थिति दर्ज की है। कविता और कहानी में समान रूप से सक्रिय विमलेश की रचनायें देश के लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, साथ ही इन्हें युवा शिखर सम्मान, भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार, ठाकुर पूरण सिंह स्मृति सूत्र सम्मान, राजीव गांधी एक्सीलेंट एवॉर्ड एवं भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार समेत अनेक सम्मानों से नवाजा जा चुका है। विमलेश का कविता संग्रह हम बचे रहेंगे, एक देश और मरे हुये लोग तथा कहानी संग्रह अधूरे अंत की शुरुआत विशेष रूप से चर्चित रही और लोगों ने इसे काफी सराहा।
विमलेश त्रिपाठी की रचनाशीलता, जीवन संघर्ष तथा उनके सामाजिक सरोकारों के बारे में संस्कार पत्रिका ने उनसे लम्बी बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत का संपादित अंश-
कहते हैं कि बचपन की यादें कभी धुंधली नहीं पड़ती, आपका बचपन कैसा रहा ? 
मेरा बचपन गाँव में बीता। पिताजी काशीनाथ त्रिपाठी और माताजी गायत्री देवी का भरपूर स्नेह मिला, लेकिन बचपन में मैं बहुत जिद्दी और शरारती था। एक घटना अभी तक याद है, एक बार पिताजी शहर से हनुमान चालीसा की एक पुस्तक लेकर आए। मैं और हमारे बड़े भाई में लड़ाई होने लगी कि उस पुस्तक को कौन लेगा। पिताजी ने शर्त लगाई कि जो सुबह उठकर नहा-धोकर हनुमान चालीसा का पाठ कर लेगा, यह पुस्तक उसी की हो जाएगी और मैंने वह कर लिया था। अब बड़े भाई नहीं हैं तो इस घटना की याद कई बार मुझे उद्वेलित कर जाती है। पहली कक्षा से पाँचवी तक की पढ़ाई गाँव में हुई। इसके बाद बाबा ने मुझे पढ़ने के लिए शहर भेज दिया। मेरे पिता कोलकाता में रेलवे में काम करते थे तो मैं कोलकाता आ गया और बाकी की सारी पढ़ाई-लिखाई कोलकाता शहर में ही हुई। गाँव के छूटने का एक दर्द मेरे अंदर खूब गहरा रहा जो मेरे पहले कविता संग्रह हम बचे रहेंगे में दिखायी पड़ता है। यह गाँव की स्मृतियाँ ही हैं जो सबसे पहले मेरी रचना (कविता) की भूमिका बनीं। मैं जब तक गाँव में रहा पढ़ाई के साथ खेती-बाड़ी से भी जुड़ा रहा। जब शहर आया तो गाँव की याद बहुत आती थी, मैं अकेले में बैठकर खूब रोता था। मेरे गाँव का छूटना मेरे जीवन की एक बड़ी घटना थी। उसका प्रभाव इतना व्यापक है कि आज भी मेरी रचनाओं में गाँव की गूँज सुनायी पड़ती है।
तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि लेखन की पृष्ठभूमि गाँव में ही तैयार हो गई ?
कुछ हद तक यह बात सही है। दरअसल, बचपन से ही साहित्य से लगाव रहा। लेकिन साहित्य के नाम पर गाँव में मेरा परिचय सिर्फ रामचरित मानस के साथ ही हो सका। इसके अलावा पाठ्य पुस्तक की कहानियाँ और कविताएं आकर्षित करती थीं। लेखन की शुरूआत कक्षा दसवीं-ग्यारहवीं से हुई जब मैं कुछ तुकबंदिया करने लगा था। लेकिन विधिवत लेखन तब शुरू हुआ जब समकालीन साहित्य से मेरा परिचय हुआ, वह विश्वविद्यालयीन समय था। उस समय तक मैं कविताएं लिखने लगा था। हां, वे कविताएं मैंने छपने के लिए नहीं भेजीं। पहली बार मेरी तीन कविताएं कोलकाता से प्रकाशित होने वाली पत्रिका वागर्थ में 2003 में छपीं।
उत्तर भारत में आमतौर पर सरकारी नौकरी को तरजीह दी जाती है, ऐसे में जब आपने लेखन को अपनाया तो घरवालों की प्रतिक्रिया किस तरह की रही।
मेरे पिता चाहते थे कि मैं आइएएस बनूँ। खुद मैंने भी इस सपने को लेकर बहुत मेहनत की लेकिन एक समय के बाद लगा कि आइएएस बनना मेरे स्वभाव में नहीं है। अगर मैं आइएएस बन भी जाता तब भी साहित्य का नाता मुझसे नहीं टूटता। बाद में एक ऐसा समय आया जब अध्यापन की ओर मेरा झुकव हुआ, लेकिन विश्वविद्यालयीन राजनीति की वजह से अध्यापन के क्षेत्र से दूर हूँ। लेखन को चुनना मेरी अपनी पसंद है। घर वाले या आस-पास के लोग लेखन को अच्छी निगाह से नहीं देखते। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था लेकिन जब मुझे ज्ञानपीठ का युवा पुरस्कार मिला और अखबारों में और कई पत्रिकाओं में मेरी तस्वीरें छपीं तो कई लोगों को यह अच्छा लगा। मेरे घर वालों को जो मुझसे शिकायतें थीं वह कम हुईं।
गद्य और पद्य दोनों में आप खुद को किसमें ज्यादा सहज महसूस करते हैं ?
पद्य मेरी रूचि की विधा है। मेरी शुरूआत भी कविता लेखन से ही हुई इसलिए कविता मेरे लिए पहले प्यार की तरह है। गद्य को हमेशा मैंने चुनौती की तरह लिया है। इसलिए मैंने कहानियाँ भी लिखीं और उपन्यास भी। बहुत सारे लोग मुझे अच्छा गद्यकार मानते हैं लेकिन मैं खुद को कवि ही मानता हूं।
हिन्दी साहित्य की क्लिष्टता के कारण युवा इससे नहीं जुड़ पा रहे हैं, क्या किया जाये कि युवाओं में हिन्दी के प्रति आकर्षण बढ़े ?
क्लिष्टता उतनी बड़ी वजह नहीं है जितनी बड़ी वजह इलेक्ट्रनिक मिडिया, टीवी और फिल्में हैं। साथ ही हम अपने बच्चों के मन में शुरू से साहित्य पढ़ने का संस्कार नही डाल पा रहे हैं। मैंने स्वयं साहित्य को सहज बनाने के लिए बहुत काम किया है, मेरा यह मानना है कि साहित्य इतना सरल और सहज हो कि वह आम पाठकों तक अपनी पहुँच बनाए। लेकिन पढ़ने का संस्कार विकसित करना और पढ़ने-लिखने की संस्कृति का विकास तो हमें करना ही होगा।
अन्य साहित्यकारों की तरह आपको भी अपनी रचनाओं में किसी खास रचना के लिये विशेष स्नेह होगा ?
वैसे तो अभी लम्बा सफर तय करना है लेकिन अबतक की रचना प्रक्रिया पर गौर करूं तो सभी में कुछ न कुछ बहुत अच्छा लगता है। अभी-अभी मैंने एक उपन्यास लिखा है – कैनवास पर प्रेम, जो जल्द ही भारतीय ज्ञानपीठ से छपकर आने वाला है। यह संपूर्ण उपन्यास एक ऐसे व्यक्ति की जीवन-कथा है जिसे मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ।  अवश्य ही उसमें कल्पना का योग है लेकिन यह उपन्यास फिलहाल मेरे दिल के बहुत करीब है।
आजकल क्या लिख रहे हैं ?
प्रेम कविताओं का एक संग्रह तैयार किया है जो उजली मुस्कुराहटों के बीच नाम से छपेगा। एक उपन्यास लिख रहा हूँ जो साइबर संसार, संबंधों की जटिलता और साहित्यिक राजनीति पर एक गहन टिप्पणी की तरह है।
समकालीन साहित्यकारों के रचना कर्म पर कुछ कहना चाहेंगे ?
समकालीन रचना कर्म बहुत आश्वस्त करने वाला है। खासकर युवाओं की एक बहुत बड़ी जमात लेखन में सक्रिय है और विभिन्न विषयों पर लगातार लिख रही है। मैं समकालीन रचनाशीलता को सकारात्मक और हसरत भरी दृष्टि से देख रहा हूँ।
धर्म के प्रति आपकी क्या आस्था है ?
मुझे धर्म से परहेज नहीं है। मुझे यह विश्वास है कि धर्म जोड़ने का काम करता है। जो धर्म तोड़ने का काम करे उसे मैं धर्म नहीं मानता। धर्म हमें जीवन जीने की कला सिखाता है और हमें अपने सुमार्ग से भटकने नहीं देता। मेरे लिए धर्म की परिभाषा एक ही है जिसे तुलसी दास ने लिखा है – परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीडा सम नहिं अधमाई।।
संस्कृत भाषा हमारी आदिभाषा और वैदिक संस्कृति को जानने-समझने का सूत्र है, आपका क्या मानना है ?
मुझे याद है कि मैंने बचपन में संस्कृत को ऐच्छिक भाषा के रूप में चुना था। मुझे संस्कृत से आज भी बहुत प्यार है। भारतीय संस्कृति की गहराई को समझने के लिए यह भाषा जरूरी है। हमारे सभी प्राचीन मानक ग्रन्थों की भाषा संस्कृत है, यहाँ तक कि महान साहित्यकार कालिदास ने भी संस्कृत में ही सबकुछ लिखा है। संस्कृत भाषा को बचाए रखना हमारी सभ्यता और संस्कृति की आस्मिता के लिए जरूरी है।
गाय, गंगा और गौरी (कन्या) भारतीय संस्कृति के आधारस्तंभ हैं। इनकी स्थिति को पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिये क्या करना चाहिए ?
सबसे पहले तो हमें अपनी सोच में परिवर्तन लाना होगा। हमें यह समझना होगा कि इन तीनों की कितनी उपयोगिता हमारे समाज में है। इन तीनों के बिना हम अपने समाज की कल्पना नहीं कर सकते। यह अच्छी बात है कि वर्तमान सरकार गंगा के लिए सोच रही है, उसे अन्य चीजों पर भी ध्यान देना चाहिए।

Friday, 8 August 2014

क्या कार्यस्थल पर आपकी सुरक्षा करता है कानून ?




सोनी किशोर सिंह

महिलाएं न घर में सुरक्षित हैं न बाहर। खासकर भारतीय जनमानस में महिलाओं को लेकर जो दोहरी और कामुक मानसिकता है उससे बाहर निकलने में अभी बहुत वक्त लगनेवाला है। दिनों-दिन बढती हिंसा, बलात्कार, दैहिक प्रताड़ना के कारण महिलाओं को आगे बढ़कर देश के विकास में अपना योगदान में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। अधिकांश नौकरीपेशा महिलाओं को घर की जिम्मेदारी, कार्यस्थल तक पहुँचने और वापस घर आने के बीच होनेवाली परेशानी के अलावा एक मुख्य समस्या है कार्यस्थल पर उनके साथ होनेवाला शोषण। यह शोषण कई स्तरों पर होता है लेकिन हम यहाँ सिर्फ यौन शोषण की बात कर रहे हैं, जिसके चलते महिलाओं की कार्य दक्षता को घटती ही है उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी बुरे तरीके से प्रभावित होता है।
वैसे तो कार्यस्थल पर सेक्शुअल हैरेसमेंट से बचाने के लिये उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 1997 में विशाखा निर्णय के तहत दिशानिर्देश दिये थे लेकिन इनको अमली जामा पहनाने में कहीं कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई दी। नतीजा यह निकला कि सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के संस्थानों में उत्पीड़न होता रहा और महिलायें दिन-ब-दिन असुरक्षित होती गईं।
क्या है विशाखा दिशानिर्देश
राजस्थान के जयपुर के पास भटेरी गांव की महिला भंवरी देवी के साथ वर्ष 1992 में बलात्कार किया गया। इस मामले में कानूनी फैसला आने के बाद विशाखा और अन्य महिला संगठनों ने उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की। इस याचिका में माननीय न्यायालय से आग्रह किया गया कि कामकाजी महिलाओं के बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित कराने के लिए संविधान की धारा 14, 19 और 21 के तहत कानूनी प्रावधान बनाये जाएं। इस मामले में कामकाजी महिलाओं को यौन अपराध, उत्पीड़न और प्रताड़ना से बचाने के लिए कोर्ट ने विशाखा दिशा-निर्देश दिये और अगस्त 1997 में इस फैसले में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की बुनियादी परिभाषाएं दीं।
इसके तहत नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि वह दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करे।
न्यायालय ने 12 दिशानिर्देश बनाये। इसके तहत नियोक्ता या अन्य जिम्मेदार अधिकारी की ड्यूटी है कि वह कार्यस्थल पर सेक्शुअल हैरेसमेंट को रोके। सेक्शुअल हैरेसमेंट के दायरे में छेड़छाड़, गलत इरादे से स्पर्श करना, यौन इच्छा का आग्रह करना, महिला सहकर्मी को पॉर्न दिखाना, अन्य तरह से आपत्तिजनक व्यवहार करना या फिर अश्लील इशारा करना आता है। इन मामलों के अलावा, कोई भी ऐसा ऐक्ट जो आईपीसी के तहत अपराध है कि शिकायत महिला कर्मी द्वारा की जाती है, तो नियोक्ता की ड्यूटी है कि वह इस मामले में कार्रवाई करते हुए संबंधित अथॉरिटी को शिकायत करे।
इन दिशानिर्देशों के तहत न्यायलय ने इस बात को सुनिश्चित किया कि महिलायें अपने कार्यस्थल पर किसी भी तरह से पीड़ित न हो।
इसका उल्लंघन होने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान भी है। प्रत्येक दफ्तर में एक कंप्लेंट कमिटी होगी, जिसकी चीफ महिला होगी। कमिटी में महिलाओं की संख्या आधे से ज्यादा होगी। इसके साथ ही हर कार्यालय को पूरे वर्ष के दौरान ऐसी शिकायतों और कार्रवाई के बारे में सरकार को रिपोर्ट करना होगा। इसके बाद द प्रोटेक्शन ऑफ वुमन फ्रॉम सेक्शुअल हैरसमेंट एट वर्कप्लेस बिल, 2010 लाया गया जिसे 2012 में विधेयत के रूप में पारित किया गया।
यह विधेयक कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा हेतु और भी महत्वपूर्ण है। इससे पहले विशाखा दिशानिर्देश में जो मानक बनाये गये थे उससे कई कदम आगे बढ़कर कार्यस्थल पर महिलाओं की प्रताड़ना रोकने हेतु यह वैधानिक पहल थी। इस बिल में यह निर्धारित किया गया कि तमाम कानूनों के बाद भी अगर कार्यस्थल पर महिला शोषित होती है तो उसे कहां और कैसे अपना विरोध दर्ज कराना है और क्या दण्डात्मक कार्रवाई की जायेगी, इसका भी उल्लेख किया गया। इस बिल की खासियत यह रही कि इसमें हर तरह की कामकाजी महिलाओं को शामिल किया गया, मसलन घरेलु कामगार महिला, नीजि और सरकारी उपक्रमों में काम करने वाली महिला आदि, आदि। इस बिल में साफ तौर पर ये प्रावधान सुनिश्चित किया गया कि कार्यस्थल पर किसी भी तरह के यौन शोषण की जवाबदेही नियोक्ता के साथ जिला कलेक्टर की भी होगी एवं सभी कंपनियों को ऐसी शिकायतों को निबटाने के लिये एक शिकायत सेल का गठन करना होगा। इन कानूनों के अलावा निर्भया काण्ड के बाद बने एण्टीरेप लॉ व भारतीय दण्ड संहिता के तहत बनी अनके धाराओं की सहायता से महिलायें अपनी सुरक्षा कर सकती हैं और अगर वो किसी भी तरह से आंशिक, मौखिक, शारीरिक, सांकेतिक आदि रूप में यौन प्रताड़ित हुई हैं तो वो कानून की शरण ले सकती हैं।
हालांकि इन तमाम कानूनों के बाद भी आये दिन कार्यस्थलों पर शोषण की खबरें आती रहती हैं और उन मामलों का उचित समाधान नहीं हो पाता क्योंकि कानून लागू करने वाली शक्तियां शिथिल हैं और दूसरी तरफ महिलाओं में कानून की जानकारी का अभाव भी है। लेकिन आज जरूरत है कि अपने वैधानिक अधिकारों को समझा जाये और उनका उपयोग किया जाये ताकि कार्यस्थल पर यौन शोषण के आंकड़ों को खत्म किया जा सके और अपराधियों को सजा मिले।