Friday, 26 April 2013

छुट्टी का एक दिन



वीकली ऑफ
दो महीनों से लगातार काम कर रहा था। हर बार उसका विकली ऑफ कैंसिल हो जाता। कभी लगता कि उसकी किस्मत ही खराब है तो कभी महसूस होता कि उसका सीनियर जानबूझकर उसे परेशान करता है। वह मन मारकर अपने ऑफ वाले दिन ऑफिस जाता। उस दिन पूरी शिफ्ट में वो मनहूस सी शक्ल बनाये रहता। सोचता कोई पूछे तो सही कि क्या बात है तब दिल खोल के रख दे... लानत-मलानत कर दे शिफ्ट इंचार्ज की लेकिन उसकी मंशा पूरी नहीं होती। कोई कुछ पूछता ही नहीं था। बीच-बीच में जैसे ही फुर्सत मिलती पीछे वाली सीट पर उचक के देखता कि हिमांशु क्या कर रहा है, सोचता इसकी तो ऐश है हमेशा छुट्टियाँ करता है और बॉस का सगा भी बना रहता है। वह अपनी दर्द भरी व्यथा लिये टुकुर-टुकुर हिमांशु को एक मिनट तक देखता और हिमांशु महाशय अपने कम्प्यूटर स्क्रीन पर नजरें गड़ाये रहते, कोई भाव ही न देते। वह कुढ़ कर रह जाता। मन में उस चमचे को भद्दी सी गाली देता और होठों पर टोकरी भर मुस्कान सजा के कहता- क्यों भाई हिमांशु बहुत काम में मशगूल दिख रहे हो... जरा हम पर भी ग़ौर फरमा लिया करो। हिमांशु कुछ बोले इससे पहले उसके ऑफिसियल माई-बाप इंचार्ज महोदय अचानक से प्रकट हो जाते- क्यों भाई सारा दिन मटरगस्ती करते रहते हो कभी काम भी कर लिया करो, ऑफ के दिन बुलाया तो इसका ये मतलब थोड़े है कि कामचोरी करो...चलो काम करो। वह मायूस होकर अपनी सीट पर बैठ जाता, सोचता इसको तो मुर्गे की तरह जिबह करना चाहिये और वह कल्पना करने लगता कि शिफ्ट इंचार्ज मुर्गा है और वह कसाई.... छूरा लिये उसके हाथ मुर्गे की गर्दन तक पहुँच रहा है.... मुर्गा फड़फड़ा रहा है.... कुकड़ु कू करके प्राणों की भीख माँग रहा है और वो खुश हो रहा है कि बेटा आज तो तू नहीं बचेगा...ले तू अपनी करनी का फल भुगत... तभी पीठ पर जोर का एक धौल जमाते हुये मुर्गे की आवाज आती है- अबे.... सर जी मैंने कहा काम कर लो यहाँ मुस्कुराने के पैसे नहीं मिलते हैं.... वह चौकन्ना हो जाता- जी सर,,, सॉरी, वो मैं कुछ सोच रहा था...। शिफ्ट इंचार्ज उसके चेहरे को ताड़ते हुये कहता- तू ज्यादा सोचा मत कर.. सोचने के लिये हम बैठे हैं... बड़ा आया सोचने वाला। वह अपनी मुट्ठियों को जोर से भींच लेता... दिल कहता आज इसे अपनी सोच बता ही दे... बताना क्या.. सोच पर अमल ही कर ले,,, फिर दिमाग कहता नहीं.. नहीं खामख्वाह नौकरी जायेगी... इसका क्या है दो-चार दिन बेड रेस्ट करेगा फिर टनाटन ऑफिस आना शुरू... मेरा ही नुकसान होगा...। शिफ्ट इंचार्ज फिर पूछता- ओये मेरे लाल, क्या हो गया, गुस्से में लग रहा है... अरे हिमांशु देख तो जरा सर नाराज हो गये हैं ऑफ वाले दिन जो बुला लिया। हिमांशु उठकर इंचार्ज की खीं...खीं...खीं में शामिल हो जाता है। वो तुरंत अपना बचाव करता है- नहीं सर,,, मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता... घर में बैठे-बैठे बोर ही होता, अच्छा हुआ ऑफिस आ गया। इंचार्ज छूटते ही बोला- भई वाह ये तो अच्छी बात है... सुन अगले महीने हिमांशु को 15 दिन के लिये अपने गांव जाना है,,, तो तू एडजस्ट कर ले जरा... बाद में मैनेज कर लेंगे...। उसका दिल करता है इंचार्ज के सर के सारे बाल नोंच ले और हिमांशु की बत्तीसी उखाड़ ले लेकिन वह खुद अपना सिर पकड़ के बैठ जाता है। 

Monday, 22 April 2013

एक अजनबी यात्रा



चन्द्रमुखी
तकरीबन महीने दो महीने पर उससे बात हो ही जाती थी। हर बार उसका नया अंदाज होता, उसके बात करने का, हँसने का, बोलने का, रूठने का लेकिन वो बेचारा क्या करे उसके मनाने का तरीका एक सा ही होता। उसके घिसे-पिटे डायलॉग सुनकर लड़की और नाराज हो जाती और कहती- तू कभी तो कुछ नया बोलना सीख ले, सालों से तोते की तरह सॉरी बोलना ही सीखा है.... कहीं का। वह मायूस होकर फोन रख देता। दो चार दिन तक उसकी हिम्मत नहीं होती कि वो फोन करे और लड़की की डांट सुने पर पाँचवे दिन से उसका मन कुलबुलाने लगता। वह सोचता लड़की अच्छी है एक बार हाल-चाल ले ही लेता हूँ, पता नहीं कैसी होगी... नाराज भी होती है तो मेरी बेवकूफी की वजह से ही... ऐसे तो ठीक ही बोलती है.... उससे क्या ईगो रखना.... वह तरह-तरह की बात सोच कर खुद को दिलासा देता और महीने-डेढ़ महीने बाद लड़की की घुड़कियां सुनने के लिये मानसिक रूप से तैयार हो जाता।
यह सिलसिला सालों से चलता आ रहा था। वह फोन करता, लड़की डांटती, गुस्से में फोन पटक देती, वह मायूस होता, मन ही मन खुद को कोसता लेकिन फिर खुद ही मानकर दुबारा से फोन कर लेता। वह अपनी पूरी जाँच-पड़ताल करता... क्या कमी है मुझमें दिखने में अच्छा खासा हूँ, अच्छा कमाता हूँ.. कई लड़कियाँ मरती हैं मुझ पर... फिर ये लड़की इतना भाव क्यों खाती है.... खैर कुछ भी हो मैं भी हिम्मत नहीं हारूँगा, देखता हूँ मेरी स्मार्ट पर्सनालिटी से कब तक इम्प्रेस नहीं होती... उसे बस मेरे बात करने का तरीका अच्छा नहीं लगता तो मैं तरीका बदल देता हूँ,,, ऐसे-ऐसे डायलॉग बोलूँगा कि उसकी बोलती बंद हो जायेगी। वह कई दिनों तक इसी उधेड़बुन में पड़ा रहा कि अबकी बार ऐसी क्या बात करे कि लड़की उस पर फिदा हो जाये। सोच-विचार कर उसे एक टॉप का आइडिया आता है... दो तीन बार स्टाइल से वह डायलॉग की प्रैक्टिस करता है। अपने परफेक्शन का अंदाजा होते ही वह हँस पड़ता है। इस बार पूरे दो महीने बाद उसने फोन किया – हैलो... कैसी हो चन्द्रमुखी ?’ उधर से आवाज आयी- व्हाट नॉनसेन्स... चन्द्रमुखी होगी तुम्हारी बहन.....। वह नॉनस्टॉप शुरू हो गई। वह हड़बड़ा गया- सॉरी मैं तो मजाक कर रहा था। लेकिन लड़की मजाक के मूड में नहीं थी- ऐसा है मेरे पास मजाक करने की फुर्सत है नहीं,,, ये पुराने जमाने का मजाक तू अपने जमाने की किसी लड़की से कर....उसे ये चन्द्रमुखी और सूर्यमुखी का राग सुना... अपना अमोल पालेकर स्टाइल दिखा कर मुझे इम्प्रेस मत कर... लड़की फुलस्पीड में बोलकर रख देती है। वह बेचारा पिछले पाँच-छह सालों का हिसाब-किताब लगाने बैठता है- फोन बिल्स के बारे में सोचकर तसल्ली होती है कि चलो ज्यादा बिल बर्बाद नहीं हुआ, लेकिन जब वक्त का हिसाब लगाने बैठता है तो उसे रोना आ जाता है.... उफ्फ !  कई साल बर्बाद हो गये इस घमंडी लड़की के चक्कर में अगर पाँच-छह साल पहले किसी के पीछे यूँ पड़ता तो अब तक मेरी वो वाली चन्द्रमुखी मेरे बच्चों की अम्मा बन चुकी होती।

Monday, 15 April 2013

एक अजनबी यात्रा



रविवार
सप्ताह के छह दिन वह ये सोचता कि रविवार के दिन खूब आराम करेगा, जी भर के सोयेगा, मुवी देखेगा, दोस्तों से मिलने जायेगा.. और भी अनगिनत काम वह संडे के दिन प्लान करके रखता। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर होता। शनिवार की रात को देखा उसका सपना संडे की सुबह ऐसे चकनाचूर होता कि वह बिलबिला जाता। अपने आप को कोसता... अरे कहाँ आकर फँस गया, चूल्हे में जाये ऐसी नौकरी... कोई ऐसे कुत्ते की तरह दिन-रात मेहनत करे और सप्ताह में एक दिन आराम भी न करे तो लानत है ऐसी नौकरी पर...। कई बार तो रविवार की सुबह कबूतरों की गुटरगूँ और गली के बाहर आवारा कुत्तों की भौं भौं से शुरू होती। उसका मन होता एक-एक को पकड़ के थप्पड़ मारे और बोले आज रविवार है कम से कम आज के दिन तो जी भर के सो लेने दो। कल से बॉस की कांव कांव तो सुननी ही है। फिर उसे अपने आप पर हँसी आती कि थप्पड़ भी मारे तो कबूतरों और कुत्तों को बस यही औकात रह गई उसकी... सीधे समस्या की जड़ पर ही हमला बोल दूँ...।
वह लेटे-लेटे ही सोचने लगता अभी जाता हूँ सोसाइटी वालों से पूछता हूँ कि क्या कुत्तों की लोरी सुनने के लिये पैसे लेते हो... कम से कम अपने गार्ड को तो बोले कि इन कुत्तों को चुप कराए। अभी वह बिस्तर पर युद्ध की तरकीबें सोच ही रहा होता कि कॉलबेल बज उठती। वह नीरीह भाव से इधर-उधर देखता जबकि उसे पता है कि उसके अलावा कमरे में कोई नहीं है। वह अलसाया हुआ उठ कर दरवाजा खोलता है- सामने दूध वाला खड़ा है। वह फिर वापस मुड़ता है दूध का बर्तन लेने के लिये तब पीछे से दूधवाला बड़बड़ाता है- साहब जरा जल्दी करो दूसरी जगह भी जाना है,,, आपकी तरह हमलोगों ने सुस्ती दिखायी तो हमारा तो धंधा ही चौपट हो जायेगा। वह अंदर ही अंदर सुलग उठता है मन में सोचता है ज्यादा चुस्ती-फुर्ती है तभी तो दूध बेच रहा है मुंहजोर कही का, लेकिन ऊपर से सहज होकर कहता है लाता हूँ भईया... नाराज क्यों होते हो।
दूध वाले के जाने के बाद वह फिर बिस्तर पर लेट जाता है... अब तो 11-12 बजे के पहले नहीं उठूँगा.. चाहे कुछ भी जाये। थोड़ी देर तक वह आँखें बंद किये सोने की कोशिश करता है... तभी फोन की घंटी बज उठती है। वह तकिये में मुंह घुसा कर आवाज अनसुनी कर देता है। कुछ देर बाद फिर फोन की घंटी बजती है तो इस बार उसके मन में ये जानने की इच्छा होती है कि पता नहीं कौन है जरा देख ही लिया जाये। वह फोन उठाता है उस तरफ से आवाज आती है- हैलो....हाँ पहचाना मैं.... वह झुंझलाता है- अबे मैं कौन?..  क्या बेटा मेरी आवाज नहीं पहचान रहे, सो रहे थे क्या ? वह अभय की आवाज पहचान लेता है लेकिन सोचता है कि अनजान बनकर खूब गालियाँ दें। वह शुरू हो जाता है- हाँ मेरे सौतेले बाप,,, तूझे नहीं पहचान रहा मैं और सुन...... मुझे पता है तू रांग नंबर है फालतू में सुबह सुबह फोन करके टाइम खोटी मत कर मेरा....। उधर अभय की आवाज से सारा रौब खत्म हो जाता है और वह जल्दी से बोलता है- यार मैं अभय बोल रहा हूँ,,, सुन तो सही...लेकिन उसने ठान लिया था कि खूब सुना कर रिसीवर पटक देना है तो उसने वैसा ही किया। फिर एक मुस्कुराहट के साथ लंबी साँस ली और बिस्तर पर फैल गया।
उसे सोच-सोच कर हँसी आ रही थी- अभय के बच्चे...हर संडे को फोन पर रायता फैलाना शुरु कर देता है, आज अच्छी खबर ली मैंने उसकी, अब दुबारा फोन करने से पहले सोचेगा जरूर। वह फिर सो जाता है। सपनों में दूर-दूर तक उड़ाने भरता है- हवा में एक महल है और उसमें साफ सुथरे बिस्तर पर वह आराम से सो रहा है तभी उसे कॉलबेल की आवाज सुनाई देती है, वह चौंकता है- अरे रे स्वर्ग में भी कॉलबेल,, नहीं यह सब भ्रम है, स्वर्ग अभी भी धरती की तकनीक से वंचित है,,, लेकिन कॉलबेल की आवाज लगातार आ रही है तभी उसकी नींद खुल जाती है। वह बिस्तर से अचानक उठ बैठता है- ओह इसका मतलब है कि वह सपना देख रहा था और दरवाजे पर काफी देर से कोई घंटी बजा रहा है।
वह हड़बड़ाया हुआ दरवाजा खोलता है- सामने अभय खड़ा है। वह लपककर अभय के गले लगता है कैसा है मेरे यार.... अभय भी मुस्कुराकर कहता है- ठीक हूँ... इधर से गुजर रहा था तो सोचा आज संडे है तू घर पर ही होगा तो मिलता चलूँ... अरे मैंने तूझे फोन भी किया था लेकिन पता नहीं तूने पहचाना नहीं शायद,, रांग नंबर कहकर रख दिया। उसका मन हुआ कि बोल दे रांग नंबर कहने के अलावे भी बहुत कुछ कहा था... वो सब क्यों नहीं बोल रहा...लेकिन वह कहता है- अबे तो वो तू था जिसे मैंने रांग नंबर समझ लिया था, सॉरी यार नींद में था, आवाज भी ठीक से नहीं आ रही थी। अभय कहता है कोई बात नहीं मुझे पता है तूने मुझे नहीं पहचाना होगा तभी तो तेरे से मिलने चला आया। अब पूरे दिन गप्पें लड़ायेंगे,,, खूब मजा आयेगा, है ना ! उसका मन होता है कि अभय को एक जोरदार थप्पड़ रसीद कर दे, वो थप्पड़ इतनी जोर का हो कि पाँचों उंगलियों के निशान छप जाये, उसका मुँह रुआँसा हो जाता है। अभय पूछता है- क्या सोचने लगा? वह कहता – यह सोच रहा हूँ कि चाय बनाऊँ या कॉफी? अभय जोर से हँसता है – अरे तू क्यों सोच रहा है मुझसे पूछ ले, मैं कोई गैर तो हूँ नहीं, जा बढ़िया सी कॉफी बना कर ले आ मेरे लिये....। वह पैर पटकता हुआ किचन में चला जाता है।   

Saturday, 13 April 2013

तेरी तस्वीर में हैं हज़ारों रंग
सबको नजर में भर लूँ कैसे,
अब सोचा है...हर्फ़ हर्फ़ लिखूँ
और फुर्सत में पढ़ लूँ तुझे

Friday, 12 April 2013

एक अजनबी यात्रा



चहलकदमी
पिछले दो सालों से शाम उसी रास्ते पर गुजरती थी, चहलकदमी करते हुए। चहलकदमी इसलिये कि चलने की गति हर रोज एक सी होती थी, न कम न ज्यादा। पैरों में तेज चलने की चाहत न थी ऐसी बात नहीं बल्कि मन में कोई उत्साह नहीं था और जब मन अनुमति न दे तो पैर अपनी गति पकड़े कैसे?  बस फिर क्या है रोज हौले-हौले कदम ताल होती उबड़ खाबड़ रास्तों से और मन आस पास की बजबजाती नालियों को देखते हुये दूर तक चला जाता। इतनी दूर की कभी हजारों किलोमीटर दूर चुल्हे के पास बैठी माँ के हाथों सिंकती रोटियों की सुगंध आती तो कभी आँगन में फुदकते नन्हें गोरैय्या की याद आती और हाँ याद आती एक रोबदार आवाज जिसे सुनकर मन क्या आत्मा तक थर्रा उठती, बेशक पापा को याद करना उसके लिये कोई मीठा आनंद नहीं था बल्कि वो तो खुद ब खुद माँ और गोरैय्या की बहुत मीठी यादों को संतुलित करने के लिये कड़वे नीम की तरह आ टपकते थे। जैसे ही पिता की याद आती होठों पर खिलती हुई मुस्कान खो जाती और वो लौट आता बजबजाती नालियों पर और उसे घिन आती देखकर। पिच्च से थूकते हुये म्यूनिसिपल्टी वालों को कोसता- इतने सारे टैक्स लेते हैं लेकिन इन खुली नालियों को ढंकने का कोई उपाय नहीं करते, अरे कम से कम इन पर जमा होने वाले मच्छरों को रोकने के लिये किसी दवा का तो छिड़काव करते,,, कुछ नहीं हो सकता इस देश का,,, सोचते हुये अचानक पिता की याद आती वो भी तो ऐसे ही बोलते हैं... इस बार वह मुस्कुरा उठता और माँ की बातें याद आ जाती- तू बिल्कुल अपने पिताजी पर गया है बदले में वो कहता हाँ, खून का असर तो होगा ही....। इस तरह हर रोज उसका रास्ता कटता। खरामा खरामा वो एक किलोमीटर का सफर शुरु करता और उस सफर के अंत तक आते आते वह एक युग जी चुका होता।