वीकली ऑफ
दो महीनों से लगातार काम कर रहा था। हर बार उसका विकली ऑफ कैंसिल हो जाता। कभी
लगता कि उसकी किस्मत ही खराब है तो कभी महसूस होता कि उसका सीनियर जानबूझकर उसे
परेशान करता है। वह मन मारकर अपने ऑफ वाले दिन ऑफिस जाता। उस दिन पूरी शिफ्ट में
वो मनहूस सी शक्ल बनाये रहता। सोचता कोई पूछे तो सही कि क्या बात है तब दिल खोल के
रख दे... लानत-मलानत कर दे शिफ्ट इंचार्ज की लेकिन उसकी मंशा पूरी नहीं होती। कोई
कुछ पूछता ही नहीं था। बीच-बीच में जैसे ही फुर्सत मिलती पीछे वाली सीट पर उचक के
देखता कि हिमांशु क्या कर रहा है, सोचता इसकी तो ऐश है हमेशा छुट्टियाँ करता है और
बॉस का सगा भी बना रहता है। वह अपनी दर्द भरी व्यथा लिये टुकुर-टुकुर हिमांशु को
एक मिनट तक देखता और हिमांशु महाशय अपने कम्प्यूटर स्क्रीन पर नजरें गड़ाये रहते,
कोई भाव ही न देते। वह कुढ़ कर रह जाता। मन में उस चमचे को भद्दी सी गाली देता और
होठों पर टोकरी भर मुस्कान सजा के कहता- क्यों भाई हिमांशु बहुत काम में मशगूल दिख
रहे हो... जरा हम पर भी ग़ौर फरमा लिया करो। हिमांशु कुछ बोले इससे पहले उसके
ऑफिसियल माई-बाप इंचार्ज महोदय अचानक से प्रकट हो जाते- “क्यों भाई सारा दिन
मटरगस्ती करते रहते हो कभी काम भी कर लिया करो, ऑफ के दिन बुलाया तो इसका ये मतलब
थोड़े है कि कामचोरी करो...चलो काम करो।“ वह मायूस होकर अपनी सीट पर बैठ जाता, सोचता
इसको तो मुर्गे की तरह जिबह करना चाहिये और वह कल्पना करने लगता कि शिफ्ट इंचार्ज
मुर्गा है और वह कसाई.... छूरा लिये उसके हाथ मुर्गे की गर्दन तक पहुँच रहा है....
मुर्गा फड़फड़ा रहा है.... कुकड़ु कू करके प्राणों की भीख माँग रहा है और वो खुश
हो रहा है कि बेटा आज तो तू नहीं बचेगा...ले तू अपनी करनी का फल भुगत... तभी पीठ
पर जोर का एक धौल जमाते हुये मुर्गे की आवाज आती है- “अबे.... सर जी मैंने कहा
काम कर लो यहाँ मुस्कुराने के पैसे नहीं मिलते हैं....” वह चौकन्ना हो जाता- “जी सर,,, सॉरी, वो मैं कुछ सोच रहा था...।” शिफ्ट इंचार्ज उसके चेहरे
को ताड़ते हुये कहता- “तू ज्यादा सोचा मत कर.. सोचने के लिये हम बैठे हैं... बड़ा आया सोचने वाला।“ वह अपनी मुट्ठियों को जोर से भींच लेता... दिल
कहता आज इसे अपनी सोच बता ही दे... बताना क्या.. सोच पर अमल ही कर ले,,, फिर दिमाग
कहता नहीं.. नहीं खामख्वाह नौकरी जायेगी... इसका क्या है दो-चार दिन बेड रेस्ट
करेगा फिर टनाटन ऑफिस आना शुरू... मेरा ही नुकसान होगा...। शिफ्ट इंचार्ज फिर
पूछता- “ओये मेरे लाल, क्या
हो गया, गुस्से में लग रहा
है... अरे हिमांशु देख तो जरा सर नाराज हो गये हैं ऑफ वाले दिन जो बुला लिया।“ हिमांशु उठकर इंचार्ज की
खीं...खीं...खीं में शामिल हो जाता है। वो तुरंत अपना बचाव करता है- नहीं सर,,,
मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता... घर में बैठे-बैठे बोर ही होता, अच्छा हुआ ऑफिस आ
गया। इंचार्ज छूटते ही बोला- “भई वाह ये तो अच्छी बात है... सुन अगले महीने हिमांशु को 15
दिन के लिये अपने गांव जाना है,,, तो तू एडजस्ट कर ले जरा... बाद में मैनेज कर
लेंगे...।“ उसका दिल करता है
इंचार्ज के सर के सारे बाल नोंच ले और हिमांशु की बत्तीसी उखाड़ ले लेकिन वह खुद
अपना सिर पकड़ के बैठ जाता है।
achchha hai
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