अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी संघर्ष और उनको मिल रहा व्यापक जनसमर्थन इस बात का संकेत है कि जनता बदलाव चाहती है। यह बदलाव सिर्फ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही नहीं बल्कि शासन और सत्ता के प्रत्येक स्तर पर जरूरी है। लोग अन्ना हजारे का समर्थन सिर्फ इसलिए नहीं कर रहे हैं कि उन्हें भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहिए बल्कि लोग चाहते हैं कि अन्ना की आँधी के बहाने पथभ्रष्ट हो चुकी राजनीतिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन हो।
Wednesday, 17 August 2011
Thursday, 11 August 2011
हसरत थी...
हसरत थी तेरे चेहरे को रौशन देखूं,
बस दुआ में मांग ली थोड़ी सी चांदनी।
बस दुआ में मांग ली थोड़ी सी चांदनी।
हसरत थी तेरे चेहरे को रौशन देखूं,
बस दुआ में मांग ली गुलशन की हँसी।
हसरत थी तेरे चेहरे को रौशन देखूं,
बस दुआ में मांग ली सूरज से दोस्ती।
हसरत थी तेरे चेहरे को रौशन देखूं,
बस दुआ में मांग ली सारे जहां की खुशी।
हसरत थी तेरे चेहरे को रौशन देखूं,
बस दुआ में मांग ली खुद तेरी बंदगी।
सोनी किशोर सिंह
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Friday, 29 July 2011
पत्थर भी रोता है
बचपन से लेकर जवानी तक कभी वो रोया नहीं था। रोया तो जरूर होगा बस उसे याद नहीं था कि होश संभालने के बाद उसने कभी आंसू बहाये हैं। तब भी नहीं जब उसकी मां मरी थी, तब भी नहीं जब कफन के लिए पैसे नहीं थे और तब भी नहीं जब लगातार भूख के कारण लोगों के फेंके गए जूठन के लिए अपने जैसे बच्चों से छीनाझपटी करनी पड़ी। क्योंकि उसे लगता था कि ये सब उसके जैसे गरीब लोगों की जिंदगी का हिस्सा है। इसी तरह वह बिना रोये जवान हो गया था। लोग उसे पत्थर कहते थे, क्योंकि लोग चाहते थे कि वो रोये अपनी गरीबी पर, अपनी लाचारी पर, भगवान द्वारा लिखी अपनी दुर्दशा पर लेकिन वो रोता नहीं था।
धीरे-धीरे वो मेहनत से रोटी कमाना सीख गया था। जिंदगी की जंग में उसे अपने जैसा एक और योद्धा मिला था- एक नन्हा योद्धा, कूड़ा बीनते हुए। उसे घर ले आया था और उसी के साथ हंस-बोल लेता था। पता नहीं जरूरत थी या फिर एक तरह की बदकिस्मती, दोनों एक दूसरे का ख्याल रखने लगे थे, बिल्कुल सगे भाईयों की तरह। समय तेजी से बीत रहा था और अब वो अपनी गरीबी से मुक्त होकर एक हंसमुख इंसान बनने लगा था। पैसे तो अब भी नहीं थे बस हंसी का खजाना मिल गया था। लेकिन कालगति ने एक बार फिर उसकी परीक्षा ली। नन्हा योद्धा अचानक बीमार हो गया। उसके पास पैसे नहीं थे कि उसका इलाज करा सके और योद्धा मर गया। फिर उसे याद आया कि बचपन में उसकी मां मरी थी ऐसे ही बिना पैसे के और अब भाई की तरह का उसका साथी। और इस बार वो मजबूत नहीं रह पाया, टूट गया, फूट-फूटकर रो पड़ा। लेकिन उसके दुख में कोई शामिल नहीं हुआ। लोगों ने बस इतना कहा कि देखो पत्थर भी रोता है...
Sunday, 10 July 2011
काले धन का काला सच
काले धन पर मीडिया, राजनीतिज्ञ और देश की आम जनता सभी बवाल मचा रहे हैं, लेकिन मीडिया और जनता के अलावा जो तीसरा पक्ष है वो नहीं चाहता कि उनकी काली कमाई देश में वापस आए। कांग्रेस सरकार शोर तो मचा रही है कि स्विस बैंकों में जमा देश का पैसा वापस लाया जाएगा लेकिन इस दिशा मे कोई कार्रवाई होती दिखाई नहीं दे रही है। अगर कुछ दिख रहा है तो इसे वापस लाने की मुहिम में जुटे लोगों पर सरकार की दमनात्मक जिद। बाबा रामदेव के आंदोलन को दबाना हो या अन्ना पर सरकार के सिपहसालारों की जुबानी जमाखर्च हर तरफ एक स्याह परत दिख रही है। कांग्रेस सरकार न तो देश में व्याप्त भ्रष्टाचार मिटाने की पहल का साथ दे रही है और न देश के बाहर गए पैसे को वापस लाने में कोई दिलचस्पी दिखा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भ्रष्टाचार और काले धन के पीछे सरकार का मौन समर्थन है? क्या सरकार अपने दामन के दागदार होने के डर से कोई ठोस हल निकालने से हिचकिचा रही है? या फिर सरकार ( मनमोहन सिंह) इतनी निर्बल है कि वो इस मुद्दे पर कुछ कर हीं नहीं पा रही है?
वजह चाहे जो भी हो कांग्रेस की सरकार हर मुद्दे पर फेल साबित हो रही है और जनआक्रोश बढ़ता जा रहा है। बात एक अन्ना और रामदेव की नहीं है बल्कि उन्हे मिले दूर दराज के लोगों का समर्थन है जो सरकार के खिलाफ गुस्से की कुलबुलाहट से शुरू हुई है और इसे भड़कते देर नहीं लगेगी।
Saturday, 4 June 2011
दस्तक
बेजुबां हुए इस तरह तेरे इश्क में
आज अल्फाज मयस्सर नहीं
बस खामोशियों के चंद बयानात हैं।
यकीं है दुआएं राहे दिल से गुजरकर
दस्तक देगी तेरे तन्हा दिल पर
कुबूल कर ले मासूम से जो ख्यालात हैं।
सहर ने कुछ यूं गुजारिश की शाम से
पल भर तो पहलू में ठहर जा मेरे
उम्र सिमट जाएगी इनमे साथ गुजारे जो लम्हात हैं।
बेरहम तेरे इंतजार में जन्नत मेरी बेनूर है
हर खुशी शामिल है वफा के आशियाने में
बस तेरी कमी है कह रहा ख्वाबों का कायनात है।
आज अल्फाज मयस्सर नहीं
बस खामोशियों के चंद बयानात हैं।
यकीं है दुआएं राहे दिल से गुजरकर
दस्तक देगी तेरे तन्हा दिल पर
कुबूल कर ले मासूम से जो ख्यालात हैं।
सहर ने कुछ यूं गुजारिश की शाम से
पल भर तो पहलू में ठहर जा मेरे
उम्र सिमट जाएगी इनमे साथ गुजारे जो लम्हात हैं।
बेरहम तेरे इंतजार में जन्नत मेरी बेनूर है
हर खुशी शामिल है वफा के आशियाने में
बस तेरी कमी है कह रहा ख्वाबों का कायनात है।
लबों ने कहा मुकम्मल कहां है मेरे बगैर तु
काश इस नामुराद दिल से पूछा तो होता.
शायद, मुद्दत से इस तरफ के भी वही हालात हैं।
Sunday, 15 May 2011
कुछ ऐसा करो......
बिखरो तो मोतियों की तरह, फैलो तो आसमान बन जाओ
टुकड़े-टुकड़े जीने की हसरत वालों. जुड़ो तो मुकम्मल जहान बन जाओ
सुनो जमाने की ठोकरों के पत्थर, सिमटों तो पूरा मकान बन जाओ
हौले- हौले बदलकर क्या हो गए हो , अब बदलो तो इन्सान बन जाओ
बरसो तो सावन की तरह, धुलो तो लबों की जुबान बन जाओ
बस उम्र गुजरी, न चूके न हारे हो , जाओ कुछ ऐसा करो कि महान बन जाओ....
टुकड़े-टुकड़े जीने की हसरत वालों. जुड़ो तो मुकम्मल जहान बन जाओ
सुनो जमाने की ठोकरों के पत्थर, सिमटों तो पूरा मकान बन जाओ
हौले- हौले बदलकर क्या हो गए हो , अब बदलो तो इन्सान बन जाओ
बरसो तो सावन की तरह, धुलो तो लबों की जुबान बन जाओ
बस उम्र गुजरी, न चूके न हारे हो , जाओ कुछ ऐसा करो कि महान बन जाओ....
Sunday, 8 May 2011
मां तुझे सलाम
मां का स्थान इंसान के जीवन में सबसे ज्यादा महत्व रखता है। कहते हैं मां ही व्यक्तित्व का निर्माण करती है और संसार का सामना करने की शक्ति देती है। लेकिन मां को आदर देने के लिए सिर्फ मदर्स डे ही काफी नहीं है। जीवन का हर पल अपनी मां की दुआओं से सवारें और उनका आशिर्वाद लें। सभी को मदर्स डे की शुभकामनाएं
बस एक रिश्ता सबसे पवित्र है मां का,
बस एक दुआ सिर्फ मेरे लिए है जो मेरी मां मेरे लिए करती है इससे ज्यादा और क्या चाहिए।
Sunday, 17 April 2011
क्या जनलोकपाल बिल बदलेगी दिशा?
सरकार की सहमति के बाद ये समझना कि जनलोकपाल बिल से देश की दशा और दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन होगा निहायत ही जनता को लॉलीपाप देकर बहलाना होगा। अगर जनलोकपाल बिल संसद में पास भी हो जाता है तो किसी को सजा होगी ऐसा सोचना मुमकिन नहीं है। अगर भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने के लिए सिस्टम सजग होता तो मौजूदा कानून उसके लिए पर्याप्त है। अलग से कोई कानून की जरूरत नहीं। सूचना के अधिकार का हश्र लोग देख ही रहे हैं। कहीं जानकारी मांगने वालों को झूठे केस में फंसा दिया जाता है तो कहीं उनकी हत्या कर दी जाती है। लेकिन कहते हैं- नाउम्मीदी के बीच एक उम्मीद का सूरज जलता तो होगा,
बस वो तपती हुई नजर चाहिए।। Sunday, 10 April 2011
बांग्लादेशी शरणार्थियों की बढ़ती गुंडागर्दी
कुछ दिनों पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक खबर आई थी कि माना बस्ती में दीवार पर लिखे गए आपत्तिजनक नारों से बिफरे शरणार्थी बांग्लादेशियों ने पुलिस थाने का घेराव किया और जमकर हंगामा किया। बाद में पुलिस के हस्तक्षेप से मामला शांत हुआ। ये महज एक घटना भर नहीं है बल्कि इसके निहितार्थ को समझने की जरूरत है।
काफी पहले से समाजसेवी और पुलिस अधिकारी इस बात को कहते आ रहे हैं कि बांग्लादेशी शरणार्थियों की बढ़ती संख्या भारत के लिए चिंता का विषय है लेकिन वोट बैंक की खातिर किसी भी दल ने इनके खिलाफ सख्त कदम उठाने से परहेज किया है। आज हालत ये है कि ये शरणार्थी भारत में न सिर्फ पक्के मकान और जमीनों के मालिक बन बैठे हैं बल्कि मतदाता सूचि में अपना नाम डालकर भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा बनने की शर्ते भी पूरी करने को तैयार हो चूके हैं। अब लाखों चकमा शरणार्थी भारत की नागरिकता हासिल कर चूके हैं। ये शरणार्थी अब इसी कानून का फायदा उठाकर गुंडागर्दी भी करने लगे हैं क्योकि इन्हे पता है कि उनकी बढ़ती संख्या और भारत की ढ़ुलमुल नीतियां उनका बाल बांका नहीं कर पाएंगी।
हालांकि इस संबंध में कानून मंत्रालय का कहना है कि शरणार्थियों के लिए कोई विशिष्ट कानून नहीं है और इस प्रकार के विदेशियों के मामलों को विदेशी विषयक अधिनियम ए 1946 और उसके अन्तर्गत बनाए गए नियमों के अधीन निपटाया जाता है।
साल 1971 में सिर्फ 1029 बांग्लादेशी शरणार्थी ही आये थे लेकिन अब इनकी संख्या लाखों हो गई है। इनके फर्जी नागरिकता प्रमाणपत्रों के जरिये सरकारी सुविधायें पा लेने से प्रशासन चौकन्ना जरूर हो गया है लेकिन कुछ कर नहीं पा रहा है।
बहरहाल अगर जल्दी हीं इनपर लगाम नहीं लगाया गया तो जल्दी हीं नक्सलियों की तरह ये भी लोकतंत्र के लिए घातक समस्या होंगे क्योंकि इनकी प्रतिबद्धता कभी भी भारत के लिए नहीं हो सकती।
काफी पहले से समाजसेवी और पुलिस अधिकारी इस बात को कहते आ रहे हैं कि बांग्लादेशी शरणार्थियों की बढ़ती संख्या भारत के लिए चिंता का विषय है लेकिन वोट बैंक की खातिर किसी भी दल ने इनके खिलाफ सख्त कदम उठाने से परहेज किया है। आज हालत ये है कि ये शरणार्थी भारत में न सिर्फ पक्के मकान और जमीनों के मालिक बन बैठे हैं बल्कि मतदाता सूचि में अपना नाम डालकर भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा बनने की शर्ते भी पूरी करने को तैयार हो चूके हैं। अब लाखों चकमा शरणार्थी भारत की नागरिकता हासिल कर चूके हैं। ये शरणार्थी अब इसी कानून का फायदा उठाकर गुंडागर्दी भी करने लगे हैं क्योकि इन्हे पता है कि उनकी बढ़ती संख्या और भारत की ढ़ुलमुल नीतियां उनका बाल बांका नहीं कर पाएंगी।
हालांकि इस संबंध में कानून मंत्रालय का कहना है कि शरणार्थियों के लिए कोई विशिष्ट कानून नहीं है और इस प्रकार के विदेशियों के मामलों को विदेशी विषयक अधिनियम ए 1946 और उसके अन्तर्गत बनाए गए नियमों के अधीन निपटाया जाता है।
साल 1971 में सिर्फ 1029 बांग्लादेशी शरणार्थी ही आये थे लेकिन अब इनकी संख्या लाखों हो गई है। इनके फर्जी नागरिकता प्रमाणपत्रों के जरिये सरकारी सुविधायें पा लेने से प्रशासन चौकन्ना जरूर हो गया है लेकिन कुछ कर नहीं पा रहा है।
बहरहाल अगर जल्दी हीं इनपर लगाम नहीं लगाया गया तो जल्दी हीं नक्सलियों की तरह ये भी लोकतंत्र के लिए घातक समस्या होंगे क्योंकि इनकी प्रतिबद्धता कभी भी भारत के लिए नहीं हो सकती।
Saturday, 9 April 2011
जीत से आगे
जीत से बढ़कर जीतने की कोशिश होती है जो इंसान को उर्जावान बनाती है। लोग कहते हैं कि बुरा बनना मुश्किल नहीं है... अगर कुछ मुश्किल है तो अच्छा बनना... लेकिन बुरा बनना भी बहुत मुश्किल होता है.... वास्तव में कुछ बनना ही सजीवता है... इंसान होने का अहसास है और अगर बनने की चाहत सकारात्मक हो तो सबकुछ अच्छा ही होता है...
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